अमरा तो मरता देख्या, शूरा देख्या भागत।

अमरा तो मरता देख्या, शूरा देख्या भागत।
आगे से पीछा भला ………
सड़कें सुनी। गालियाँ वीरान। पब, बार, होटल, थियेटर, बसें, ट्रेनें, उड़ाने सभी बन्द। उद्योग बंद। ऑफिस, कॉलेज, स्कूल बन्द। कामकाज ठप। सभी हैं घरों में बन्द। लाखों-करोड़ों की गाड़ियाँ गैरेज में खड़ी हैं। अरबों में बना आलीशान बंगला और रह रहे हैं एक स्कूल में क्वारेंटाइन होकर। कहाँ गए वे साधन, सुविधाएँ जो भौतिकवाद की अंधी दौड़ में एकत्रित किए। शादी समारोह 5-7 व्यक्तियों तक सीमित, खाने-पीने के लिए फ़ास्ट फ़ूड, पिज्जा, कोल्ड ड्रिंक्स गायब। पान-पुड़िया न जाने कहाँ गए । सोशल डिस्टेंसिंग। अजीब है आज की तस्वीर । मानव जीवन संकट में है। कितने ही लोग कोरोना का ग्रास बन गए। अमीर-गरीब, बड़ा-छोटा, अफसर, कर्मचारी सभी कोई घरों में बन्द हैं। धर्म, समाज, राजनीति सब से परे। एक तरफ यह ‘कोरोना का मानवता पर कहर है।’ वहीं लॉकडाउन के रूप में यह प्रकृति पर महर है।
विश्व में कितने प्राकृतिक परिवर्तन हुए हैं, यह फिलहाल जानना बहुत कठिन है किन्तु सामान्य तौर पर भारत की ही बात करें तो हरिद्वार में गंगा निर्मल, दिल्ली में यमुना साफ, पंजाब से हिमालय की चोटी का दिखाना, सड़क किनारे एवं उद्यान फूलों से गुलजार। कार्बन उत्सर्जन रुकना। हरा भरा वातावरण। पक्षियों का कलरव जिनकी आवाजें तक भूल गया इंसान। आज उन्हीं का शोर पूर्व की भांति अलार्म बनकर हमें जगाने लगा है। जानवरों का सड़कों पर भ्रमण। आसमान नीला। गगन फलक पर रुई जैसे उड़ते बादल। रात में चमकते तारे। साफ हवा। अपराधों में बेतहाशा कमी। दुर्घटनाओं से मृत्युदर में कमी। स्लम महानगरों की संस्कृति से प्रभावितों का आओ लौट चलें गाँवों की ओर की मानसिकता का जन्म। संयुक्त परिवार की पुनर्स्थापना की आस जगना। सम्पूर्ण दुनिया का एक मंच पर आना। हाथ जोड़ नमस्ते करना। बार-बार हाथ धोना। शरीर को ढककर रखना। कब्र के स्थान पर दाह संस्कार की स्वीकार्यता। यह तो हरेक के सामने परिलक्षित हो ही रहा है।
वस्तुतः लॉकडाउन के सहारे प्रकृति ने पूरी दुनिया का सकारात्मक संदेश देने की कोशिश की है। इंसान जिसने प्रकृति पर अपना अधिकार स्थापित कर उसका दोहन किया, पशुओं, पक्षियों, जीव-जंतुओं को ग्रास बनाया, पेड़ों को नष्ट किया, जल एवं वायु को प्रदूषित किया, प्राकृतिक सौंदर्य को खत्म किया । इन सबका ही परिणाम है कि मानव के शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य पर विपरीत प्रभाव पड़ा। हवाओं में जहर घुल गया। हवाएँ सांसें तोड़ने लगीं। पर्यावरण एवं पालतू जानवरों से दूरी, जंगली जानवरों से मित्रता, जंगलों को नष्ट करना, आदि कृत्य के समय इंसान ने सोचा तक नहीं कि जिस प्रकृति के कारण हम हैं, उस प्रकृति के साथ खिलवाड़ करना कितना घातक हो सकता है। इसके दूरगामी परिणाम क्या होंगे। किन्तु आज शायद समझ में आ रहा होगा कि यह कुत्सित कार्यों का ही प्रतिफल है जिससे हर इंसान संकट में है।
हमने अपनी सत्य सनातन संस्कृति और परंपराओं का उपहास उड़ाया। अज्ञानी, गंवार, अशिक्षित, अवैज्ञानिक कहकर आधुनिक भौतिकवाद का पल्लू पकड़ा किन्तु आज हम उसी पावन संस्कृति पर आ रहे हैं। चाहे पूरा शरीर ढकने की वेशभूषा हो, घर में प्रवेश करने पर, भोजन करने से पहले, लघु शंका और शौच के बाद हाथ धोना, बार-बार हाथ धोना, बाहर से घर में आने पर स्नान करना, हाथ जोड़कर नम्रतापूर्वक नमस्कार करना हमें अजीब लगता था, किन्तु आज वही सब परम्पराएं और संस्कार हमारे जीवनरक्षक बन गए हैं।
ठंडा-ठंडा कूल-कूल का आनन्द लेने वाले आज आज गर्म पानी पीने लगे हैं। उन्होंने पान-पुड़िया की जगह दादी-नानी के घरेलू नुस्खे आजमाना शुरू कर दिया है। जिस जिह्वा को अंडा, मांस, मछली के अलावा किसी दूसरे स्वाद का पता तक नहीं था, आज वही जिह्वा शाक-सब्जियों को खाने के लिए लालायित है। व्रत, दान, यज्ञ को जो पोंगापंथ मानते थे, आज उनका महत्त्व समझने लगे हैं। घर ही मन्दिर, इंसान ही भगवान है। कण-कण में ईश्वर का वास है, यह आभास होने लगा है। दान-पुण्य की होड़ और व्रत का महत्त्व। आज शायद समझ में आने लगा है कि दमघोटू वातावरण से निकल कर खुली हवाओं में सांस कैसे लिया जाता है। ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ क्या होता है। भले ही यह महामारी दुनिया के लिए काल बन कर सामने आई हो, लेकिन इसने मानवता का पाठ पढ़ाया है, इसने प्रकृति के प्रति सचेत होने का संदेश दिया है, सतर्क किया है कि बस बहुत हो गया, अब प्रकृति की तरफ लौटना होगा, मानवीय मूल्यों को अपनाना होगा। विश्वास करें एकजुट होकर मुकाबला करेंगे तो संक्रमण भी रुकेगा, कोरोना भी भागेगा, सकारात्मक सोच सके साथ ईमानदारी से मेहनत करेंगे तो अर्थव्यवस्था भी पटरी पर आ जाएगी लेकिन हमें यह समझना होगा कि वायु, जल एवं ध्वनि प्रदूषण किसी आपातकाल से कम नहीं हैं। यह राष्ट्रीय एवं वित्तीय आपातकाल से भंयकर है। अगर जीवन में तनाव कम करना है, हृदयघात से बचना है, रोगप्रतिरोधक क्षमता बढ़ानी है तो हमें प्रकृति और पर्यावरण का आश्रय लेना ही होगा। हमें हमारी जरूरतें सीमित करनी होंगी। पशु-पक्षियों, जीव-जन्तुओं के जीवन को बचाने के उपाय करने होंगे। प्रकृति को पुरानी रंग में लौटना होगा। लॉकडाउन के कारण हम प्रकृति की तरफ आकर्षित हुए हैं। इस आकर्षण को खत्म नहीं होने देंगे।आज जो मंजर साफ है, उसे साफ ही रखेंगे। आज कठिन परिस्थितियों में जो जज्बा, इच्छा, संकल्प हमारे में है, वह अनवरत रहेगा तो कलयुग में सतयुग आने से कोई नहीं रोक सकता।

 


डॉ. राधाकिशन सोनी
शिक्षाविद्, अनुसंधाता, चिन्तक, विश्लेषक

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