बावरी हो गई हूं मैं

बावरी हो गई हूं मैं

 

•      प्रमोद दीक्षित ‘मलय’

मेरा जीवन संवर गया प्यार जब उनका मिला।
बावरी हो गई हूं मैं न कोई शिकवा गिला।
नदी को पाकर खुश होता ज्यों समंदर कोई,
प्रेमिल छुअन से उनकी उपवन मन का खिला।।
*
यौवन पराग रस से महकती लदी निकली है।
प्रियतम सागर से मिलने इक नदी निकली है।
‘मलय’ पवन ने कहा बीते प्रतीक्षा के पल अब,
प्रेम की चाहत में इक प्यासी सदी निकली है।।
*
जब कोई अनजाना अपना सा लगने लगता है।
जाती है जिधर नजर वहीं वह दिखने लगता है।
भर देती है कसक हृदय में पल भर की बिछड़न भी,
प्रेम-गली चलते ही मन देह महकने लगता है।।

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