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सोनीपत-बाबा जिन्दा मेले में हजारों भक्तों ने माथा टेका

रणबीर रोहिल्ला | October 22, 2018 05:43 PM
रणबीर रोहिल्ला

सोनीपत-बाबा जिन्दा मेले में हजारों भक्तों ने माथा टेका
सुरक्षा के लिए कंट्रोल रूप के साथ लगाए गए है सीसीटीवी कैमरे
मठ के मंहत बाबा बालकनाथ दे रहे है भक्तों को आर्शीवाद


रणबीर रोहिल्ला, सोनीपत।

गांव मोई में सोमवार से आसज शुददी चोद्स के अवसर पर लगने वाला दो दिवसीय बाबा जिंदानाथ मेला आरंभ हो गया है। मेले के पहले दिन दूर दराज से काफी संख्या में श्रद्धालुओं ने पहुंचकर माथा टेका और मन्नत मांगी। श्रद्धालुओं ने बाबा की समाधि पर पूजा अर्चना कर मन्नत मांगी। डेरे के मंहत बाबा बालकनाथ ने भक्तों को अध्यात्म चितंन, मंगलकारी प्रवचन और बाबा की शिक्षाओं का संगीतमय दिव्य संदेश दिया। मंहत बाबा बालकनाथ ने बताया कि श्रद्धालुओं की भावनाओं को ध्यान में रखते हुए समाधि की मर्यादा को बनाए रखने के लिए ऐसी व्यवस्था की गई कि भीड़ ना बने इसके लिए समाधि का क्षेत्र का विस्तार किया गया है। भक्त आसानी से समाधी की परिक्रमा कर रहे है। महंत ने कहा कि जिसकी हम पूजा करते हैं तो उसके प्रति श्रद्धा होती है, यहां पर आने श्रद्धालुओं में अपने ईष्ट के प्रति श्रद्धा है। बाबा जिंदा नाथ पर आने वाले श्रद्धालु रसौली, मच्छ और पशुओं की बीमारियां को दूर करने के लिए डोरे व भभूत लिया।
सीसीटीवी कैमरों से निगरानी
बाबा जिंदा नाथ सेवा समिति के मुख्य सेवक सुखू ने बताया कि स्वयं सेवकों में अपार श्रद्धा है समर्पण है। मेले में व्यवस्थाओं में श्रद्धालुओं का पूरा सहयोग मिल रहा है। उनका बाबा जिंदा के प्रति श्रद्धा भाव है, उनकी सुविधा का ध्यान रखते हुए पूरे मेले में सीसीटीवी कैमरों से निगरानी की जा रही है। इसके लिए एक कंट्रोल रुम बनाया गया है, यहां पर सिक्योरिटी के सदस्य और पुलिस कर्मी पल-पल की गतिविधियों पर नजर रखे हुए हैं।
दो गज जमीन फटने से 300 साल पहले एक साधु जिंदा समा गया
मोई गांव स्थित बाबा जिंदानाथ डेरे में प्रति वर्ष आसुज (आश्विन) और चैत्र माह में मेला लगता है। जिसमें देश के विभिन्न भागों से लाखों श्रद्धालु मनोकामना लेकर आते हैं। यहां मान्यता है कि मनोकामना पूरी होने पर प्रसाद के रूप में गुड़ चढ़ाया जाता है। साथ ही कंबल चढ़ाने की परंपरा भी है। किंवदन्ती यह है कि 300 वर्ष पहले मोई गांव में राणा गौत्री जाटकुल में एक बालक का जन्म हुआ, जिसका नाम जसपाल रखा गया। बड़ा होने पर वह पशुओं को चराने के लिए बणी में जाने लगा। एक दिन उसको सिद्धश्री मस्तनाथ मिले। बाबा मस्तनाथ ने जसपाल से खीर खाने की इच्छा प्रकट की। लेकिन उस समय सारे पशु गांव में जा चुके थे। संयोगवंश तभी वहां बिन बयात की भैंस आ गई। उससे बाबा ने दूध निकालने की बात कहकर उसे अपना कमन्डल दे दिया। देखते ही देखते भैंस ने दूध देना शुरू कर दिया। खीर बनाकर बाबा को खिलाई। बाबा ने जसपाल को झूठी खीर खाने को कहा, तो उसने मनाकर दिया, लेकिन कुछ ही देर के बाद भूख सताने लगी तो उसने खीर खा ली। तब से जसपाल में वैराग्य जागृत होने लगा और वे बाबा मस्तनाथ के पास चले गए। सिद्ध बाबा मस्तनाथ ने जसपाल को अपना शिष्य बनाकर वरदान दिया कि जहां जगह मिले, वहीं जाकर भजन करो और आसुज सुधी चौदस के दिन दो गज जमीन फट जाएगी। उसमें जिंदा समाधि ले लेना। तो तुम बाबा जिंदा के नाम से पहचाने जाओगे। आसुज सूधी चौदस के दिन जसपाल समाधि ले रहे थे। तभी एक ब्राह्मण ने देख लिया। उसने उनके घर जाकर बताया तो उसकी भाभी समाधि लेने वाले स्थान पर आई और समाधि में उसके साथ समाने की जिद करने लगी। तब जसपाल ने कहा कि मेरा हाथ पकड़ लो, देवर-भाभी दोनों ही जमीन में समा गए तब से ही जसपाल को श्रद्धालु बाबा जिंदा के नाम से पूजने लगे।

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