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अबकि बार मकर संक्रांति पर्व 14 जनवरी नहीं बल्कि 15 जनवरी को ही मान्य - पं. रामकिशन

December 30, 2018 05:02 PM
तोशाम विष्णु दत्त शास्त्री

अबकि बार मकर संक्रांति पर्व 14 जनवरी नहीं बल्कि 15 जनवरी को ही मान्य - पं. रामकिशन
विष्णु दत्त शास्त्री,
तोशाम (भिवानी)।
हिंदू धर्म में मकर संक्रांति एक प्रमुख पर्व है। भारत के विभिन्न इलाकों में इस त्यौहार को स्थानीय मान्यताओं के अनुसार मनाया जाता है। हर वर्ष सामान्यत; मकर संक्रांति 14 जनवरी को मनाई जाती है। इस दिन सूर्य उत्तरायण होता है, जबकि उत्तरी गोलार्ध सूर्य की ओर मुड़ जाता है। ज्योतिष मान्यताओं के अनुसार इसी दिन सूर्य मकर राशि में प्रवेश करता है। परंतु वैदिक हिन्दू ज्योतिष के अनुसार अबकि बार मकर संक्रांति का पर्व 14 जनवरी को नहीं बल्कि 15 जनवरी को ही मान्य होगा। यह जानकारी देते हुए छपारिया हनुमान मंदिर के पुजारी पं. रामकिशन शर्मा गोवर्धन-मथुरा वाले ने बताया कि अबकि बार सूर्यदेव 14 जनवरी की रात्रि में 7 बजकर 43 मिनट पर मकर राशि में संक्रांति प्रवेश करेंगे। उन्होंने कहा कि मकर संक्रांति का पर्व हिंदूओं के देवता सूर्य ग्रह को समर्पित है। जब सूर्य गोचरीय भ्रमण चाल के दौरान धनु राशि से मकर राशि या दक्षिणायन से उत्तरायण की ओर स्थानांतरित होता है तब संक्रांति का त्यौहा मनाया जाता है, इसलिए अबकि बार वैदिक हिंदू ज्योतिष के अनुसार संक्रांति का पर्व 14 जनवरी की बजाय 15 जनवरी को ही मान्य होगा। पं. रामकिशन शर्मा का कहना है कि ज्यादातर हिंदू त्यौहारों की गणना चंद्रमा पर आधारित पंचांग के द्वारा की जाती है लेकिन मकर संक्रांति पर्व सूर्य पर आधारित पंचांग की गणना से मनाया जाता है। मकर संक्रांति से ही ऋ तु में परिवर्तन होने लगता है। शरद ऋ तु क्षीण होने लगती है और बसंत का आगमन शुरू हो जाता है। इसके फ लस्वरूप दिन लंबे होने लगते हैं और रातें छोटी हो जाती है।

धार्मिक और सांस्कृतिक दृष्टि से मकर संक्रांति का महत्व-----
भारत में धार्मिक और सांस्कृतिक नजरिये से मकर संक्रांति का बड़ा ही महत्व है। छपारिया हनुमान मंदिर के पुजारी पं. रामकिशन शर्मा ने बताया कि पौराणिक मान्यताओं के अनुसार मकर संक्रांति के दिन सूर्य देव अपने पुत्र शनि के घर जाते हैं। चूंकि शनि मकर व कुंभ राशि का स्वामी है। लिहाजा यह पर्व पिता-पुत्र के अनोखे मिलन से भी जुड़ा है।
पं. रामकिशन शर्मा ने कहा कि एक अन्य कथा के अनुसार असुरों पर भगवान विष्णु की विजय के तौर पर भी मकर संक्रांति मनाई जाती है। बताया जाता है कि मकर संक्रांति के दिन ही भगवान विष्णु ने पृथ्वी लोक पर असुरों का संहार कर उनके सिरों को काटकर मंदरा पर्वत पर गाड़ दिया था। तभी से भगवान विष्णु की इस जीत को मकर संक्रांति पर्व के तौर पर मनाया जाने लगा।

फ सलों की कटाई का त्यौहार मकर संक्रांति----
नई फ सल और नई ऋ तु के आगमन के तौर पर भी मकर संक्रांति धूमधाम से मनाई जाती है। पंजाब, यूपी, बिहार समेत तमिलनाडु में यह वक्त नई फ सल काटने का होता है, इसलिए किसान मकर संक्रांति को आभार दिवस के रूप में मनाते हैं। खेतों में गेहूं और धान की लहलहाती फ सल किसानों की मेहनत का परिणाम होती है लेकिन यह सब ईश्वर और प्रकृति के आशीर्वाद से संभव होता है। पंजाब और जम्मू-कश्मीर में मकर संक्रांति को लोहड़ी के नाम से मनाया जाता है। तमिलनाडु में मकर संक्रांति पोंगल के तौर पर मनाई जाती है, जबकि उत्तर प्रदेश और बिहार में खिचड़ी के नाम से मकर संक्रांति मनाई जाती है। मकर संक्रांति पर कहीं खिचड़ी बनाई जाती है तो कहीं दही चूड़ा और तिल के लड्डू बनाये जाते हैं।

मकर संक्रांति का लौकिक महत्व-----
पं. रामकिशन शर्मा ने बताया ऐसी मान्यता है कि जब तक सूर्य पूर्व से दक्षिण की ओर चलता है, इस दौरान सूर्य की किरणों को खराब माना गया है, लेकिन जब सूर्य पूर्व से उत्तर की ओर गमन करने लगता है, तब उसकी किरणें सेहत और शांति को बढ़ाती हैं। इस वजह से साधु-संत और वे लोग जो आध्यात्मिक क्रियाओं से जुड़े हैं उन्हें शांति और सिद्धि प्राप्त होती है। अगर सरल शब्दों में कहा जाए तो पूर्व के कड़वे अनुभवों को भुलकर मनुष्य आगे की ओर बढ़ता है। विस्तार से बताते हुए पं. रामकिशन शर्मा ने कहा कि स्वयं भगवान कृष्ण ने गीता में कहा है कि उत्तरायण के 6 माह के शुभ काल में जब सूर्य देव उत्तरायण होते हैं. तब पृथ्वी प्रकाशमय होती है, अत; इस प्रकाश में शरीर का त्याग करने से मनुष्य का पुनर्जन्म नहीं होता है और वह ब्रह्मा को प्राप्त होता है। महाभारत काल के दौरान भीष्म पितामह जिन्हें इच्छामृत्यु का वरदान प्राप्त था। उन्होंने भी मकर संक्रांति के दिन शरीर का त्याग किया था।

मकर संक्रांति पर परंपराएं-----
पं. रामकिशन शर्मा का कहना है कि हिंदू धर्म में मीठे पकवानों के बगैर हर त्यौहार अधूरा सा है। मकर संक्रांति पर तिल और गुड़ से बने लड्डू और अन्य मीठे पकवान बनाने की परंपरा है। तिल और गुड़ के सेवन से ठंड के मौसम में शरीर को गर्मी मिलती है और यह स्वास्थ के लिए लाभदायक है। ऐसी मान्यता है कि, मकर संक्रांति के मौके पर मीठे पकवानों को खाने और खिलाने से रिश्तों में आई कड़वाहट दूरी होती है और हम एक सकारात्मक ऊर्जा के साथ जीवन में आगे बढ़ते हैं। कहा यह भी जाता है कि मीठा खाने से वाणी और व्यवहार में मधुरता आती है और जीवन में खुशियों का संचार होता है। मकर संक्रांति के मौके पर सूर्य देव के पुत्र शनि के घर पहुंचने पर तिल और गुड़ की बनी मिठाई बांटी जाती है।
तिल और गुड़ की मिठाई के अलावा मकर संक्रांति के मौके पर पतंग उड़ाने की भी परंपरा है। गुजरात, मध्य प्रदेश व उत्तर प्रदेश समेत देश के कई राज्यों में मकर संक्रांति के दौरान पतंग महोत्सव का आयोजन किया जाता है। इस मौके पर बच्चों से लेकर बड़े तक पतंगबाजी करते हैं। पतंग बाजी के दौरान पूरा आसमान रंग-बिरंगी पतंगों से गुलजार हो जाता है।

संक्रांति पर तीर्थ दर्शन और मेले----
मकर संक्रांति के मौके पर देश के कई शहरों में मेले लगते हैं। खासकर उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और दक्षिण भारत में बड़े मेलों का आयोजन होता है। पं. रामकिशन शर्मा के अनुसार इस मौके पर लाखों श्रद्धालु गंगा और अन्य पावन नदियों के तट पर स्नान और दान, धर्म करते हैं। उन्होंने बताया कि पौराणिक मान्यताओं के अनुसार स्वयं भगवान श्री कृष्ण ने कहा है कि जो मनुष्य मकर संक्रांति पर देह का त्याग करता है उसे मोक्ष की प्राप्ति होती है और वह जीवन-मरण के चक्कर से मुक्त हो जाता है।

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