Monday, January 21, 2019
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जींद उप चुनाव-26 साल बाद नौबत आई विधानसभा उप-चुनाव की

राजकुमार अग्रवाल | January 08, 2019 09:18 PM
नेताओ की फ़ाइल फोटो
राजकुमार अग्रवाल

जींद उप चुनाव-
पार्टीयों के सामने कतई आसान नहीं है विनिंग उम्मीद्वार का चयन 
सभी दल उम्मीद्वारों को लेकर वेेट एंड वॉच की स्थिति में 
सभी दलों की एक-दूसरे के उम्मीद्वारों पर टिकी निगाहें
अगले दो दिनों में सभी दलों को करने होंगे अपने उम्मीद्वार घोषित
-राजकुमार अग्रवाल - atalhind@gmail.com   09416111503
कैथल (हरियाणा )।जींद विधानसभा सीट उप-चुनाव को घोषित हुए एक सप्ताह हो गया है मगर अब तक सांसद राजकुमार सैनी की पार्टी को छोड़कर कोई भी राजनीतिक दल अपने उम्मीदवारों की घोषणा नही कर पाया। सभी दल अब भी वेेट एंड वॉच की स्थिति में है। सभी दल एक-दूसरे के उम्मीदवारों की घोषणा पर नजरें जमाए है। इस उप-चुनाव में किसी भी राजनीतिक दल के लिए विनिंग उम्मीद्वार का चयन कतई आसान नहीं है। वजह यह है कि जींद उप-चुनाव में जातीय समीकरणों के साथ-साथ शहरी और ग्रामीण समीकरणों को भी साधना होगा। इसमें जो दल बेहतर तरीके से इन समीकरणों को साधने में कामयाब होगा,उसके चुनाव में जीत के आसार उतने ही मजबूत होंगे। अगले दो दिनों में सभी दलों को अपने उम्मीदवार घोषित करने होंगे क्योंकि 10 जनवरी उम्मीदवारों के नामांकन की अंतिम तारिख है। 
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जातीय समीकरणों के साथ शहरी और ग्रामीण समीकरण भी साधने होंगे-
विभिन्न राजनीतिक दलों को 28 जनवरी को हो रहे जींद उप-चुनाव में विनिंग उम्मीद्वारों के नाम तय करने के लिए जातीय समीकरणों के साथ-साथ शहरी और ग्रामीण क्षेत्र के समीकरण भी साधने होंगे। लगभग 1 लाख, 70 हजार मतदाताओं वाले जींद विधानसभा क्षेत्र में सबसे ज्यादा संख्या जाट मतदाताओं की है। इनकी संख्या 46 हजार से ज्यादा है। इसके बाद अनुसूचित जाति और पिछड़ा वर्ग के मतदाता हैंं। पंजाबी मतदाता भी लगभग 16 हजार से ज्यादा हैं। बाकी जातियों के मतदाताओं की संख्या 10 से 13 हजार के बीच है। विभिन्न राजनीतिक दलों को अपना उम्मीद्वार तय करते वक्त इन जातीय समीकरणों पर कई बार मंथन करना होगा। इसके अलावा जींद विधानसभा क्षेत्र 35 गांवों और जींद शहर में बंटा हुआ है। वही उम्मीद्वार और दल उप-चुनाव में बाजी मारेगा, जो शहरी और ग्रामीण दोनों क्षेत्रों में बराबर पैठ रखता हो। 2014 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी के सुरेंद्र बरवाला जींद शहर से बढ़त लेकर निकले थे लेकिन ग्रामीण क्षेत्र में वह इनैलो के डा. हरिचंद मिढा से पार नहीं पा सके थे और वह महज 2100 वोट के अंतर से चुनाव हार गए थे। 
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26 साल बाद नौबत आई विधानसभा उप-चुनाव की-
जींद जिले में 1993 के बाद पहली बार विधानसभा उप-चुनाव हो रहा है। जिले में लगभग 26 साल बाद विधानसभा उप-चुनाव की नौबत आई है। 1993 में नरवाना विधानसभा क्षेत्र का उप-चुनाव हुआ था। तब नरवाना के कांग्रेसी विधायक शमशेर सिंह सुरजेवाला को कांग्रेस पार्टी ने राज्य सभा में भेज दिया था। उनके इस्तीफे के बाद खाली हुई नरवाना विधानसभा सीट के लिए मई-1993 में उप-चुनाव हुआ था। इसमें पूर्व सीएम ओमप्रकाश चौटाला जनता पार्टी के उम्मीद्वार थे और उनका मुकाबला पूर्व मंत्री और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता शमशेर सिंह सुरजेवाला के बेटे रणदीप सुरजेवाला के साथ हुआ था। यह रणदीप सुरजेवाला का पहला विधानसभा चुनाव था। चुनावी दंगल में हविपा-भाजपा गठबंधन के उम्मीद्वार के रूप में पूर्व विधायक इंद्र सिंह नैन तथा जनता दल उम्मीद्वार के रूप में जिले सिंह जांगड़ा मैदान में थे। मुकाबला ओमप्रकाश चौटाला और रणदीप सुरजेवाला के बीच हुआ था, जिसमें बाजी ओमप्रकाश चौटाला ने मारी थी और वह लगभग 19 हजार मतों के अंतर से नरवाना से विधायक चुने गए थे। 
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चुनावी समीकरणों का दारोमदार रहेगा उम्मीद्वारों पर-
26 साल बाद हो रहे जींद उप-चुनाव में सत्तारूढ़ दल बीजेपी से लेकर मुख्य विपक्षी दल इनैलो, सांसद दुष्यंत चौटाला की जेजेपी, कांग्रेस किसी के लिए भी विनिंग उम्मीद्वार का चयन आसान नहीं होगा। वजह यह है कि तमाम राजनीतिक दलों के लिए जींद उप-चुनाव उनकी राजनीतिक प्रतिष्ठा से भी कहीं ज्यादा उनकी भविष्य की राजनीति का सवाल होगा। इसमें कोई भी दल चुनाव हारने के बाद लोकसभा और विधानसभा चुनाव तक हार की स्थिति से उबरने की स्थिति में नहीं होगा। इस समय जींद में धरातल पर राजनीतिक हालात यह हैं कि किसी भी दल के पक्ष में कोई बड़ा माहौल या आंधी जैसी बात नहीं है। ऐसे में जीत और चुनावी समीकरणों का दारोमदार उम्मीद्वारों पर रहेगा। जो दल बढिय़ा और सबसे मजबूत उम्मीद्वार चुनावी दंगल में उतारेगा,उसके चुनावी आसार उतने ही मजबूत होंगे। 
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सत्तारूढ़ दल बीजेपी की टिकट के लिए दावेदारों की लगी लंबी लाइन में अब अंतिम दौर की लड़ाई में सिर्फ तीन नाम उभर कर सामने आ रहे ह,ै जिसमें सीएम मनोहरलाल के नीजि सचिव राजेश गोयल सबसे उपर है। बताया गया है कि संघ ने राजेश गोयल के नाम पर मुहर लगाई है। राजेश पिछले करीब दो साल से जींद में सक्रिय रहे और उन्होने एनजीओ विवेकानंद फाउंडेशन के माध्यम से सभी समुदाओं में अपनी अच्छी पकड़ बनाई। 
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कई गुटों में बंटी कांग्रेस पार्टी के जींद से टिकट के दावेदारों की सूची भी काफी लंबी रही मगर अब टिकट की इस अंतिम दौर की लड़ाई में तीन नाम प्रमुखता से लिए जा रहे है। इनमें बालमुकुंंद शर्मा का नाम सबसे उपर लिया जा रहा है। बालमुकुंद शर्मा फिलहाल कांग्रेस के प्रवक्ता के तौर पर जिम्मेवारी निभा रहे है। बालमुकुंद कंडेला खाप से है अगर वे खाप को अपने साथ लाने में सफल रहे तो निश्चित तौर पर ये कांग्रेस के मजबूत उम्मीदवार हो सकते है।
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सांसद दुष्यंत चौटाला की पार्टी जेजेपी को भले ही अभी तक चुनाव चिन्ह नहीं मिला है लेकिन इस पार्टी का जींद विधानसभा क्षेत्र में खासा जनाधार 2 महीने में ही बन गया है। जींद में 9 दिसम्बर की समस्त हरियाणा सम्मेलन रैली ने सांसद दुष्यंत चौटाला और उनकी पार्टी को जींद में मजबूत राजनीतिक ताकत बना दिया है। इसी कारण जींद उप-चुनाव में जेजेपी टिकट के कई दावेदार हैं। टिकट की इस अंतिम दौर की लड़ाई में तीन नाम प्रमुखता से लिए जा रहे है, इनमें सबसे मजबूत नाम दिग्विजय का उभर कर सामने आया है। जेजेपी जींद का पूरी तरह से अपनी कर्मभूमि बनाना चाहती है और जींद के लोगों को विश्वास दिलाना चाहते है कि जिस तरह से जींद ने उन्हे अपनाया है जींद को वे भी अपना चूके है। जींद के लोगो के सामने दिग्विजय युवा व उर्जावान चेहरे के रूप मे सामने होंगे तो जींद के लोग इसे हाथों-हाथ लेकर पूरी तरह अपना सकते है। 
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इनैलो में टूट के बाद जींद उप-चुनाव में इनैलो की स्थिति कुछ अलग हो गई है। कारण यह है कि जींद से 2009 और 2014 में इनैलो टिकट पर विधायक चुने गए डा. हरिचंद मिढा के निधन के बाद उनके बेटे डा. कृष्ण मिढा बीजेपी में शामिल हो गए। इनैलो टिकट के जींद से कई प्रमुख दावेदार सांसद दुष्यंत चौटाला की जेजेपी में शामिल हो गए। अब इनैलो के पास जींद उप-चुनाव में टिकट के दावेदारों में एकाध नाम ही हैं। फिलहाल इनमें पास कोई भी ऐसा चेहरा नही है जो इस प्रतिष्ठा प्रशन बने इस उपचुनाव में पार्टी के लिए कुछ करिश्मा कर सके।

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