Friday, February 22, 2019
BREAKING NEWS

Entertainment

आदमी की कामवासना, लगती है, पशुओं से भी नीचे गिर जाती है। क्या कारण होगा?"

January 25, 2019 06:00 PM

"पशुओं की कामवासना में भी एक तरह की सरलता है, एक निर्दोष भाव है। आदमी की कामवासना में उतना निर्दोष भाव भी नहीं है। आदमी की कामवासना, लगती है, पशुओं से भी नीचे गिर जाती है। क्या कारण होगा?"

 

सिर्फ अकेले हिंदुस्तान ने एक विज्ञान को जन्म दिया जिसका नाम तंत्र है। एक पूरे विज्ञान को जन्म दिया, जिसके माध्यम से काम की ऊर्जा ऊर्ध्वगामी हो जाती है। और जिसके अंतिम प्रयोगों से काम—ऊर्जा थिर हो जाती है, उसका प्रवाह समाप्त हो जाता है। कृष्‍ण कहते हैं, मैं कामदेव हूं।

 

 

 

लेकिन इसका यह अर्थ नहीं है कि कोई कामवासना में पड़ा रहे। काम को भी दिव्य बनाना है, तभी यह कृष्‍ण के कामदेव की बात समझ में आएगी। उसे भी दिव्यता देनी है।

हमारा तो काम पशुता से भी नीचे चला जाता है, दिव्यता तो बहुत दूर की बात है। पशुओं की कामवासना में भी एक तरह की स्वच्छता है। और पशुओं की कामवासना में भी एक तरह की सरलता है, एक निर्दोष भाव है। आदमी की कामवासना में उतना निर्दोष भाव भी नहीं है। आदमी की कामवासना, लगती है, पशुओं से भी नीचे गिर जाती है। क्या कारण होगा?

क्योंकि पशुओं की कामवासना उनकी शुद्ध शारीरिक घटना है। और आदमी की कामवासना शारीरिक कम और मानसिक ज्यादा है। मानसिक होने से विकृत है। मानसिक होने से विकृत है, सेरिब्रल होने से विकृत है। एक आदमी संभोग में उतरे, यह निर्दोष हो सकता है। लेकिन एक आदमी बैठकर और संभोग का चिंतन करे, यह विकृत है, यह बीमार है।

तीन संभावनाएं हैं। या तो कामना, काम की शक्ति, प्रकृत हो, नेचुरल हो। अगर नीचे गिर जाए, तो विकृत हो जाए, अननेचुरल हो जाए। अगर ऊपर बढ़ जाए, तो संस्कृत हो जाए, सुपरनेचुरल हो जाए। प्रकृत कामवासना दिखाई पड़ती है पशुओं में, पक्षियों में। इसलिए नग्न पक्षी भी हमारे मन में कोई परेशानी पैदा नहीं करता। लेकिन कुछ लोग इतने रुग्ण हो सकते हैं कि नग्न पशु—पक्षी भी परेशानी पैदा करें।

अभी मैंने सुना है कि लंदन में की औरतों के एक क्लब ने एक इश्तहार लगाया हुआ है। और उसमें कहा है कि सड़क पर कुत्तों को भी नग्न निकालने की मनाही होनी चाहिए।

अब बूढ़ी स्त्रियों को सडक पर नग्न कुत्तों के निकलने में क्या एतराज होगा? इस एतराज का संबंध कुत्तों से कम, इन स्त्रियों से ज्यादा है। इनके मन में कहीं कोई गहरा विकार है। वही विकार प्रोजेक्ट होता है।

हम बच्चे को देखते हैं नग्न, तो तकलीफ नहीं होती। बड़े आदमी को नग्न या बड़ी स्त्री को नग्न देखते हैं, तो पीड़ा क्या होती है? वह पीड़ा कोई विकार है। वह नग्न व्यक्ति में है, ऐसा नहीं, वह हमारे भीतर है।

आदिवासी हैं, उनकी स्त्रियां अर्द्धनग्न हैं, करीब—करीब नग्न हैं, लेकिन किसी को कोई विकार पैदा होता मालूम नहीं होता। और हमारी स्त्रियां इतनी ढंकी हुई हैं, जरूरत से ज्यादा ढंकी हुई हैं, बल्कि इस ढंग से ढंकी हुई हैं कि जहां—जहां ढांकने की कोशिश की गई है, वहीं—वहीं उघाड़ने का इंतजाम भी किया गया है। हमारा ढांकना उघाड़ने की एक व्यवस्था है। हम ढांकते हैं, लेकिन उस ढांकने में बीमारी है। इसलिए जो—जो हम ढांकते हैं, उसे हम दिखाना भी चाहते हैं। तो ढांकने से भी हम दिखाने का इंतजाम कर लेते हैं।

 

 

 

हमारी ढंकी हुई स्त्री भी रुग्ण मालूम पड़ेगी। एक आदिवासी नग्न स्त्री भी रुग्ण मालूम नहीं पड़ेगी। वह प्रकृत है, पशुओं जैसी प्रकृत है।

 

 

 

एक और नग्नता भी है। एक पशुओं की नग्नता है, एक हमारी नग्नता है — कपड़ों में ढंकी। एक महावीर की नग्नता भी है। महावीर भी नग्न खड़े हैं। लेकिन उनकी नग्नता से किसी को कोई बेचैनी नहीं मालूम पड़ेगी। और अगर बेचैनी मालूम पड़े, तो जिसे मालूम पड़ती है, वही जिम्मेवार होगा। महावीर की नग्नता फिर बच्चे जैसी हो गई, फिर इनोसेंट हो गई। अब महावीर की नग्नता में, आदमी के ढंके होने से ऊपर जाने की स्थिति आ गई। अब ढांकने को भी कुछ न बचा। अगर हम महावीर से पूछें कि आप नग्न क्यों खड़े हैं? तो वे कहेंगे, जब ढांकने को कुछ न बचा, तो ढांकना भी क्या है!

हम ढांक क्या रहे हैं? हम अपने शरीर को नहीं ढांक रहे हैं। अगर बहुत गौर से हम समझें, तो हम अपने मन को ढांक रहे हैं। और चूंकि शरीर कहीं खबर न दे दे हमारे मन की, इसलिए हम शरीर को ढांके हुए बैठे हैं। लेकिन जब कोई डर ही न रहा हो, शरीर की तरफ से कोई खबर मिलने का उपाय न रहा हो, क्योंकि मन में ही कोई उपाय न रहा हो, तो महावीर नग्न होने के अधिकारी हो जाते हैं।

तीन संभावनाएं हैं। अगर कामवासना विकृत हो जाए, जैसी कि आज जगत में हो गई है.. .एकदम विकृत मालूम पड़ती है, और चारों तरफ से घेरे हुए है हमें। चाहे आप फिल्म देख रहे हों, तो भी कामवासना अनिवार्य है। चाहे आप अखबार पढ़ रहे हों, चाहे आप किताब पढ़ रहे हों, चाहे कहानी पढ़ रहे हों, और यह तो छोड़ दें, अगर आप साधु—संतों के प्रवचन भी सुन रहे हों, तो भी कामवासना अपना निषेधात्मक रूप प्रकट करती रहती है।

ओशो - गीता दर्शन – भाग–5, - अध्‍याय—10
(प्रवचन—ग्‍यारहवां) — काम का राम में रूपांतरण

Have something to say? Post your comment

More in Entertainment

अशोक मैमोरियल पब्लिक स्कूल फरीदाबाद के विद्यार्थियों ने सांस्कृतिक कार्यक्रम प्रस्तुत किया

संभोग के संबंध में सोचता रहता है, बड़ा सुख मन में पाता है।

लड़की का कितने लोगों से प्रेम-संबंध रहा

शहीद भगत सिंह प्रतिमा पर माल्यार्पण करके मनाया वैलेंटाइन डे

पेड चैलन बंद होने पर आपरेटर्स और उपभोक्ताओं में भारी रोष

किसी से प्रेम करते हैं तो "जताइए" और वैलेंटाइन डे इसके लिए सबसे अच्छा दिन है।

संभार्य थियेटर फेस्टिवल - दूसरे दिन नाटक काला ताजमहल का हुआ मंचन

संभार्य थियेटर फेस्टिवल - पहले दिन नाटक विद्रोही का हुआ मंचन

अमेरिका में फिल्म-टेलीविजन हैं, तब तक कोई पुरुष किसी स्त्री से तृप्त नहीं होगा

20 साल बडे जीजा के साथ करवाई रही थी 15 वर्षीय नाबालिग लडक़ी की शादी, शादी रूकी