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13 फरवरी को शहीद महाराजा सुरजमल की 312वीं जयंती मनाई जायेगी

February 12, 2019 03:20 PM

अटल हिन्द न्यूज़ । कोसली (पवन टूमना)
13 फरवरी को शहीद महाराजा सुरजमल की 312वीं जयंती मनाई जायेगी
18वीं सदी में पैदा हुए इतिहास के एकमात्र जाट महाराजा सुरजमल की 312वीं जयंती आज 11 बजे राजकीय वरिष्ठ माध्यमिक विद्यालय, रोहड़ाई के प्रांगण में धुमधाम से मनाई जायेगी। इस बात की जानकारी क्षेत्र के प्रमुख समाजसेवी ड़ाॅ0 टी सी राव ने दी। समस्त क्षेत्र के लोग शहीद महाराजा सुरजमल की जयंती के अवसर पर उन्हे श्रद्वासुमन अर्पित कर श्रद्वांजली देंगे। तत्पश्चात एक जनसभा कर रोहड़ाई मोड से जाटूसाना रेलवे स्टेशन तक बनी रोड़ का नामांकरण महाराजा सुरजमल मार्ग करने के लिए प्रस्ताव लाया जायेगा तथा रोहड़ाई गाँव द्वारा दी जाने वाली भूमी पर महाराजा सूरजमल स्मारक बनाने का प्रस्ताव भी रखा जायेगा। यह फैसला ड़ाॅ0 टी सी राव की अध्यक्षता में गाँव रोझूवास मेे पड़ोस के 11 गाँवों के सरपंच एंव गणमान्य व्यक्तियों की उपस्थिती में लिया गया। इस अवसर पर अजय, सरपंच प्रतिनिधी रोहड़ाई, श्री राज सिंह, प्रधान जाट पंचगामी, श्री प्रदीप कुमार सरपंच रोझूवास, श्री नरसिंह, सरपंच ढ़ोकिया, पृथ्वी सिंह सिंहास, अनिल कुमार, सरपंच प्रतिनिधी लाला, हरिकिशन, सरपंच प्रतिनिधी बाबड़ोली, श्री अभिलास कादयान सरपंच दिपालपुर टहिना, रोझूवास से सुबेदार रामकिशन, पुर्व सरपंच आजाद सिंह, पुर्व सरपंच बलवान सिंह के अलावा काफी संख्या में लोग उपस्थित थे।
महाराजा सूरजमल का जन्म 13 फरवरी 1707 को राजा बदन सिंह के घर हुआ था। मुगलों के आक्रमण का मुंह तोड़ जवाब देने में उत्तर भारत में जिन राजाओं का विशेष स्थान रहा है, उनमें महाराजा सूरजमल का नाम बड़े ही गौरव के साथ लिया जाता है। महाराजा सूरजमल कुशल प्रशासक, दूरदर्शी और कूटनीति के धनी सम्राट थे। महाराजा सूरजमल ने सन 1733 में भरतपुर रियासत की स्थापना की थी। महाराजा सूरजमल एक योद्वा होने के अलावा बहुत बड़े उदारवादी, परोपकारी, दानवीर, क्षमा करने वाले, दयालु तथा आज्ञाकारी थे। महाराजा सूरजमल ने अभेद लोहागढ़ किले का निर्माण करवाया था, जिसे अंग्रेज 13 बार आक्रमण करके भी भेद नहीं पाए। मिट्टी के बने इस किले की दीवारें इतनी मोटी बनाई गयी थी कि तोप के मोटे-मोटे गोले भी इन्हें कभी पार नहीं कर पाए। यह देश का एकमात्र किला है, जो हमेशा अभेद रहा। तत्कालीन समय में महाराजा सूरजमल के रुतबे की वजह से जाट शक्ति अपने चरम पर थी। उस समय भरतपुर रियासत का विस्तार महाराजा सूरजमल की वजह से भरतपुर के अतिरिक्त धौलपुर, आगरा, मैनपुरी, अलीगढ़, हाथरस, इटावा, मेरठ, रोहतक, मेवात, रेवाड़ी, गुडगांव और मथुरा तक पहुंच गया था। हर महान योद्धा की तरह महाराजा सूरजमल को भी वीरगति का सुख समरभूमि में प्राप्त हुआ। 25 दिसम्बर 1763 को नवाब नजीबुद्दौला के साथ हिंडन नदी के तट पर हुए युद्ध में महाराजा सूरजमल वीरगति को प्राप्त हुए। हमारे इतिहास को गौरवमयी बनाने का श्रेय महाराजा सूरजमल जैसे वीर योद्धाओं को ही जाता है, जिन्होंने मातृभूमि की रक्षा के लिए अपने प्राण तक न्योछावर कर दिए। ऐसे सच्चे सपूतों को हमेशा वीर गाथाओं में याद किया जाएगा।

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