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हनुमानगढ़-पुरातत्व विभाग की अनदेखी का शिकार 1700 वर्ष पुराना भटनेर किला

May 11, 2017 12:19 PM
एएच ब्यूरो

पुरातत्व विभाग की अनदेखी का शिकार 1700 वर्ष पुराना भटनेर किला

 


हनुमानगढ़ -हनुमानगढ़ राजस्थान की पहचान यहां के भव्य किले रहे हैं। भव्यता लिये हुये ये किले राजस्थान के शौर्य व साहस केप्रतीकहैं। हनुमानगढ का भटनेर दुर्ग भी अपनी भव्यता व मजबूती के लिये पूरे विश्व भर में प्रसिद्ध था, हालांकि आज यह किला अपनी दुदर्शा पर आँसू बहा रहा है। भटनेर किले को भारत के सबसे पुराने किलों में से एकमाना गया है। ये किला करीब 1700 साल पुराना माना जाता है। जैसलमेर के भाटी राजा भूपत ङ्क्षसह ने भटनेर का प्राचीन किला सन 295 में बनवाया। इसमें 52 बुर्ज हैं। भटनेर किला उस जमाने का एकमज़बूत किला माना जाता था यहां तककितैमूर ने अपनी जीवनी तुजुक-ए-तैमूरी में इसे हिंदुस्तान का सबसे मजबूत किला लिखा है।

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इसके ऊंचे दालान तथा दरबार तकघोडों के जाने के लिए संकरे रास्ते बने हुए हैं। इस किले पर तैमूरलंग, पृथ्वीराज चौहान, अकबर, कुतुबुद्दीन ऐबक आदि राजाओं ने राज किया। मध्यकाल में भारत पर आक्रमण के दौरान विदेशी शासकों को इसी किले के रास्ते से गुजरना पड़ता था। यह किला विदेशी आक्रमणकारियों के लिए एक मजबूूत रुकावट की तरह थी। सबसे अंत 1805 में इस किले पर बीकानेर के राजा सूरत सिंह ने कब्जा किया। ये जीत मंगलवार के दिन हुई थी इसलिए इस शहर का नाम बदल का हनुमानगढ़ रख दिया गया। इस किले का निर्माण ईंटों और चूने के पत्थरों से हुआ है। किले में जगह-जगह कुल 52 कुंड भी हैं। जो बारिश के पानी का इस्तेमाल करने के लिए बने थे। इसके अलावा किले के अंदर भगवानर शिव, हनुमान और ठाकुर जी के मंदिर भी हैं। किले केअन्दर एक प्राचीन जैन मंदिर भी बना हुआ है साथ ही दो दरगाह बनी हुई है जो मामा-भांजा की दरगाह के नाम से मशहूर है। घग्घर नदी के किनारे बना ये किला अब हनुमानगढ़ फोर्ट के नाम से जाना जाता है। ये किला हनुमानगढ़ टाउन शहर में स्थित है और जंक्शन रेलवे स्टेशन से केवल 5 किलोमीटर दूर है।

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अभेद कहलाने वाला भटनेर किला आज जर्जर होकर बैसाखियों के सहारे टिका हुआ है। दुर्ग के दूसरे मुख्य द्वार व गलियारे में बड़ी-बड़ी दरारें पड़ी हैं, जो समय के साथ बढ़ती जा रही है। पिछले करीब तीन साल से यह हाल है। इसकी मरम्मत की बजाय दीवार व द्वार को थामने के लिए हर साल लोहे की पाइपों की संख्या बढ़ा दी जाती है। इनके सहारे टिकी क्षतिग्रस्त दीवारें तथा द्वार क्षतिग्रस्त है।

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शटरिंग के पाइपों के बीच से गुजर कर दुर्ग में जाना लोगों की नियति बन गया है। लगभग तीन साल पहले द्वार में दरारें आई थी, जो समय के साथ बढ़ती जा रही है। इसके बावजूद मरम्मत के लिए कोई न तो ठोस योजना बनी और न ही कार्य हुआ। इस द्वार से रोजाना सैकड़ों लोग आवागमन करते हैं। प्रवेश का यही एकद्वार होने की वजह से इसे बंद करना भी संभव नहीं है। शहर के जागरूकनागरिकों द्वारा इस प्राचीन धरोहर को बचाने केलिये एक संगठन का गठन भी किया गया है जो इसकी अस्मिता को बचाने के लिये प्रयासरात है। पुरातत्व विभाग इस किले के रखरखाव में पैसों की कमी का रोना रो रहा है जबकि स्थानीय निवासियों केआरोप है किजब भी किले के लिये कोई बजट विभाग द्वारा दिया जाता है तो होने वाले निर्माण कार्यों में भारी भ्रष्टाचार होता है।

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