बिन्दिया
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बिन्दिया तू कितनी छोटी सी है
पर माथे पर दो भौंहों के बीच तू खूब सजती है।
तेरे होने से रुप द्विगुणित हो जाता है,
तू चेहरे की आभा बढ़ा देती है।
यूँ लगे चेहरे पर माहताब जड़ा है
चांद की चांदनी छिटकती पूरे चेहरे पर
तू रुप का नूर बढ़ा देती है।
तेरा दो भौंहों के बीच जो स्थान है
मानों सिंहासन पर बैठा कोई राजकुमार है।
तुझसे ही तो औरत का शृंगार है।
लाख पहने हो गहने उसने,पर
तेरे बिना सारा शृंगार बेकार है।
माथे पर तू लगे इस कदर
मानों चमका है नभ में आफताब है।
बिन्दिया प्रीत की मिसाल है
औरत के सौभाग्य का प्रतीक है।
इसके बगैर उसका रुप लगे बेरंग है।
लगा के बिन्दिया पहन के पायल,
इतराती-बलखाती फिरती सजना के अंगना।
कर देती बिन्दिया साजन को मदहोश,
उड़ा ले जाती उसकी निन्दिया।
बिन्दिया तू छोटी सी है पर,
कर कितने बड़े काम तू कर जाती है!

अनिता निधि
जमशेदपुर,झारखंड

अनीता निधि की रचनाएँ आप विभिन्न रचनाकार मंच में पढ़ व सून सकते है व इन्हे कई सम्मान भी प्राप्त है ।

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