अनीता निधि लिखती है एक रचना झारखंड से ‘ चाय हमारी चाह,

चाय हमारी चाह
*************

हर रोज सुबह तलब जगती है चाय की
दिन शुरु होता नहीं बिना चाय के।
आलस से अलसायी देह बिना चाय के
दोस्तों की महफिल अधूरी बिना चाय के
मेहमानों का स्वागत नहीं बिना चाय के।
चाय तो बहाना है आत्मीयता बढ़ाने का
अजनबियों से भी पहचान बढ़ाने का।
चाय में पड़ी चीनी की तरह मीठी बात करने का
चाय पत्ती की तरह कड़वी बात साझा करने का।
अपने मन के दुख सुख बतियाने का।
कोई कहे,,,पियोगे चाय? तो ये मत
समझना कि,,,
चीनी,चायपत्ती,दूध की खौलती चाय!
मतलब है कुछ खौलती यादों को साझा करना
मीठी बातों को याद करने का
कड़वी चायपत्ती की भांति कुछ कड़वी बातें
कुछ आशायें,कुछ उम्मीदें बतियाने का।
अपने अनुभव साझा करने का
चाय के कप से उठती भाप में बेफ़िक्री से
अपने गमों को भुलाने का।
दो प्याली चाय के साथ जितनी बातें होती
किसी अजनबी के साथ,
उतनी तो अपनों के साथ भी नहीं होती।
फिर कभी कोई बोले,,,पियोगे चाय?
तो मना मत करना।
साझा कर लेना कुछ मीठी यादें
और कुछ कड़वी बातें
क्यूंकि चाय की चाह के साथ होती
किसी के साथ की चाह!
ये है #चाय_हमारी_चाह !!

अनिता निधि
जमशेदपुर,झारखंड

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Translate »
error: Content is protected !!
%d bloggers like this: