एक शाम आजादी से मुलाकात हो गई

आजादी

एक शाम आजादी से मुलाकात हो गई। झुकी कमर, गहन पीड़ा में डूबी, बेबस और लाचार लड़खड़ा कर चल रही थी। मैले-कुचेले कपड़े बड़ी मुश्किल से साँस ले पा रही थी। आवाज़ देकर रोकना चाहा, लेकिन लगा मुझे दरकिनार करते हुए आगे बढ़ती जा रही है तथा जोर-जोर से बड़बड़ाए जा रही है। मैं यहाँ एक पल भी नहीं रूकना चाहती, मेरा यहाँ दम घुटता है। मन करता है कि सबको यहाँ छोड़ कर भाग जाऊँ, दूर बहुत दूर खुले आसमान में, खूबसूरत खुशगवार मौसम से लहर-लहराते हरे-भरे वनों की हसीन वादियों में। परंतु दु:खी एवं गमगीन कहाँ जाऊँ वादियों में, वादियाँ तो केवल नाम की हसीन वादियाँ रह गई हैं। अब वहाँ वन कहाँ? पर्यावरण और मौसम भी बार-बार उन्हें झाँक कर वापस आ जाते हैं और स्वयं को ही बदलने की कोशिश में लग गए हैं। कैसे रुक जाँऊ यहाँ पर, जहाँ मानव आजाद हो कर भी विकारों के बंधनों से मुक्त नहीं हो पा रहा तथा अपनो को ही बर्दाश्त नहीं कर पा रहा। वो मेरा सम्मान—- क्या करेंगे—? जिनका अपनों की ही सोहबत में दम घुटता हैं। इसलिए बेड़ियों में जकड़ी आजादी, आजादी की तलाश में, हमें हमारे हाल पर छोड़ कर बहुत दूर निकल गई।

अर्चना कोचर ©

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