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ओम प्रकाश चौटाला पर लगी  6 साल तक चुनाव ना लड़ने वाली पाबंदी कम या पूरी तरह की जाए खत्म ,चुनाव आयोग में हस्तक्षेप याचिका दायर

ओम प्रकाश चौटाला पर लगी  6 साल तक चुनाव ना लड़ने वाली पाबंदी कम या पूरी तरह की जाए खत्म ,चुनाव आयोग में हस्तक्षेप याचिका दायर
पूर्व मुख्यमंत्री ओम प्रकाश चौटाला की 6 साल तक चुनाव न लड़ पाने की अवधि को कम करने या उनको चुनाव लड़ने पर प्रतिबंध को पूरी तरह खत्‍म करने के मामले में चुनाव आयोग में हस्तक्षेप याचिका दायर।
हाई कोर्ट के 5 वकीलों के माध्यम से एक शिक्षाविद के याचिका दायर की !

राजनीति का अपराधीकरण रोकने के लिए सुनवाई का मौका देने की गुहार।

चंडीगढ़! 5 जुलाई(अटल हिन्द/राजकुमार अग्रवाल )

जूनियर बेसिक ट्रेनिंग (JBT) टीचर भर्ती घोटाले में मिली सजा पूरी कर चुके हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री और इनेलो सुप्रीमो ओम प्रकाश चौटाला के चुनाव लड़ने के मामले में नया मोड़ आ गया है! चंडीगढ़ के एक शिक्षाविद देवेन्द्र बल्हारा ने हाई कोर्ट के 5 वकीलों के के माध्यम से चुनाव आयोग के सामने हस्तक्षेप याचिका दायर की है। हाई कोर्ट के वकीलों की टीम: प्रदीप रापडिया, हरिंद्र पाल सिंह, संजीव तक्षक, प्रवीण कुमार व संजीव गोदारा के माध्यम से दायर की गई याचिका में मीडिया में छपी ख़बरों का हवाला देते हुए कहा गया है कि ओम प्रकाश चौटाला चुनाव लड़ने की ख़बरें सभी अखबारों में प्रमुखता से छपी हैं, जिनमें दावा किया गया है कि याचिका दायर करने पर चुनाव आयोग चुनाव न लड़ पाने की अवधि को कम कर सकता है या उनको चुनाव लड़ने पर प्रतिबंध को पूरी तरह खत्‍म कर सकता है। लोक प्रतिनिधित्व कानून 1951 की धारा 8(1) के अनुसार, रिहाई से 6 साल की अवधि तक यानी जून 2027 तक ओपी चौटाला चुनाव नहीं लड़ सकते। लेकिन, चौटाला के पास उक्त कानून की धारा-11 के तहत अपनी 6 वर्ष की अयोग्यता अवधि को कम करने या खत्म करने के लिए भारतीय चुनाव आयोग के पास अर्जी दायर करने का विकल्प है। इसके लिए 3 सदस्यीय चुनाव आयोग कानूनन सक्षम है। ऐसे में 5 वकीलों ने अपनी याचिका में कहा है कि अगर ओम प्रकाश चौटाला के तरफ से ऐसी कोई याचिका दायर होती है तो हरियाणा का निवासी होने के नाते व राजनीति का अपराधीकरण रोकने के लिए उनके मुवक्किल को भी सुनवाई का मौका दिया जाए!
याचिका में सोशल मीडिया पर अफवाहों के गर्म बाज़ार का भी हवाला देते हुए कहा गया है कि लोगों में इनेलो सुप्रीमो ओम प्रकाश चौटाला के चुनाव लड़ने के मामले में लोगों में कई तरह के भ्रम फैले हुए हैं जो चुनाव आयोग की निष्पक्षता, राजनीति के अपराधीकरण और नए राजनितिक समीकरणों पर पर गंभीर सवाल उठाते हैं । हालांकि याचिकर्ता के वकीलों ने याचिका में कहा है कि उन्हें चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर पूर्ण विश्वास है, इसलिए वो भी मामले में चुनाव आयोग के सामने अपना पक्ष रखना चाहते हैं । राजनीति के अपराधीकरण का अर्थ राजनीति में आपराधिक आरोपों का सामना कर रहे लोगों और अपराधियों की बढ़ती भागीदारी से है। सामान्य अर्थों में यह शब्द आपराधिक पृष्ठभूमि वाले लोगों का राजनेता और प्रतिनिधि के रूप में चुने जाने का घोतक है।
दरअसल, जनप्रतिनिधित्व कानून में प्रावधान है कि सजा पूरी करने के बाद छह वर्ष तक संबंधित व्यक्ति चुनाव लड़ने के अयोग्य रहेगा। यह प्रावधान भ्रष्टाचार निरोधक कानून, आतंकवाद निरोधक कानून और सती निरोधक कानून के तहत सजायाफ्ता व्यक्तियों पर भी लागू होता है।

राजनीति का अपराधीकरण और भारत
–  राजनीति के अपराधीकरण का अर्थ राजनीति में आपराधिक आरोपों का सामना कर रहे लोगों और अपराधियों की बढ़ती भागीदारी से है। सामान्य अर्थों में यह शब्द आपराधिक पृष्ठभूमि वाले लोगों का राजनेता और प्रतिनिधि के रूप में चुने जाने का घोतक है।
–  वर्ष 1993 में वोहरा समिति की रिपोर्ट और वर्ष 2002 में संविधान के कामकाज की समीक्षा करने के लिये राष्ट्रीय आयोग (NCRWC) की रिपोर्ट ने पुष्टि की है कि भारतीय राजनीति में गंभीर आपराधिक पृष्ठभूमि वाले व्यक्तियों की संख्या बढ़ रही है।
– वर्तमान में ऐसी स्थिति बन गई है कि राजनीतिक दलों के मध्य इस बात की प्रतिस्पर्द्धा है कि किस दल में कितने उम्मीदवार आपराधिक पृष्ठभूमि के हैं, क्योंकि इससे उनके चुनाव जीतने की संभावना बढ़ जाती है।
–  पिछले लोकसभा चुनावों के आँकड़ों पर गौर किया जाए तो स्थिति यह है कि आपराधिक प्रवृत्ति वाले सांसदों की संख्या में वृद्धि ही हुई है। उदाहरण के लिये वर्ष 2004 में आपराधिक पृष्ठभूमि वाले सांसदों की संख्या 128 थी जो वर्ष 2009 में 162 और 2014 में 185 और वर्ष 2019 में बढ़कर 233 हो गई।
–    नेशनल इलेक्शन वॉच और एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफाॅर्म (ADR) द्वारा जारी रिपोर्ट के अनुसार, जहाँ एक ओर वर्ष 2009 में गंभीर आपराधिक मामलों वाले सांसदों की संख्या 76 थी, वहीं 2019 में यह बढ़कर 159 हो गई। इस प्रकार 2009-19 के बीच गंभीर आपराधिक पृष्ठभूमि वाले सांसदों की संख्या में कुल 109 प्रतिशत की बढ़ोतरी देखने को मिली।
–    गंभीर आपराधिक मामलों में बलात्कार, हत्या, हत्या का प्रयास, अपहरण, महिलाओं के विरुद्ध अपराध आदि को शामिल किया जाता है।
राजनीति के अपराधीकरण का प्रभाव
–  देश की राजनीति और कानून निर्माण प्रक्रिया में आपराधिक पृष्ठभूमि वाले लोगों की उपस्थिति का लोकतंत्र की गुणवत्ता पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है।
–  राजनीति के अपराधीकरण के कारण चुनावी प्रक्रिया में काले धन का प्रयोग काफी अधिक बढ़ जाता है।
–  राजनीति के अपराधीकरण का देश की न्यायिक प्रक्रिया पर भी प्रभाव देखने को मिलता है और अपराधियों के विरुद्ध जाँच प्रक्रिया धीमी हो जाती है।
–  राजनीति में प्रवेश करने वाले अपराधी सार्वजनिक जीवन में भ्रष्टाचार को बढ़ावा देते हैं और नौकरशाही, कार्यपालिका, विधायिका तथा न्यायपालिका सहित अन्य संस्थानों पर प्रतिकूल प्रभाव डालते हैं।
– राजनीति का अपराधीकरण समाज में हिंसा की संस्कृति को प्रोत्साहित करता है और भावी जनप्रतिनिधियों के लिये एक गलत उदाहरण प्रस्तुत करता है।
सर्वोच्च न्यायालय की भूमिका
–  वर्ष 2002 में सर्वोच्च न्यायालय ने भारत सरकार बनाम एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफाॅर्म वाद में ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए कहा कि संसद, राज्य विधानसभाओं या नगर निगम के लिये चुनाव लड़ने वाले प्रत्येक उम्मीदवार को अपनी आपराधिक, वित्तीय और शैक्षिक पृष्ठभूमि की घोषणा करनी होगी।
– वर्ष 2005 में रमेश दलाल बनाम भारत सरकार वाद में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि एक संसद सदस्य (सांसद) या राज्य विधानमंडल के सदस्य (विधायक) को दोषी ठहराए जाने पर चुनाव लड़ने से अयोग्य ठहराया जाएगा और उसे अदालत द्वारा 2 वर्ष से कम कारावास की सज़ा नहीं दी जाएगी।
–  वर्ष 2013 में लिली थॉमस बनाम भारत सरकार वाद में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि जन-प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 8(4) असंवैधानिक है, जो दोषी ठहराए गए सांसदों और विधायकों को तब तक पद पर बने रहने की अनुमति देती है, जब तक कि ऐसी सज़ा के विरुद्ध की गई अपील का निपटारा नहीं हो जाता।
क्या कहता है जन-प्रतिनिधित्व अधिनियम?
–  जन-प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 8 दोषी राजनेताओं को चुनाव लड़ने से रोकती है। लेकिन ऐसे नेता जिन पर केवल मुकदमा चल रहा है, वे चुनाव लड़ने के लिये स्वतंत्र हैं। इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि उन पर लगा आरोप कितना गंभीर है।
–  इस अधिनियम की धारा 8(1) और 8(2) के अंतर्गत प्रावधान है कि यदि कोई विधायिका सदस्य (सांसद अथवा विधायक) हत्या, बलात्कार, अस्पृश्यता, विदेशी मुद्रा विनियमन अधिनियम के उल्लंघन; धर्म, भाषा या क्षेत्र के आधार पर शत्रुता पैदा करना, भारतीय संविधान का अपमान करना, प्रतिबंधित वस्तुओं का आयात या निर्यात करना, आतंकवादी गतिविधियों में शामिल होना जैसे अपराधों में लिप्त होता है, तो उसे इस धारा के अंतर्गत अयोग्य माना जाएगा एवं 6 वर्ष की अवधि के लिये अयोग्य घोषित कर दिया जाएगा।
लेकिन धारा 11 के तहत चुनाव आयोग को विशेष अधिकार दिया गया है कि विशेष कारण देकर आयोग 6 साल की चुनाव न लड़ पाने की अवधि को कम कर सकता है या उनको चुनाव लड़ने पर प्रतिबंध को पूरी तरह खत्‍म कर सकता है।

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