किताब और गुलाब

चल पड़े वो नन्हें बाल, पीठ में धरे बैग बन ठन के ।
लगते हैं जैसे नवेली दुल्हन के पैरों की पायल खनके ।
चलते हुए राह में मिला उन्हें गुलाब का फूल ।
लेकर नन्हें हाथों से रख पन्नों के बीच यही इनका उसूल ।
ये प्रथा पुरानी रखना किताब के पन्ने के बीच गुलाब ।
कोई हमें बताएं, क्या है इसका मतलब और इसका जवाब ।
वो बाल अब बन गया, बड़ा बनकर साहब ।
घर में दादी मां को मिली उसकी वो किताब ।
यादें बचपन की ताजा हुई जब देख वो रखा हुआ गुलाब ।
समझ न पाया आज तलक क्या होगा इसका जवाब !
आकर साहब से पूछे दादी मां याद है वो बालपन ।
देख किताब के बीच वो गुलाब और खुशी से हो गया मन प्रसन्न ।
तब चला देखने महबूबा, लेकर हाथ में एक गुलाब ।
हो गई मोहब्बत, आज समझा कि ये ‘गुलाब’ , क्या लाजवाब!

दिलाराम भारद्वाज ‘ दिल ‘
मण्डी , हिमाचल प्रदेश ।

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