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कश्मीर का ‘आधा’ नहीं ‘पूरा सच’ जानिए

पक्ष-विपक्ष: कश्मीर का ‘आधा’ नहीं ‘पूरा सच’ जानिए

BY-अमरेंद्र कुमार राय | 11 Dec 2023

भारत,राजनीति

दरअसल यह अमित शाह और किरन रिजिजू की बात नहीं है। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ आज़ादी के बाद से ही इन मुद्दों को उठाता रहा है और तथ्यों को आधा-अधूरा और तोड़-मरोड़ कर पेश करता रहा है।

पक्ष-विपक्ष: कश्मीर का ‘आधा’ नहीं ‘पूरा सच’ जानिए

प्रतीकात्मक तस्वीर। PTI

देश की आज़ादी के साथ ही कश्मीर एक प्रमुख और विवादास्पद मुद्दा रहा है। विवाद की मुख्य वजहों में कश्मीर को विशेष राज्य का दर्जा दिया जाना, जब सभी राज्यों का विलय तत्कालीन गृह मंत्री सरदार बल्लभ भाई पटेल करा रहे थे तो कश्मीर का विलय जवाहर लाल नेहरू ने अपने हाथ में क्यों लिया ?, जब भारतीय सेना जीत रही थी तो युद्ध विराम क्यों किया गया और कश्मीर के मामले को संयुक्त राष्ट्र में ले जाने की जरूरत ही क्या थी? जैसे सवाल प्रमुख हैं।

अभी संसद के मौजूदा सत्र में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने फिर इस विवाद को गरमा दिया। जम्मू-कश्मीर आरक्षण (संशोधन) विधेयक 2023 और जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन (संशोधन) विधेयक 2023 पर सदन में हुई चर्चा का जवाब देते हुए उन्होंने कहा कि देश के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू के कार्यकाल के दौरान हुए दो बड़े ब्लंडर (गलतियों) का खामियाजा जम्मू कश्मीर को वर्षों तक भुगतना पड़ा।

ये दो गलतियां 1947 में आज़ादी के कुछ समय बाद पाकिस्तान के साथ युद्ध के समय संघर्ष विराम करना और जम्मू-कश्मीर के मामले को संयुक्त राष्ट्र ले जाने की थी। इसी तरह देश के कानून मंत्री किरन रिजिजू ने पिछले साल कहा था कि जम्मू और कश्मीर के शासक महाराजा हरि सिंह ने जवाहर लाल नेहरू को कई बार कश्मीर के देश में विलय के लिए संदेश भेजे लेकिन भारत के पहले प्रधानमंत्री ने इसे नजरंदाज कर दिया।

दरअसल यह अमित शाह और किरन रिजिजू की बात नहीं है। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ आज़ादी के बाद से ही इन मुद्दों को उठाता रहा है और तथ्यों को आधा-अधूरा और तोड़-मरोड़ कर पेश करता रहा है। अब उसकी राजनीतिक इकाई और सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी उसी को आगे बढ़ा रही है।

सदन में ही विपक्ष के नेता अधीर रंजन चौधरी ने अमित शाह के दावे को चुनौती दी और कहा कि यह एक गंभीर मुद्दा है और इस पर पूरे एक दिन गंभीरता से चर्चा होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि देश का इतिहास सिर्फ अमित शाह ही नहीं जानते हैं बल्कि बाकी लोग भी जानते हैं।

उन्होंने लोकसभा अध्यक्ष से इस मुद्दे पर विस्तृत चर्चा कराने की मांग की। लेकिन इस पर विस्तृत चर्चा शायद ही कभी कराई जाए। क्योंकि तब सारे तथ्य सदन में पेश होंगे। किस्से-कहानियों की कलई खुल जाएगी।

भाजपा इस मुद्दे पर कभी भी गंभीर चर्चा नहीं करानी चाहेगी क्योंकि उसका आधा सच पकड़ा जाएगा और पूरा सच सबके सामने आ जाएगा। वह इस मुद्दे को “हिट और रन” ( मारो और भाग जाओ ) तक ही सीमित रखना चाहती है।

बंटवारे के समय देश में कुल 563 रियासतें थीं। उन रियासतों को अधिकार दिया गया कि वे भारत और पाकिस्तान दोनों देशों में से जिस किसी भी देश में मिलना चाहें मिल सकती हैं। 560 रियासतों का मुद्दा तो आसानी से सुलझ गया लेकिन तीन रियासतों का मुद्दा पेचीदा था। ये रियासतें थीं जम्मू-कश्मीर, जूनागढ़ और हैदराबाद।

जम्मू-कश्मीर के राजा हिंदू थे और ज्यादातर प्रजा मुस्लिम जबकि जूनागढ़ के नवाब मुस्लिम थे और ज्यादातर प्रजा हिंदू। ये दोनों ही रियासतें भारत-पाकिस्तान की सीमा पर थीं। ये जिधर चाहतीं उधर शामिल हो सकती थीं।

जूनागढ़ का नवाब पाकिस्तान के साथ अपने राज्य का विलय करना चाहता था लेकिन उसके विलय से पहले ही उसके दो इलाकों को भारत में मिला लिया गया। बाद में और कोई चारा न देखकर नवाब पाकिस्तान भाग गया।

तब बाद में वहां जनमत संग्रह कराया गया। जो लोग जम्मू-कश्मीर में जनमत संग्रह पर नेहरू को घेरने की कोशिश करते हैं उन्हें यह नहीं पता है कि उससे पहले जूनागढ़ में जनमत संग्रह कराया जा चुका है। वहां की 90 प्रतिशत जनता ने भारत में विलय के पक्ष में वोट किया और तब जूनागढ़ को भारत में मिलाया गया।

जबकि कश्मीर के राजा हरि सिंह न भारत के साथ मिलना चाहते थे न पाकिस्तान के साथ। वे अपने राज्य को दोनों से अलग स्वतंत्र राज्य बनाये रखना चाहते थे। हैदराबाद का निजाम मुसलमान था, वहां की प्रजा में भी मुसलमानों की तादाद ठीकठाक थी लेकिन वह भारत के बीचोबीच था। इसलिए वह चाहकर भी पाकिस्तान में अपने राज्य का विलय नहीं कर सकता था।

आखिर में वह भी पाकिस्तान भाग गया। उन दोनों नवाबों के पाकिस्तान भाग जाने और उनके राज्यों को भारत में मिला लिये जाने से उन दोनों राज्यों का मसला भी अंतत सुलझ गया। लेकिन हरि सिंह की स्वतंत्र रहने की इच्छा के कारण पेचीदगी बनी रही।

तब कश्मीर देश की चार प्रमुख रियासतों में से एक थी। वहां की ज्यादातर आबादी मुस्लिम होने के कारण सरदार पटेल की उसे भारत में मिलाने की दिलचस्पी न के बराबर थी। वे उसे झंझट मानते थे। कहते भी थे कि मुसलमानों का सिरदर्द कौन मोल ले। भौगोलिक रूप से भी कश्मीर पाकिस्तान से ज्यादा जुड़ा था। उसके लिए दिल्ली दूर पड़ती थी जबकि पेशावर करीब।

राज्य के रास्ते कश्मीर और लाहौर से बेहतर ढंग से जुड़े थे वनस्पत दिल्ली के। वहां का हवाई अड्डा भी करीब पड़ता था। उसके व्यापार के रास्ते भी पाकिस्तान से ही सुलभ थे। लेकिन जवाहर लाल नेहरू को कश्मीर से विशेष लगाव था। वे उसे भारत में मिलाने के लिए हर कोशिश कर रहे थे। लेकिन वो कामयाब नहीं हो रही थी। वजह थी वहां के महाराजा हरि सिंह की स्वतंत्र बने रहने की इच्छा।

वायसराय माउंट बेटन ने भी हरि सिंह को समझाने की कोशिश की। कहा- उनका स्वतंत्र बने रहना नामुमकिन है, इसलिए वे जिस देश में चाहें अपने राज्य का विलय कर लें। लेकिन हरि सिंह नहीं माने। जब उन पर दबाव बढ़ने लगा तो वे दोनों देशों से सौदेबाजी करने लगे। वे अपने लिए ज्यादा से ज्यादा रियायतें चाहते थे।

भारत जहां तार्किक ढंग से उनसे बात कर रहा था वहीं पाकिस्तान के मोहम्मद अली जिन्ना उनकी हर बात मानने को तैयार थे। लेकिन लिखित में वे कुछ भी देने को तैयार नहीं थे। उनकी मंशा ये थी कि एक बार हरि सिंह कश्मीर का विलय पाकिस्तान में कर दें, कानूनी तौर पर पाकिस्तान का अधिकार हो जाए फिर हरि सिंह से जैसे चाहें निपट लेंगे।

हरि सिंह भी जिन्ना की इस चाल को समझ रहे थे। उन्होंने एक व्यापार संबंधी प्रस्ताव भारत और पाकिस्तान दोनों के पास भेजा। उस प्रस्ताव में यह था कि कश्मीर के सामान को ले जाने वाले व्यावसायिक वाहनों को भारत और पाकिस्तान दोनों ही बेरोकटोक जाने दें। जिस पर पाकिस्तान ने तो दस्तखत कर दिये लेकिन भारत ने उसका कोई जवाब नहीं दिया।

दरअसल पाकिस्तान की भी उसको मानने की कोई इच्छा नहीं थी। वह तो बस यह चाहता था कि किसी भी तरह से हरि सिंह कश्मीर का विलय उसके साथ कर दें। लेकिन जब उसने देखा कि हरि सिंह अपने राज्य का पाकिस्तान में विलय नहीं कर रहे हैं तो उसने इनकी गाड़ियों की रोकाटोकी शुरू कर दी।

15 अगस्त 1947 को भारत आजाद हो गया। उससे एक दिन पहले पाकिस्तान आजाद हो गया था। लेकिन दो महीने बीत जाने के बाद भी हरि सिंह ने अपने राज्य का विलय किसी भी देश के साथ नहीं किया।

जिन्ना ने जब देखा कि हरि सिंह नहीं मान रहे हैं तो उसने कश्मीर को हासिल करने की नई रणनीति बनाई। उसने वजीरिस्तान से जनजातीय लश्करों ( मिलीशिया ) को भड़का दिया और उन्हें गोला-बारूद देकर कश्मीर की सीमा में घुसा दिया।

पाकिस्तान के पश्तून आदिवासी लड़ाकों ने 22 अक्टूबर को राज्य की सीमा पार कर ली। इनमें पाकिस्तानी सैनिक भी भेष बदलकर शामिल हो गये थे। ये सब मिलकर श्रीनगर पर कब्जे के लिए आगे बढ़े। बारामूला पहुंचकर उन्होंने लूटपाट और कत्लेआम शुरू कर दिया। राज्य को हाथ से निकलता देख हरि सिंह ने भारत के वायसराय माउंटबेटन से सैनिक मदद की गुहार लगाई।

लेकिन वायसराय ने यह कहकर मना कर दिया कि चूंकि उन्होंने अपने राज्य का विलय भारत में नहीं किया है लिहाजा उनकी सैनिक मदद नहीं की जा सकती। तब मजबूर होकर हरि सिंह ने 26 अक्टूबर को कश्मीर के भारत में विलय संबंधी दस्तावेज पर दस्तखत किये और 27 अक्टूबर को भारतीय सेना श्रीनगर पहुंच गई।

जो लोग जोर-जबरदस्ती और अनैतिक कामों में विश्वास करते हैं वे महात्मा गांधी और नेहरू की नैतिक और आदर्शवादी बातों को समझ ही नहीं सकते। अब आप जरा अमित शाह का बयान देखिये। उन्होंने कहा कि जब भारतीय सेना जीत रही थी तब नेहरू ने संघर्ष विराम कर दिया। ऐसा लगता है कि भारतीय सेना पहुंची और उसने आनन-फानन में एक बड़े इलाके को अपने अधीन कर लिया और उसे तीन दिन का और मौका मिला होता तो वह पूरे कश्मीर पर कब्जा कर लेती।

इस तरह आज पाक अधिकृत कश्मीर का लफड़ा ही नहीं होता। लेकिन अब जरा तथ्यों पर विचार करिये। भारतीय सेना 27 अक्टूबर 1947 को श्रीनगर पहुंची। नेहरू इस मसले को एक जनवरी 1948 को संयुक्त राष्ट्र में ले गये। मतलब पूरा नवंबर और दिसंबर दो महीने तक भारतीय सेना युद्ध करती रही लेकिन वह पूरा इलाका नहीं जीत पाई।

फिर सिर्फ तीन दिन में वह पूरा कश्मीर कैसे जीत लेती? लेकिन युद्ध तो मसले को संयुक्त राष्ट्र में ले जाने के बावजूद चलता रहा। बाद में इसमें पाकिस्तानी सेना भी खुलकर सामने आ गई। यह युद्ध कोई दो-चार दिन या दा-चार महीने नहीं चला बल्कि पूरे एक साल दो महीने और दो सप्ताह तक चला। 22 अक्टूबर 1947 को शुरू हुआ युद्ध पांच जनवरी 1949 औपचारिक युद्ध विराम के साथ समाप्त हुआ।

इसी तरह से मसले को संयुक्त राष्ट्र ले जाने की बात है। अमित शाह, बीजेपी और संघ का मानना है कि अगर नेहरू कश्मीर मसले को संयुक्त राष्ट्र संघ में न ले गये होते तो जनमत संग्रह वाली बात भारत के गले न पड़ती। लेकिन वे यह बात भूल जा रहे हैं कि जनमत संग्रह की बात तो पहले ही सामने आ चुकी थी।

वायसराय ने विलय पत्र को स्वीकार करते समय ही लिख दिया था कि जनमत संग्रह की शर्त पर स्वीकार। एक शांति प्रिय व्यक्ति झगड़े को सुलझाने के लिए क्या करता है। खुद बात करता है, कुछ लोगों के जरिये बात कराता है,

मामला फिर भी न सुलझे तो खुद हथियार उठाकर गुंडई नहीं करने लगता बल्कि वह पुलिस के पास जाता है और उसकी शिकायत करता है। प्रशासन की मदद लेता है और कोर्ट में जाता है।

नेहरू ने वही सब किया। यह दो लोगों के बीच का झगड़ा नहीं बल्कि दो देशों के बीच का झगड़ा था। उन दो देशों के बीच जो कल तक एक ही थे। नेहरू आदर्शवादी व्यक्ति थे। उन्होंने इस मुद्दे को हमेशा के लिए अंतरराष्ट्रीय मंच पर जाकर सुलझाने की कोशिश की। वह भी सिर्फ अपनी मर्जी से नहीं बल्कि वायसराय माउंटबेटन की सलाह पर।

इसमें एक और तथ्य है जो बहुत कम लोगों को पता है। लेकिन अमित शाह को जरूर पता होगा क्योंकि वे गृह मंत्री हैं। उन्होंने जानबूझकर उसका जिक्र नहीं किया होगा। वो बात है विलय संबंधी दस्तावेज पर स्वीकृति देते समय माउंटबेटेन की टिप्पणी।

उन्होंने विलय संबंधी दस्तावेज पर एक कोने में लिखा था जनमत संग्रह की शर्त पर स्वीकार। गनीमत है अभी तक बीजेपी और संघ के लोग यह नहीं कह रहे हैं कि नेहरू को हरि सिंह के विलय का इंतजार नहीं करना चाहिए था। जबरन कश्मीर को भारत में मिला लेना चाहिए था।

रिटायर्ड आईपीएस शैलेंद्र प्रताप सिंह काफी पढ़ाकू व्यक्ति हैं। रिटायर होने के बाद उन्होंने देश के ज्यादातर विवादास्पद और चर्चित मामलों का अध्ययन किया है। कश्मीर मसले पर भी उन्होंने काफी अध्ययन किया है और विस्तार से लिखा है। वायसराय के जनमत संग्रह वाली बात का उन्होंने भी जिक्र किया है।

वे कहते हैं राजा हरि सिंह स्वतंत्र कश्मीर के लिए अंत तक प्रयासरत रहे। उन्होंने विलय पत्र पर तब दस्तखत किये जब कश्मीर उनके हाथ से करीब करीब निकल चुका था। सचिव वीपी मेनन 26 अक्टूबर 1947 को महाराजा के हस्ताक्षर के साथ विलय का जो दस्तावेज श्रीनगर से लेकर आए थे उस पर हस्ताक्षर करते समय माउंटबेटन ने हाशिये पर लिख दिया था जनमत संग्रह की शर्त पर स्वीकार।

तीन दिन में बाकी बचे कश्मीर को जीत लेने के मुद्दे पर वे कहते हैं कि कहना आसान होता है करना बहुत मुश्किल। युद्ध एक साल से ज्यादा चला फिर भी पूरा कश्मीर खाली नहीं हो पाया। इस बारे में उनका कहना है कि भारत और पाक दोनों ही सेना के कमांडर जनरल अंग्रेज ही थे। दोनों देशों के अधिकारी प्राय: एक ही जगह प्रशिक्षित हुए थे।

थोड़े ही दिनों पहले दूसरे विश्वयुद्ध में साथ-साथ लड़े थे। इस तरफ और उस तरफ के सारे अधिकारी आपस में बैचमेट, जूनियर, सीनियर या दोस्त थे। ऐसे उदाहरण हैं जहां अधिकारी ने मातहतों को उधर के दोस्त को दिखाकर या हुलिया बताकर हिदायत दी कि और चाहे जिसको मारो, मेरे दोस्त को गोली नहीं लगनी चाहिए। नेहरू के कश्मीर मुद्दे को संयुक्त राष्ट्र में ले जाने के सवाल पर वे कहते हैं कि आप चाहे नेहरू की जितनी आलोचना करें लेकिन नेहरू पर माउंटबेटन का इस बात के लिए दबाव था।

फिर दूसरी तरफ नेहरू को कश्मीरी जनता पर भी विश्वास था। वे मानते थे कि जनमत संग्रह के दौरान कश्मीरी जनता भारत में विलय के पक्ष में वोट करेगी। अच्छी बात ये है कि उसकी नौबत ही नहीं आई। न पाकिस्तान ने संयुक्त राष्ट्र के सेना हटाने के प्रस्ताव को माना न जनमत संग्रह कराने की नौबत आई।

शैलेंद्र सिंह कहते हैं कि बल्लभ भाई पटेल शुरू से ही कश्मीर में टांग अड़ाने के खिलाफ थे। लेकिन वहां युद्ध अब एक सच्चाई बन चुका था। युद्ध पर हो रहे खर्चे से भी पटेल परेशान थे। वे यह भी देख रहे थे कि युद्ध लंबा खिंचता जा रहा है।

कश्मीर के मामले को उस समय एन गोपालस्वामी अयांगर देख रहे थे। पटेल ने चार जून 1948 को उन्हें एक पत्र लिखा जिसमें मिलिट्री स्थिति की गंभीरता का जिक्र किया। उन्होंने पत्र में लिखा-मिलिट्री पोजीशन बहुत अच्छी नहीं है। मैं इस बात से डरा हुआ हूं कि मिलिट्री रिसोर्सेज पर उच्च स्तर पर दबाव बढ़ रहा है। इस दुर्भाग्यपूर्ण मामले को पता नहीं कब तक सहना पड़ेगा।

शैलेंद्र सिंह कहते हैं- पटेल ने यह पत्र जून में लिखा था जबकि उसके बाद भी लड़ाई छह महीने और चली। जो लोग तीन दिन और लड़ने की बात कर रहे हैं उन्हें स्थितियों के बारे मे बिलकुल भी नहीं पता है।

“गांधी गोडसे : एक युद्ध” के मशहूर लेखक असगर वजाहत कहते हैं कि नेहरू जी लोकतात्रिक व्यक्ति थे। वे अपने फैसलों में तानाशाही नहीं चलाते थे। इसलिए जो भी फैसला मंत्रिमंडल में लिया जाता था वह सामूहिक होता था। इसलिए कश्मीर पर जो भी फैसला लिया गया वह नेहरू का नहीं बल्कि सामूहिक था। न केवल कश्मीर बल्कि जूनागढ़ में जनमत संग्रह और हैदराबाद में पुलिस एक्शन का फैसला भी सामूहिक ही था।

आज की जो स्थिति कश्मीर की है वह पहले नहीं थी। कश्मीर पर जब पाकिस्तान ने हमला किया और भारतीय सेना ने जब उन्हें पीछे धकेल दिया तो नेहरू जी कश्मीर गये। वहां श्रीनगर के लाल चौक पर हजारों कश्मीरी लोगों की भीड़ ने उनका स्वागत किया। तब शेख अब्दुल्ला नेहरू जी के साथ थे। नेहरू जी ने वो सब देखा था। जब तक भारतीय सेना वहां नहीं पहुंची थी तब तक शेख अब्दुल्ला के नेतृत्व में कश्मीरियों ने ही पाक सैनिकों को रोकने की कोशिश की। नेहरू जी को पूरा विश्वास था कि जब भी जनमत संग्रह होगा कश्मीर भारत के साथ रहने का फैसला लेगा।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। विचार व्यक्तिगत हैं।)

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