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किसी भी अपराध के बाद सच्चाई को स्वीकारने से डरती क्यों है सरकार?

किसी भी अपराध के बाद सच्चाई को स्वीकारने से डरती क्यों है सरकार?
सुरेश महापात्र।
मौजूदा वक्त में पूरे देश में विभिन्न राज्यों में अलग—अलग किस्म के अपराध को लेकर विवाद की स्थिति है। सभी राज्यों में सत्ता और विपक्ष अपराध के बाद हालात पर आमने—सामने खड़े हैं। मीडिया भी बंटा हुआ है। खबरों की हैडिंग और प्रस्तुतिकरण में साफ तौर पर राज्य सत्ता के हिसाब से खबरें प्रस्तुत की जा रही हैं। यही वह वजह है जिसने सबसे ज्यादा संदेह खड़ा किया है।
दरअसल हमे राज्य की व्यवस्था और विवशता के बीच पुलिस (P0LICE)की व्यवस्था को देखना होगा। संविधान में पुलिस की व्यवस्था को स्पष्ट तौर पर रेखांकित किया गया है। पुलिस को एक दायरे में रहकर काम करना होता है। यह दायरा मानव अधिकार के नियमों से भी सीमित किया गया है। बावजूद इसके पुलिस पर ही सबसे ज्यादा अत्याचार के मामले लगते हैं।
जहां भी अपराध(CRIME) में पु​लिस का नाम शामिल होता है वहां राज्य की सत्ता स्वत: शामिल हो जाती है। पुलिस को राज्य की सत्ता के प्रति जवाबदेही के साथ सीधे तौर पर जोड़ा गया है। कानून और व्यवस्था के साथ पुलिस पर नियंत्रण का सर्वाधिकार राज्य की सत्ता के अधीन होता है।
इसीलिए जिस किसी राज्य में अपराध होता है तो सीधे तौर पर जवाबदेही राज्य सरकार की होती है। पुलिस का काम ही अपराध में नियंत्रण करना होता है। बहुधा अपराध नियंत्रण में समाज के कमजोर और उच्चवर्ग के बीच भेदभाव साफ तौर पर दिखता है।
किसी गरीब के अपराध पर उसे पुलिस पूरी सहजता के साथ पकड़ लेती है और उसे कानून के मुताबिक कार्यवाही दर्शा लेती है। किसी गरीब के विरूद्ध अमीर के मसले पर पुलिस का रवैया राज्य सत्ता के साथ तालमेल करता दिखाई देता है। यही अक्सर विवाद और विषाद का विषय होता है।
सवाल यह नहीं है कि अपराध घटित हुआ। सवाल यह है कि अपराध घटित होने दौरान और उसके बाद पुलिस की भूमिका क्या रही? यह सर्वविदित है कि समाज में हर तरह के लोग होते हैं सभी से मिलकर समाज बनता है। समाज के भीतर राजनीति और सामाजिक स्थिति के साथ पुलिस की भूमिका भी कमजोर और मजबूत होती रही है। यह कई घटनाओं में साफ तौर पर देखा गया है।
चूंकि पुलिस पर नियंत्रण का सर्वाधिकार राज्य सत्ता का है तो ऐसे में हर मामले के बाद राज्य सत्ता की ही जवाबदेही बनती है। दिल्ली में निर्भया के साथ बलात्कार के मामले के बाद पूरे देश में एक अलग किस्म की जागृति आई। बलात्कार और हत्या की नृशंसता के खिलाफ समूचा मानव समाज एकजुट होकर खड़ा हो गया। ऐसे मामलों में अपराधियों को जल्द से जल्द और कड़ी से कड़ी सजा की मांग भी उठी। पर इस मामले में कानूनी प्रावधानों के बाद भी सजा के लिए लंबा इंतजार किया गया।
यही वजह रही ​कि तेलंगाना के हैदराबाद में बलात्कार और हत्या की वारदात के बाद पुलिस ने ऐसे सरकमइस्टेंस दिखाए कि जिससे मुठभेड़ प्रतीत होता है सारे आरोपियों को मुठभेड़ में मारने का दावा किया। इस घटना के बाद एक बार फिर मानव समाज में आरोपी, अपराधी और सजा को लेकर कानूनी व्याख्या की गई।
लोग अपराधियों के खिलाफ सजा चाहते हैं। आरोपियों की हत्या नहीं…! यह स्पष्ट है कि किसी भी सभ्य समाज में पुलिस को अपराध पर नियंत्रण के लिए अपराधी बनने का समर्थन कतई नहीं किया जा सकता। मैं व्यक्तिगत तौर पर बस्तर में नक्सल मामले में पुलिस की भूमिका को कई बार ऐसा ही महसूस करता रहा हूं। हम नक्सलियों से संविधान के मुताबिक काम की उम्मीद ही नहीं कर सकते। पर पुलिस से तो करना ही होगा। यह सर्वविदित है माओवादी सीधे तौर पर अपराध कर रहे हैं। जिस पर नियंत्रण के लिए ही फोर्स की तैनाती की गई है।
ऐेसे में राज्य सत्ता पर सबसे ज्यादा सवाल तब उठते हैं जब किसी अपराध के बाद पुलिस की भूमिका संदिग्ध दिखती है। तो यह संदेश साफ तौर पर जाता है कि अपराधियों पर पुलिस की सरपरस्ती राज्य सत्ता के कारण ही हो रहा है।
यह किसी एक राज्य की समस्या नहीं है बल्कि देश के सभी राज्यों में ऐसी ही स्थि​तियों ने लोगों को चिंता में डालने का काम किया है। ऐसा भी नहीं है कि राज्य सत्ता खुले तौर पर किसी अपराधी के संरक्षण के लिए कानून को अपना काम करने से रोक रही है।
बल्कि मीडिया क्रियेटेड परसेप्शन से एक ही तरह की घटना के लिए एक राज्य अपराध का गढ़ और बेबस दिखता है। मीडिया क्रियेटेड परसेप्शन के पीछे के कारण अलग—अलग हो सकते हैं पर हकीकत में अपराध तो अपराध ही होता है। इसका प्रभाव लोगों पर ही पड़ता है।
यदि सरकारें राज्य में होने वाली अपराधों के लिए समभाव नियंत्रण की भूमिका का निर्वहन करें और राजनीतिक हस्तक्षेप से आरोपियों को सरपरस्ती देने से बचने की कोशिश करें तो सारा विवाद ही खत्म हो सकता है। क्योंकि पुलिस काम करने को तैयार है इस पुलिस को राजनैतिक हथियार बनाने की प्रक्रिया से राज्य सरकारों को बाज आना चाहिए।
मामला चाहे उत्तर प्रदेश के हाथरस में मनिषा के बलात्कार व हमले के बाद मौत का हो या उत्तर प्रदेश के ही अन्य शहरों में ऐसी घटनाओं का। राजस्थान में बलात्कार व हत्या की वारदात हो या महाराष्ट्र में अभिनेता सुशांत की मौत के बाद खुले ड्रग जाल का हो। यहां छत्तीसगढ़ के बलरामपुर में बलात्कार का या इसी राज्य के कांकेर में सरे राह पिटे गए पत्रकारों का…
सभी में राज्य सत्ता का दोष स्पष्ट है। क्योंकि अपराध से घृणा करो अपराधी से नहीं… यह कहना सरल है अमल कर पाना कठिन… राज्य में लोकतांत्रिक तौर पर चुनी हुई सरकार से अपराध के नियंत्रण के मसले पर ईमानदारी की अपेक्षा हर सभ्य नागरिक को होना ही चाहिए। पर जब सरकारें अपराध के बाद सच्चाई स्वीकारने से बचने की कोशिश करती हैं तो पुलिस को ढाल बनाकर खड़ा कर देती हैं… यही प्रक्रिया रोकनी चाहिए…

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं. इस आलेख में दी गई किसी भी सूचना की सटीकता, संपूर्णता, व्यावहारिकता अथवा सच्चाई के प्रति ATAL HIND उत्तरदायी नहीं है. इस आलेख में सभी सूचनाएं ज्यों की त्यों प्रस्तुत की गई हैं. इस आलेख में दी गई कोई भी सूचना अथवा तथ्य अथवा व्यक्त किए गए विचार #ATALHIND के नहीं हैं, तथा atal hind उनके लिए किसी भी प्रकार से उत्तरदायी नहीं है.

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