कैथल जिले में आसान नहीं है भाजपा की राहें ! जिले की चारों विधानसभा सीटें भाजपा से दूर होती दे रही हैं दिखाई !

कैथल जिले में आसान नहीं है भाजपा की राहें !

जिले की चारों विधानसभा सीटें भाजपा से दूर होती दे रही हैं दिखाई !

KAITHAL BJP कैथल, 17 अक्तूबर (कृष्ण प्रजापति/राजकुमार अग्रवाल): विपक्ष के कमजोर पड़ते ही बेशक भारतीय जनता पार्टी ने पूरे प्रदेश में अबकी बार 75 पार का नारा दिया हो लेकिन भारतीय जनता पार्टी के प्रत्याशियों के दिन प्रतिदिन वायरल हो रही वीडियो से भाजपा की मुश्किलें बढ़ने की संभावनाएं लगातार तेज हो रही हैं। बात करें अगर कैथल जिले की तो यहां पर वर्ष 2014 के विधानसभा चुनाव में केवल गुहला विधानसभा सीट जीतने में ही भाजपा कामयाब हुई थी और तीन सीटों पर भाजपा को हार का सामना करना पड़ा था। कैथल विधानसभा से उस समय कांग्रेसी उम्मीदवार रणदीप सुरजेवाला ने जीत दर्ज की थी। पुंडरी और कलायत विधानसभा से आजाद उम्मीदवारों ने जीत दर्ज की थी। अब मिशन 2019 का नारा लेकर जहां भाजपा का छोटे से छोटा कार्यकर्ता भी खुद को बड़ा नेता बताकर जनता के बीच पहुंचने लगा था और भारतीय जनता पार्टी में अन्य दलों से आए नेताओं ने भी टिकट को लेकर अपनी-अपनी दावेदारी पेश कर दी थी। इसके बाद भारतीय जनता पार्टी में एक एक विधानसभा से 20-20 उम्मीदवार तैयार हो गए थे लेकिन जैसे ही टिकट आबंटन में नेताओं का टिकट कटा तो उन्होंने भाजपा के खिलाफ विरोध भी शुरू कर दिया था। जो लोग टिकट मिलने से पहले कमल खिलेगा, कमल खिलेगा, के नारे और अबकी बार ईमानदार सरकार की बात कर रहे थे, वही लोग भारतीय जनता पार्टी के उम्मीदवारों के लिए मुसीबत बन कर सामने आ रहे हैं। हालांकि कुछ नेता पार्टी छोड़ने की धमकी देने के बाद चुनाव प्रचार में प्रत्याशियों के साथ जरूर हैं लेकिन कहीं ना कहीं उनके द्वारा भितरघात का डर भाजपा प्रत्याशियों के लिए बना हुआ है। कैथल जिले में 2 सीट ऐसी है जहां पर भारतीय जनता पार्टी का टिकट ना मिलने पर नेताओं ने आजाद चुनाव लड़ने का ऐलान किया है। अगर पुंडरी विधानसभा की बात करें तो विधानसभा चुनावों से पहले ही भाजपा में शामिल हुए निवर्तमान विधायक प्रो० दिनेश कौशिक और लगभग 33 वर्षों से भारतीय जनता पार्टी से जुड़े हुए नेता रणधीर गोलन टिकट के प्रबल दावेदार थे लेकिन ऐन वक्त पर भाजपा ने करनाल निवासी वेदपाल एडवोकेट को भाजपा का कमल थमाकर विधानसभा का प्रत्याशी बना दिया जिसके बाद अपने अपने कार्यकर्ताओं से संपर्क साध कर दिनेश कौशिक और रणधीर गोलन ने आजाद उम्मीदवार के तौर पर अपना पर्चा भर दिया। वहीं पुंडरी सीट से आजाद चुनाव लड़ रहे नरेंद्र शर्मा की पृष्ठभूमि भी भाजपा की रही है और अब हल्के में चर्चा है कि जहां ये तीन उम्मीदवार भारतीय जनता पार्टी के वोट बैंक में कैंची मारने का काम करेंगे तो वहीं इन नेताओं के साथ जुड़े वर्कर व भाजपा कार्यकर्ता भी नेताओं के साथ खुलकर सामने आ रहे हैं और भाजपा प्रत्याशी का विरोध कर रहे हैं। वे नेता आजकल कमल के निशान पर चुनाव लड़ रहे भाजपा प्रत्याशी की जमानत जब्त होने तक की बात कह रहे हैं।

 

 

अगर कैथल विधानसभा की बात करें तो वर्ष 2014 में इनेलो से भाजपा में शामिल हुए लीलाराम मैदान में है लेकिन कुछ दिन पहले करनाल रोड पर एक कार्यालय का उद्घाटन अवसर पर उनके मुंह से 21 अक्टूबर को चश्मे के निशान पर बटन दबाने की बात कहने की वायरल हुई वीडियो के बाद चुनावी माहौल उनके खिलाफ हो गया। इसके अलावा जिन भाजपा नेताओं की टिकट कटी है और टिकट पाने के लिए लाखों रुपए खर्च करके घर बैठने वाले नेता भितरघात करने के जुगाड़बाजी में लगे हुए हैं, हालांकि शीर्ष नेतृत्व के दबाव में एकाध जगह वे नेता मंच सांझा जरूर करते हैं लेकिन अंदर खाते अलग खिचड़ी पक रही है। कैथल विधानसभा की सीट से कांग्रेस के मजबूत प्रत्याशी होने के चलते खुद मुख्यमंत्री को 25 बार आना पड़ा और भारतीय जनता पार्टी की सरकार बनाने का आह्वान करना पड़ा। शुरू में चर्चा थी कि मुख्यमंत्री खुद यहां से चुनाव लड़ सकते हैं लेकिन चुनाव मैदान में अब लीलाराम को उतारा है। लीलाराम के वर्ष 2000 के कार्यकाल में भी कुछ खास विकास कार्य नहीं हो पाए थे जिनका जनता को मलाल जरूर है। अपने चुनावी जनसंपर्क अभियान में रणदीप सुरजेवाला ने लीलाराम के कार्यकाल को गुंडागर्दी का कार्यकाल बताया है, वही क्योड़क गांव से आज भी सुरजेवाला का पलड़ा भारी होने के चलते लीलाराम के लिए बहुत बड़ी मुसीबत खड़ी हो सकती है। कैथल विधानसभा के अनेक ऐसे गांव हैं जहां पर जाट बाहुल्य क्षेत्र है और उस क्षेत्र में भाजपा प्रत्याशी का खाता खुलने तक की गारंटी नहीं है। वहीं गुहला विधानसभा में भाजपा इस समय मुकाबले से बाहर होती दिखाई दे रही है। राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार भारतीय जनता पार्टी के प्रत्याशी चौथे नंबर पर आ गए हैं। भाजपा की टिकट के दावेदार देवेंद्र हंस पंचायती उम्मीदवार के तौर पर चुनाव लड़ रहे हैं और उन्होंने भाजपा उम्मीदवार की मुश्किलें खड़ी करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। कलायत विधानसभा में जहां कमलेश ढांडा भाजपा उम्मीदवार हैं तो वहीं निवर्तमान विधायक जयप्रकाश चुनाव मैदान में है जोकि कांग्रेस पार्टी से चुनाव लड़ रहे हैं। ये दोनों उम्मीदवार दिग्गज जाट नेता होने के चलते जेजेपी के सतविंदर राणा भी मजबूती से आगे बढ़ रहे हैं। इसके अलावा जिन लोगों की टिकट कटी है वे भी भितरघात कर सकते हैं, इसका डर भाजपा कार्यकर्ताओं में बना हुआ है। हालांकि लोकसभा चुनाव के समय की लहर में भाजपा नेताओं का दावा कैथल जिले की चारों सीट जीतने का था लेकिन अब कैथल जिले से एक भी सीट पर कमल खिलना मुश्किल दिखाई दे रहा है।

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