Atal hind
टॉप न्यूज़ लाइफस्टाइल विचार /लेख /साक्षात्कार

कैसे लौटे बच्चों की खुशियां

कैसे लौटे बच्चों की खुशियां

आर.के. सिन्हा

कमबख्त कोरोना संक्रमण ने दुनिया को अनेकों तरह से चोट पहुंचाई है। इसने छोटे- छोटे मासूम बच्चों पर सच में बहुत ही बड़ा अन्याय किया है। उन्हें अपने दोस्तों से दूर कर दिया है। खेल के मैदानों से पूरी तरह वंचित कर दिया है I जो बच्चे रोज अपने दोस्तों के साथ खेलते-पढ़ते और मस्ती करते रहते थे, उन सब खुशियों को कमबख्त चीनी कोरोना ने उनसे छीन लिया है। वे सिर्फ घरों की चहारदीवारी तक सिमट कर रह गए हैं। वे घरों में ही रहकर ही कंप्यूटर या मोबाइल पर ही ऑनलाइन पढ़ाई करने को बाध्य हैं। किसी भी परिस्थिति में ऑनलाइन पढ़ाई क्लास रूम का तो कभी विकल्प नहीं हो सकती न ? वह क्लास रूम का हुडदंग बच्चे भूल नहीं प् रहे I पर क्या किया जाए? बच्चे स्कूल में जाकर अपने अध्यापकों के साथ-साथ अपने दोस्तों से भी बातचीत में प्रश्नोत्तर में, विचार विमर्श में बहुत कुछ सीखते थे। वह ज्ञानोपार्जन भी फिलहाल बंद हो गया है। बच्चों का स्कूल में इंटरवल के समय अपने साथियों के साथ-साथ बैठकर लंच करने का आनंद भी चल गया है। चुहुलबाजी और छिना-झपटी तो एक सपना सा बनकर ही रह गया है I

दुनिया के हरेक शख्स के लिए सुबह स्कूली बच्चों को अपने कंधे पर बैग लटकाए स्कूल जाते हुए या स्कूल की बस का इंतजार करते हुए देखना बहुत सुखद होता था। इन बच्चों को इनकी मां तैयार करके स्कूल भेजती थी। वह सिलसिला भी अब कोरोना के कारण स्थगित है। उत्तर प्रदेश, बिहार, हरियाणा वगैरह में सुबह के वक्त आप हजारों लड़कियों को साइकिल पर स्कूल जाते हुए देखा करते थे। अब तो उन दिनों की यादें ही रह गई हैं। कोरोना जाए तब तो फिर से दुनिया अपनी रफ्तार से चले।

जरा कोरोना काल से पहले के दिनों को याद कीजिए। आपको देश भर के सभी छोटे- बड़े शहरों के स्कूलों के बाहर सुबह-दोपहर में स्कूली बच्चों के आने-जाने और मस्ती से सारा माहौल खुशगवार रहा करता था। एक प्यार भरा कोलाहल अब कहाँ गया ? पर अब सब तरफ सन्नाटा है। एक उदासी सी पसरी है। स्कूल बसें स्कूलों के परिसरों में धूलों से ढकी खड़ी हैं। सामान्य दिनों में तो बच्चों को किसी खास जगह से लेने आने वाली मम्मियों के बीच भी कुछ गपशप हो जाया करती थी। हालांकि बच्चों की बसों के आते ही वह चर्चाएं भी खत्म हो जाया करती थीं।

फिलहाल बड़ा सवाल यह है कि कब कोरोना का प्रकोप खत्म होगा और इन स्कूलों और इनके आसपास की जिंदगियां सामान्य होंगी? कब इन स्कूलों के बाहर आइसक्रीम, छोले-भठूरे, आलू टिक्की, समोसे, गुलाब जामुन, बर्फ का गोला और दूसरे आइटम बेचने वाले फिऱ से आने लगेंगे। वे भी बेचारे तो स्कूलों के बंद होने से बेरोजगारी का शिकार बन गए हैं I

अगर बड़े शहरों में स्कूली बच्चे ऑनलाइन पढ़ रहे हैं, वहीं झारखंड, हिमाचल, उत्तराखंड जैसे राज्यों के दूर-दराज इलाकों की स्थिति अलग है। कोरोना काल में जहां राज्य के शहरों के बच्चे ऑनलाइन पढ़ाई कर रहे है, वहीं यहां के छोटे शहरों और गांवों के बच्चे घर की दीवार पर ही थोड़ी दूरी पर कई ब्लैकबोर्ड बना कर पढ़ रहे हैं। इस तरह से सोशल डिस्टेंसिग का पालन भी हो रहा है। जरा सोचिए कि इस कठिन दौर में दिव्यांग बच्चें किस तरह से पढ़ पा रहे होंगे। स्थिति सच में बेहद विकट है। इनकी व्यथा अलग प्रकार की है I

आपने भी महसूस किया होगा कि हाल के दौर में बच्चों के जीवन में अपना जन्म दिन उत्साहपूर्वक तरीके से मनाने की चाहत भी रहने लगी है जो नितांत स्वाभाविक है । वे अपने जन्म दिन पर अपने स्कूल और आस-पड़ोस के दोस्तों को बुलाते थे अबतक । उस दिन उनके घर में केक कटता था और स्वादिष्ट खाना पान की व्यवस्था रहती थी । फिर गीत-संगीत के दौर में नाच-गाना भी होता था । कहाँ गया बच्चों का वह आनंद ? बच्चों के लिए उनका जन्म दिन दिवाली से कम महत्व नहीं रखता। अच्छी बात यह है कि सभी अभिभावक भी अपने बच्चों की भावनाओं का ख्याल करते हुए उनके जन्मदिन को भव्य तरीके से मनाने में लग जाते हैं। इसी तरह से बच्चे अपने दोस्तों के जन्म दिन का भी इंतजार करते थे । दोस्तों के जन्म दिन पर उसके घर अवश्य ही कोई न कोई गिफ्ट लेकर जाते थे । ये सब बच्चों की प्यारी सी खिलखिलाती हुई दुनिया का अबतक अभिन्न अंग रहा हैं। कोरोना ने उनकी इस खुशी को छीन लिया है। ये सच में कोई छोटी बात नहीं है। यकीन मानिए कि इन सब वजहों के चलते बच्चों के ऊपर नकारात्मक असर तो हो रहा होगा। बच्चों से जुड़े मसलों पर अध्य़यन करने वाले विशेषज्ञों को उन उपायों के बारे में सोचना होगा ताकि बच्चों के जीवन में आई हताशा- निराशा कम से कम कुछ हद तक तो दूर किया जा सके ।

कोरोना काल से पहले बच्चे अपने माता- पिता या परिवार के किस् अन्य सदस्य के साथ बाजारों में घूमने या पिक्चर देखने जाया करते थे। इससे वे पढ़ाई के बोझ के तनाव से छुटकारा महसूस करते थे। जाहिर है कि जब स्कूल बंद है और घर के बाहर तक निकलना बंद है, तो पिकनिक पर जाने का भी कोई सवाल नहीं है। इस बार तो बच्चे गर्मियों की छुट्टी में कहीं घूमने भी नहीं गए। यानी वे घरों के अंदर ही सिमट कर रह गए हैं। जिन्हें बार-बार घूमना होता था, या खेलना होता था, वे घरों में बंद हैं। यह एक कारावासनुमा अनुभव बचारे बच्चे समझ तो नहीं पा रहे, पर माँ-बाप की बात मानने को विवश भी हैं, अजीब सी स्थिति है I

इसके साथ ही 10 वीं और 12 वीं की परीक्षाएं देने वालों के बारे में जरा भी सोचिए। अगले साल उन्हें अपनी बोर्ड की परीक्षाएं देनी हैं। सामान्य रूप से 10वीं और 12वीं की परीक्षाएं किसी विद्यार्थी के जीवन की धारा को तय कर देती हैं। हम सितंबर महीने के अंत में पहुंच रहे हैं। इस वक्त तो इन दोनों कक्षाओं के विद्र्यार्थियों की कसकर पढ़ाई चल रही होती है। वे टयूशन भी ले रहे होते हैं। पर कोरोना ने सब पूरी तरह बंद करवा दिया है।

राजधानी दिल्ली के मुखर्जी नगर में बिहार, उत्तर प्रदेश और उड़ीसा वगैरह से आए हजारों नौजवान फिलहाल अपने घरों को वापस जा चुके हैं। ये सब प्रतियोगी परीक्षाओं भाग लेने के साथ-साथ आसपास के इलाकों में ट्यूशन पढ़ा कर अपना खर्चा भी निकालते थे। चूंकि सब तरफ ऑनलाइन पढ़ाई हो रही है, इसलिए ये बाहरी राज्यों से आए नौजवान अपने घरों को चले गए। इनके लिए दिल्ली में किराएं पर रहना और खाने का इंतजाम करना बेहद कठिन था। इन्हें इस दौर में कहीं से ट्यूशन का काम नहीं मिल रहा था । इन्होंने अपने मकान मालिकों से लॉक डाउन काल का किराया माफ करने को कहा तो इनकी फरियाद भी सुनी नहीं गई। फिलहाल तो कोरोना के खत्म होने का इतंजार है, ताकि दुनिया फिर से अपनी गति से चल सके। उम्मीद की जानी चाहिए कि कोरोना से लड़ने वाली वैक्सीन जल्दी ही ईजाद हो जायेगी और सामाजिक गतिविधियाँ अपनी पटरी पर वापस आ सकेंगीं ।

(लेखक वरिष्ठ संपादक, स्तभकार और पूर्व सांसद हैं)

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं. इस आलेख में दी गई किसी भी सूचना की सटीकता, संपूर्णता, व्यावहारिकता अथवा सच्चाई के प्रति ATAL HIND उत्तरदायी नहीं है. इस आलेख में सभी सूचनाएं ज्यों की त्यों प्रस्तुत की गई हैं. इस आलेख में दी गई कोई भी सूचना अथवा तथ्य अथवा व्यक्त किए गए विचार #ATALHIND के नहीं हैं, तथा atal hind उनके लिए किसी भी प्रकार से उत्तरदायी नहीं है.

अटल हिन्द से जुड़ने के लिए शुक्रिया। जनता के सहयोग से जनता का मीडिया बनाने के अभियान में कृपया हमारी आर्थिक मदद करें।

Related posts

रामकुमार बंसल को सैकड़ों युवाओं ने दिया अपना समर्थन

admin

JJP को लग गया रोग अविश्वास प्रस्ताव से भाजपा से ज्यादा चितिंत जेजेपी क्यों 

admin

क्योड़क की गुदड़ पट्टी चौपाल में आयोजित जनसभा में जिला परिषद उम्मीदवार विकास तंवर को मिला भारी जनसमर्थन

admin

Leave a Comment

URL