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खट्टर साहब लॉकडाउन के समय आप हाथ जोड़कर प्रवासी मजदूरों को रोक रहे थे अब किस मुंह से उन्हें भगाएंगे?

खट्टर साहब लॉकडाउन के समय आप हाथ जोड़कर प्रवासी मजदूरों को रोक रहे थे अब किस मुंह से उन्हें भगाएंगे?
ऐसे समय में जब Ease Of Doing Business के लिए सभी राज्यों में होड़ मची है, हरियाणा का ये फैसला स्थानीय इंडस्ट्री के लिए कुठाराघात साबित होगा.


—Sanyam Srivastav—

At the time of lockdown, Khattar saheb, you were stopping the migrant laborers with folded hands, now with what mouth will they drive them away?
At a time when there is a competition in all the states for Ease of Doing Business, this decision of Haryana will prove to be a shock to the local industry.

गुड़गांव के एक व्यवसायी जो कोरोना काल में अपने मजदूरों को फ्लाइट से घर भेजकर चर्चा में आ गए थे अब उन्हें या तो अपना बिजनेस बंद करना होगा या उन्हें अपना बिजनेस नोएडा या किसी दूसरे राज्य में ले जाना होगा. जी हां! ऐसा ही होने वाला है हरियाणा की इंडस्ट्री के साथ. कारण यह है कि उन्हें मशरूम की खेती के लिए जिस तरह के कुशल और मेहनतकश कारीगर चाहिए थे वो उन्हें स्थानीय स्तर पर तो शायद ही मिलेगें. हरियाणा सरकार का कानून कहता है कि 50 हजार रुपये तक के सैलरी वाला कोई भी एम्प्लॉई अपने ही स्टेट का ही होना चाहिए. किसी भी उद्योग या कमर्शियल एक्टिविटीज के लिए नियोक्ता जो एम्प्लॉई रखेंगे वो हरियाणा के ही होने चाहिए.

ये कहानी केवल मशरूम उगाने वाले व्यवसायी के लिए ही नहीं है बल्कि और बहुत से उद्योग धंधों के लिए भी है. ये बात प्रदेश के व्यवसायी ही नहीं खुद सरकार भी समझती है. लॉकडाउन के समय खुद प्रदेश के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर ने कहा था कि मैं प्रवासी मजदूरों से अनुरोध करता हूं कि वो अपने घर वापस न जाएं, उन्हें हर प्रकार की सहायता उपलब्ध कराई जाएगी. तो क्या हम मान लें कि खट्टर सरकार ने सस्ती लोकप्रियता के लिए एक ऐसा विधान बना दिया है जो राज्य के विकास के लिए ही खतरनाक नहीं है बल्कि यहां के वर्तमान उद्योग-धंधों पर तालाबंदी करा सकता है?
प्रदेश का पूरा उद्योग प्रवासी मजदूरों के भरोसे
हरियाणा में गुरुग्राम ही नहीं रेवाड़ी, फरीदाबाद, यमुना नगर, पानीपत, सोनीपत, अंबाला, झज्जर, भिवानी, फतेहाबाद सभी जगहों पर इंडस्ट्री हैं और सभी इंडस्ट्री प्रवासी मजूदूरों के भरोसे चलती हैं. केवल यमुना नगर की बात करें तो यहां करीब 300 प्लाईवुड इंडस्ट्री हैं. इन फैक्ट्रियों की जरूरत पूरी करने के लिए करीब 505 आरा मशीनें और 56 चिपर और 84 पाइलिंग इकाइयां काम कर रही हैं. इसके अलावा इन्हें चलाने के लिए बहुत सी सहायक कंपनियां काम कर रही हैं जहां करीब एक लाख प्रवासी मजदूर काम कर रहे हैं. ये मजदूर यूपी के पूर्वांचल और बिहार से आते हैं जिन्हें इस तरह के काम में महारथ हासिल है.

प्रवासी मजदूरों के बुलाने के लिए वेब पोर्टल लॉन्च किया था
कोरोना के बाद जब प्रवासी मजदूरों ने अपने राज्यों का रुख कर लिया था तो उन्हें वापस बुलाने के लिए खट्टर सरकार ने एक वेब पोर्टल लॉन्च किया था 8 मई 2020 तक उस पोर्टल पर एक लाख 46 हजार मजदूरों ने वापस लौटने की इच्छा जताई थी. हरियाणा सरकार ने इन मजदूरों को वापस बुलाने के लिए 100 ट्रेनें चलाए जाने की भी मांग की थी. लॉकडाउन के समय 1 मई को प्रदेश के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर ने कहा था कि मैं प्रवासी श्रमिकों से अनुरोध करता हूं कि आप अभी अपने घर न जाएं आपको यहां कोई दिक्कत नहीं होगी. कई उद्योगपतियों ने तो बिहार से बसें भेज कर मजदूरों को वापस बुलाया था. राज्य सरकार ने खुद ही प्रस्ताव रखा था कि जरूरत होगी तो वो बसें भेजकर मजदूरों को वापस बुलाएंगे.

हरियाणा में तो बीजेपी की मजबूरी पर एमपी और कर्नाटक में क्यों?
हरियाणा में इस समय मनोहर लाल खट्टर के नेतृत्व में भारतीय जनता पार्टी और दुष्यंत चौटाला के नेतृत्व में जननायक जनता पार्टी के गठबंधन की सरकार है. जननायक जनता पार्टी ने विधानसभा चुनावों में स्थानीय जनता को निजी क्षेत्र की कंपनियों में 75 प्रतिशत आरक्षण का वादा किया था. चुनाव के बाद हुए गठबंधन में जननायक जनता पार्टी ने इसी आधार पर गठबंधन में आना स्वीकार किया था. बीजेपी की इस समय मजबूरी भी है कि किसान आंदोलन के समय अपने किसी गठबंधन के साथी को नाराज न किया जाए. हालांकि बीजेपी शासित राज्यों की बात करें तो मध्यप्रदेश और कर्नाटक की सरकारें भी इस तरह का कानून बनाने का मंशा जता चुकी हैं.

स्थानीय लोगों के लिए इस तरह के मांग की राजनीति नई नहीं
मुंबई में शिवसेना और मनसे की राजनीति का यही आधार रहा है. शिवसेना पार्टी की उत्पत्ति ही उत्तर भारतीयों और दक्षिण भारतीयों के विरोध के आधार पर हुआ. मराठा मानूष के लिए आरक्षण और मराठी भाषा के नाम पर शिवसेना ने खूब बवाल काटा था. पहले इस तरह की राजनीति स्थानीय पार्टियां करती थीं. मगर पहली बार ऐसा हो रहा है कि नेशनल लेवल की पार्टी भी इस तरह के मुद्दे उठा रही है. पहले राजनीतिक दल चुनाव के पहले ऐसी बात करते थे पर चुनाव जीतने के बाद इस तरह के वादे भूल जाते थे.

इन्फ्रास्ट्रक्चर खड़ा करने में पूरे देश का पैसा लगा है
आजादी के बाद देश में तेजी से विकास के लिए अर्थशास्त्रियों और देश के नेताओं ने जो फार्मूला अपनाया उसके अनुसार देश के सभी हिस्सों यानि पूरे देश से संसाधन जुटाना था. मगर इन्फ्रास्ट्रक्चर वहां पहले खड़ा करना था जहां विकास का रिटर्न पहले मिल सके . इस तरह पूरे देश की पूंजी जब लगनी शुरू हुई तो पहले बंदरगाहों और बड़े बांध , नहरें आदि बनाने की प्लानिंग में दक्षिण-पश्चिम, दिल्ली और पंजाब जैसे राज्यों को प्राथमिकता मिल गई . इन राज्यों का तेजी से विकास हुआ और दूसरे कई राज्य मजदूरों की सप्लाई करने वाले राज्य बन गए. पहले तो जहां इन्फ्रास्ट्रक्चर डिवेलप नहीं हुआ उन राज्यों ने विरोध नहीं किया क्योंकि यह भारत के विकास की बात थी. अपना देश था और हर जगह काम करने की आजादी थी. जिन राज्यों में डिवेलपमेंट हुए उन राज्यों ने भी बाहर से आए कामगारों को हाथों-हाथ लिया. मगर अब स्थितियां बदल रही हैं. हर स्टेट में स्थानीय लोगों के रोजगार का मुद्दा हावी होता जा रहा है.

 

 

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