चौधर की चाहत में भाजपा के दो हारे  हुए बड़े नेता कैप्टन अभिमन्यु और ओमप्रकाश धनखड़ 

 

चौधर की चाहत में भाजपा के दो हारे  हुए बड़े नेता कैप्टन अभिमन्यु और ओमप्रकाश धनखड़

कैप्टन और धनखड़ की निगाह दोहरे निशाने पर

राज्यसभा सांसद या प्रदेशाध्यक्ष बनने के लिए दोनों नेता कर रहे प्रयास

कुलदीप श्योराण
चंडीगढ़। विधानसभा चुनाव में हार का शिकार हुए भाजपा के दो बड़े नेता कैप्टन अभिमन्यु और ओमप्रकाश धनखड़ अब पिछले दरवाजे के जरिए चौधर हासिल करने की मुहिम में जुट गए हैं।
दोनों ही नेता खुद को प्रदेश अध्यक्ष बनाने या राज्य सभा की टिकट हासिल करने के लिए अपने आकाओं के दरवाजे पर पहुंच गए हैं। दोनों ही नेता अगले पड़ाव के लिए पूरी तैयारी कर चुके हैं और यह इच्छा रखते हैं कि प्रदेश की जाट राजनीति में पार्टी की तरफ से वे सबसे बड़े चेहरे बन जाएं।
पूर्व केंद्रीय मंत्री बीरेंद्र सिंह के राज्यसभा छोड़ने के बाद दोनों ही नेता यह चाहते हैं कि जाट कोटे से राज्यसभा का टिकट उनको मिल जाए। इसी तरह पार्टी प्रदेश अध्यक्ष सुभाष बराला के जनवरी में हट जाने की संभावनाओं के चलते दोनों नेता यह भी इच्छा रखते हैं कि अगर उनको राज्यसभा की सांसदी ना मिले तो वे प्रदेश अध्यक्ष की चौधर हासिल करें।
दोनों ही नेता यह बखूबी भी जानते हैं कि राज्यसभा का सांसद बनने या पार्टी प्रदेश अध्यक्ष बनने पर ही उनकी खोई हुई प्रतिष्ठा वापस आ सकती है और अगले 6 साल तक अपना दबदबा बनाए रखने में सफल हो सकते हैं।

कैप्टन कर रहे पूरा जतन

नारनौंद विधानसभा सीट पर चुनाव हारने वाले पूर्व वित्त मंत्री कैप्टन अभिमन्यु अब बड़े निशाने पर नजर गड़ा चुके हैं और हर हाल में अस्तित्व की जंग जीतना चाहते हैं।
कैप्टन अभिमन्यु यह समझ चुके हैं कि अगर उन्हें सत्ता व संगठन में बड़ी हिस्सेदारी नहीं मिली तो सियासी दौड़ में वे दूसरे जाट नेताओं से पिछड़ जाएंगे। इसीलिए वे राज्यसभा या प्रदेशाध्यक्ष बनने की दौड़ में शामिल हो गए हैं।
कैप्टन अभिमन्यु की पहली च्वाइस राज्यसभा का मेंबर बनना है। कैप्टन अभिमन्यु को यह लगता है कि अगर वे राज्यसभा का सदस्य बन गए तो अगले 6 साल तक उनके लिए खुद को मजबूत नेता के रूप में जमाए रखने में कोई परेशानी नहीं होगी।
इसके अलावा वे मोदी मंत्रिमंडल के फेरबदल में खुद की दावेदारी भी पेश करने की कोशिश करेंगे। कैप्टन अभिमन्यु राज्यसभा की टिकट हासिल करने के लिए कोई कोर कसर नहीं रख रहे हैं।
अगर किसी कारण उनको राज्यसभा की टिकट नहीं मिली तो वे प्रदेश अध्यक्ष के पद पर भरपूर दावा ठोकेंगे। सुभाष बराला की जगह जाट नेता के ही प्रदेश अध्यक्ष बनने की संभावनाओं के चलते कैप्टन अभिमन्यु इस पद पर अपनी प्रबल दावेदारी समझते हैं। उन्हें लगता है कि प्रदेश अध्यक्ष के रूप में पहले से भी अधिक प्रभावपूर्ण तरीके से अपना सियासी रसूख बढ़ा सकते हैं।

धनखड़ खोना नहीं चाहते पकड़

पूर्व कृषि मंत्री ओमप्रकाश धनखड़ बादली विधानसभा सीट से चुनाव हारने के बाद तिलमिलाए हुए हैं। उन्हें जरा भी उम्मीद नहीं थी कि वह चुनावी दंगल में चित हो जाएंगे। वह सत्ता या संगठन में हिस्सेदारी बनाए रखने के लिए पुरजोर प्रयास कर रहे हैं। 1 दिन पहले झज्जर में किसान संघ के बैनर के जरिए वे सम्मान समारोह में खुद का बड़ा प्रभाव दिखाने का प्रयास कर चुके हैं।
धनखड़ भी राज्यसभा के जरिए मोदी मंत्रिमंडल में शामिल होने की हसरत रखते हैं। इसके अलावा धनखड़ को भी यही लगता है कि अगर वे राज्यसभा में पहुंच गए तो उनका सियासी रसूख प्रदेश की जाट राजनीति में बड़ा हो जाएगा। अगले 6 साल तक बिना किसी लाग लपेट के सांसद के रूप में पार्टी के चेहरे बन जाएंगे।
राज्यसभा की टिकट नहीं मिलने पर ओमप्रकाश धनखड़ भी प्रदेश अध्यक्ष बनने की लालसा रखते हैं। सुभाष बराला ओमप्रकाश धनखड़ के खेमे के ही नेता हैं। अपने चेले को हटाकर ओमप्रकाश उस कुर्सी पर बैठना चाहते हैं। धनखड़ प्रदेश अध्यक्ष के रूप में अपनी पकड़ का दायरा बढ़ाने की प्लानिंग रखते हैं।
धनखड़ को यह पता कि अगर उन्हें प्रदेश की सियासत में अपना जलवा कायम रखना है तो दोनों पदों में से एक पद को हासिल करना होगा।
बात यह है कि भाजपा के 4 बड़े जाट चेहरों पूर्व केंद्र मंत्री बीरेंद्र सिंह, कैप्टन अभिमन्यु, ओमप्रकाश धनखड़ और सुभाष बराला सियासत के चौराहे पर खड़े हुए हैं।
पूर्व केंद्रीय मंत्री बीरेंद्र सिंह राज्यसभा छोड़ने के बाद अब बेरोजगार हुए बैठे हैं। वह भी प्रदेश अध्यक्ष बनना चाहते हैं। पिछले दिनों उन्होंने उचाना में बयान दिया था कि 2024 के चुनाव में भाजपा की तरफ से 45 से 50 सीटे बांटने का काम करेंगे इसका अर्थ यही है कि वह प्रदेश अध्यक्ष बनने के लिए पूरी ताकत लगा रहे हैं और इसीलिए उन्होंने 40 से 45 सीटें बढ़ने का दावा किया था। प्रदेश अध्यक्ष के रूप में ही कोई व्यक्ति 45 से 50 सीटें बांटने का दावा कर सकता है।
विधानसभा का चुनाव हारने के बाद सुभाष बराला अभी तक प्रदेश अध्यक्ष बने हुए हैं लेकिन जनवरी में संगठन के चुनाव के बाद उनका भी बदला जाना तय लग रहा है। सुभाष बराला के लिए भी अगले 5 साल तक खुद का वजूद बनाए रखने की बड़ी चुनौती है। उन्हें बड़े जाट नेताओं के बीच में खुद की पहचान बनाने के लिए खासी मशक्कत करनी पड़ेगी।
कैप्टन अभिमन्यु और ओमप्रकाश दोनों ही पिछले भाजपा सरकार में मजबूत ओहदेदारों में शामिल थे लेकिन दोनों के ही चुनाव हार जाने के चलते अब दोनों ही खाली हाथ हो गए हैं और इसलिए दोनों ही राज्य सभा या प्रदेश अध्यक्ष के रूप में अपनी सियासत की गाड़ी को दोबारा पटरी पर लाना चाहते हैं।
कैप्टन अभिमन्यु और ओमप्रकाश धनखड़ के प्रदेश अध्यक्ष बनने के अरमानों पर पानी फेरने का काम बीरेंद्र सिंह कर सकते हैं। बीरेंद्र सिंह खुद प्रदेश अध्यक्ष बनना चाहते हैं और इसके लिए हर संभव लॉबिंग भी कर रहे हैं।
विधानसभा चुनाव में जाट वोटरों ने भाजपा के खिलाफ वोट दिए थे जिसके चलते भाजपा बहुमत हासिल करने से वंचित रह गई थी। जाट वोटरों को लुभाने के लिए भाजपा राज्यसभा की 2 में से 1 सीट और प्रदेश अध्यक्ष के पद पर जाट नेता को बैठाने का फैसला ले सकती है। इसी फैसले की उम्मीद में चारों भाजपा जाट नेता अपनी लॉटरी खुलने की उम्मीद कर रहे हैं।
भाजपा की जाट राजनीति के चारों बड़े चेहरे बेरोजगारी की कतार में लग गए हैं। अब देखना यही है कि सत्ता और संगठन में इनमें से किसे हिस्सेदारी मिल पाती है और कौन खाली हाथ रहता है

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