जम्मू से एक रचना लिखती है :- सरोज भारद्वाज

धरती की चीख

मैने कब चाहा मेंरे न चाहने पर भी मुझ पर खीचों लकीरे बटने बाटनें की

मेरे न चाहने पर तुमने बांटी ये आवो हवाए

तुमने तोड़े ऊँचे शिखर उजाड़ दिए हरे भरे जंगल

तुमने कैद कर ली कल कल करती नदिया

मैने कब चाहा किसी अबला की लूट कर आबरू तार तार करदो

तुमने दिए है कई घाव् जाने अनजाने मुझे किया है खून नवांकुर का जो फलने फूलने को तैयार थे

मैने कब चाहा तुम करते जाओ गतलियों पर गलतियां

फिर पछताओ तुम अपने ही किए पर अब तुम ही बताओ

मानव यह मैने कब चाहा ……………………………….

रचनाकार :- सरोज भारद्वाज.

जम्मू

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