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जो  बयान सोशल मीडिया पर आपत्तिजनक माने जाते हैं तो फिर न्यूज चैनलों पर प्रसारण क्यों?

औवेसी जैसे नेताओं के बयानों के प्रसारण पर भी रोक लगाए सुप्रीम कोर्ट।
जब ऐसे बयान सोशल मीडिया पर आपत्तिजनक माने जाते हैं तो फिर न्यूज चैनलों पर प्रसारण क्यों?
दिल्ली हिंसा पर सीजेआई एसए बोबड़े को लाचारी दिखाने की जरुरत नहीं है।
=======-राजकुमार अग्रवाल –=======
दो मार्च को सुप्रीम कोर्ट के प्रधान न्यायाधीश एसए बोबड़े ने हिंसा पर दायर याचिकाओं को सुनवाई के लिए स्वीकार कर लिया है। जस्टिस बोबड़े अब 4 मार्च को दिल्ली हिंसा पर सुनवाई करेंगे। सब जानते हैं कि दिल्ली में शाहीन बाग पर चल रहे बेमियादी धरने को समाप्त करवाने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने तीन मध्यस्थ नियुक्त किए थे, लेकिन मध्यस्थों को सफलता नहीं मिली।

 

शायद यही वजह रही कि 2 मार्च को सुनवाई के दौरान जस्टिस बोबड़े ने कहा कि हम सिर्फ निर्देश दे सकते हैं, हिंसा को नहीं रोक सकते। दिल्ली में शांति हो, यह हम भी चाहते हैं। दिल्ली के हालातों के मद्देनजर जस्टिस बोबड़े ने अपनी लाचारी ही प्रकट की, लेकिन यह समय लाचारी प्रकट करने का नहीं है क्योंकि जब कुछ लोग देश का माहौल खराब करने पर तुले हुए हैं, तब सुप्रीम कोर्ट लाचारी प्रकट नहीं कर सकता है। सुप्रीम कोर्ट के निर्देश लोकतंत्र में चुनी गई सरकार को मजबूती देते हैं। ऐसे में कोर्ट को अपनी जिम्मेदारी को निभाना चाहिए। यदि दिल्ली हिंसा के लिए केन्द्रीय मंत्री अनुराग ठाकुर, भाजपा सांसद प्रवेश वर्मा और पूर्व विधायक कपिल मिश्रा के बयान भी भड़काऊ हैं तो ऐसे नेताओं के विरुद्ध भी कार्यवाही होनी चाहिए।

 

 

लेकिन साथ ही न्यूज चैनलों पर एआईएमआईएम के नेता असदुद्दीन औवेसी और ऐसे ही अन्य नेताओं के प्रसारित होने वाले बयानों पर सुप्रीम कोर्ट को रोक लगानी चाहिए। औवेसी सरीखे किसी नेता का बयान सोशल मीडिया पर पोस्ट हो जाए तो पुलिस तत्काल मुकदमा दर्ज कर ले।

 

वाट्सएप ग्रुप के एडमिन से लेकर फेसबुक पर पोस्ट डालने वाले तक पर कार्यवाही हो, लेकिन जो न्यूज चैनल ऐसे भड़काऊ बयान बार बार प्रसारित कर रहे हैं उन पर कोई कार्यवाही नहीं हो रही है। दिल्ली हिंसा को लेकर औवेसी और अन्य नेता जिस प्रकार भड़काऊ भाषण दे रहे हैं उससे माहौल के और बिगडऩे की संभावना है। सवाल उठता है कि जो कानून सोशल मीडिया पर लागू होता है, वह कानून न्यूज चैनलों पर लागू क्यों नहीं होता? सुप्रीम कोर्ट ने अयोध्या प्रकरण में नियुक्ति मध्यस्थों से जुड़ी खबरों के प्रसारण पर रोक लगाई थी। कोर्ट की इस रोक का सभी ने पालन किया।

क्या अब सुप्रीम कोर्ट औवेसी जैसे नेताओं के बयानों के प्रसारण रोक नहीं लग सकता? माना कि लोकतंत्र में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि देश में हिंसा फैलाई जाए। भड़काऊ बयान देने वाला तो दोषी है ही, साथ ही ऐसे बयान का प्रसारण करने वाला भी दोषी है।

 

 

सुप्रीम कोर्ट को इस मामले में सख्त निर्देश जारी करने चाहिए। जब दिल्ली में शांति बहाली के प्रयास हो रहे हैं, तब औवेसी और उनके समर्थक धार्मिक स्थलों को लेकर उकसाने वाले बयान दे रहे हैं। ऐसे बयानों का प्रसारण भी न्यूज चैनलों पर लगातार हो रहा है। दिल्ली पुलिस का भी यह दायित्व बनता है कि वह न्यूज चैनलों पर प्रसारित होने वाले भड़काऊ भाषणों पर भी कार्यवाही करें। इसे अफसोसनाक ही कहा जाएगा कि देश के प्रधानमंत्री के विरुद्ध गली-गलौज वाले भाषण भी न्यूज चैनलों पर प्रसारित हो रहे हैं।

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