दुष्यंत चौटाला ने भाजपा के आगे टेके घुटने,

दुष्यंत चौटाला ने  भाजपा के आगे टेके   घुटने

बरोदा उपचुनाव में भाजपा प्रत्याशी का समर्थन करना होगा जेजेपी को

बेटा कहता है बीजेपी से मिल कर लड़ेंगे चुनाव ,बाप कहता है नहीं लड़ेंगे चुनाव

=राजकुमार अग्रवाल =

चंडीगढ़।जन नायक चौधरी देवी लाल के नाम पर जननायक जनता पार्टी बनाने वाले दुष्यंत चौटाला को भारतीय जनता पार्टी ने पहले ही

दांव में घुटने टेकने के लिए मजबूर कर दिया है। चौधरी देवी लाल की राजनीतिक विरासत के उत्तराधिकारी बनने का दावा कर रहे दुष्यंत

चौटाला को भाजपा ने बरोदा उपचुनाव में  गठबंधन का प्रत्याशी खड़ा करने या प्रत्याशी लेने से साफ इनकार कर दिया है।इधर दुष्यंत

चौटाला कहते है बीजेपी के साथ मिलकर बरोदा उपचुनाव लेकिन अजय चौटाला  बयान में कहा की जेजेपी बरोदा उपचुनाव नहीं लड़ेगी

प्रदेश की राजनीति में इनेलो की जगह काबिज हुई जननायक जनता पार्टी के लिए बरोदा का उप चुनाव लड़ना बेहद जरूरी था क्योंकि

जाटलैंड की इस सीट पर देवीलाल परिवार ने 1977 से लेकर 2009 तक यानी 32 साल तक जीत का परचम फहराया था।

2019 के विधानसभा चुनाव में भी जेजेपी को बरोदा विधानसभा सीट पर 32000 वोट मिले थे। परंपरागत रूप से देवीलाल परिवार का

मजबूत गढ़ रही बरोदा विधानसभा सीट पर जेजेपी का ज्यादा हक बनता है लेकिन गठबंधन सरकार के दबदबे का फायदा उठाकर

भाजपा ने उपचुनाव में जेजेपी को पिछल्लगु बनाते हुए समर्थन देने के लिए मजबूर कर दिया है।

बीजेपी का दावा सिर्फ इसलिए मजबूत है कि उसके प्रत्याशी को 2019 के विधानसभा चुनाव में 37000 वोट मिले थे। उपचुनाव में जीत

का दावा कर रही बीजेपी ने यह फैसला लेने से पहले बरोदा विधानसभा का चुनाव इतिहास पढ़ना जरूरी नहीं समझा।

हरियाणा राज्य के निर्माण के बाद हुए पहले चुनाव में गठित बरोदा विधानसभा और 2005 विधानसभा चुनाव तक अनुसूचित जाति के

लिए आरक्षित रही।इस अवधि में 10 बार चुनाव हुए। 1967 में कांग्रेस के रामधारी वाल्मीकि ने जनसंघ प्रत्याशी को हरा कर विधानसभा में

 

प्रवेश किया।अगले वर्ष हुए मध्यावधि चुनाव में वीरेंद्र सिंह की विशाल हरियाणा पार्टी के श्यामचंद ने कांग्रेस के रामधारी वाल्मीकि को

पराजित किया।

1977 की इंदिरा विरोधी लहर में जनता पार्टी के भले राम ने जन नायक चौधरी देवी लाल के आशीर्वाद से निर्दलीय दरिया सिंह को

पराजित किया. दोनों पुराने खिलाड़ी रामधारी वाल्मीकि (विशाल हरियाणा पार्टी) व श्यामचंद (कांग्रेस) भी चुनाव लड़े लेकिन तीसरे व चौथे

स्थान पर रहे।

 

1982 भी भालेराम ने अपना कब्जा बरकरार रखा।

1987 में लोकदल प्रत्याशी डॉ. कृपाराम पुनिया ने कांग्रेस के चौधरी श्यामचन्द को पराजित किया।

अगले 3 चुनाव 1991, 1996 व 2000 इंडियन नेशनल लोकदल के रमेश खटक ने बरोदा का विधानसभा में प्रतिनिधित्व किया।

2005 में इनेलो के रामफल चिडाना ने कांग्रेस के रामपाल रुखी को पराजित किया.

सामान्य सीट घोषित होने के बाद 2009, और 2014 में यहां से श्रीकृष्ण हुड्डा विधायक चुने गए और दोनों बार उन्होंने इनेलो के डॉ. कपूर

नरवाल को पराजित किया। 2019 के विधानसभा चुनाव में श्रीकृष्ण हुड्डा ने भाजपा के योगेश्वर दत्त को हराया लेकिन जेजेपी के भूपेंद्र

मलिक ने 32000 से ज्यादा वोट लेकर जोरदार प्रदर्शन किया।

श्रीकृष्ण हुड्डा का अपना पुराना विधानसभा क्षेत्र किलोई था और वहां से वे तीन बार विधायक चुने गए थे. लेकिन 2005 में जब भूपेंद्र हुड्डा

मुख्यमंत्री बने तो श्रीकृष्ण हुड्डा ने किलोई सीट से त्यागपत्र दे दिया ताकि भूपेंद्र हुड्डा उपचुनाव के जरिए विधानसभा की सदस्यता हासिल

कर सकें।

श्री कृष्ण हुड्डा के इस अहसान का बदला भूपेंद्र हुड्डा ने उन्हें बरोदा से चुनाव जितवाकर दिया. लगातार तीन बार विधायक बनकर श्रीकृष्ण

हुड्डा ने भूपेंद्र हुड्डा के दबदबे को यहां कायम रखा उपचुनाव में इस दबदबे को कायम रखना जहां भूपेंद्र हुड्डा के लिए बहुत बड़ी चुनौती है

वही बीजेपी जेजेपी गठबंधन के लिए जीत हासिल करना प्रतिष्ठा का सवाल रहेगा।

बरोदा उपचुनाव ने बता दिया है कि दुष्यंत चौटाला भाजपा प्रेशर पॉलिटिक्स में फंस गए हैं और उसके इशारों पर ही उन्हें सियासत करनी

होगी।

जन नायक चौधरी देवी लाल जैसी बड़ी शख्सियत की राजनीतिक विरासत का उत्तराधिकारी कहने वाले दुष्यंत चौटाला को भाजपा ने यह

बता दिया है कि उनकी औकात बहुत छोटी है।

बरोदा का उपचुनाव लड़कर और जीत कर ही दुष्यंत चौटाला चौधरी देवीलाल की राजनीतिक विरासत के असली उत्तराधिकारी बन

सकते हैं।
1977 में चौधरी देवीलाल ने बरोदा में अपना प्रत्याशी जीतवाकर 32 साल तक इस किले को उनके परिवार ने अजेय रखा था‌

2009, 2014 और 2019 में भी देवलाल परिवार की पार्टियों को बरोदा विधानसभा सीट पर असरदार वोट हासिल हुए।

देवीलाल परिवार का मजबूत जनाधार होने के बावजूद बरोदा विधानसभा सीट पर भाजपा से गठबंधन की कीमत चुकाते हुए दुष्यंत

चौटाला को उपचुनाव के दंगल से बाहर रहना पड़ेगा।

दुष्यंत चौटाला को यह नहीं पता कि अगर बरोदा में बीजेपी जीत गई तो जेजेपी के खात्मे की शुरुआत हो जाएगी और अगर गठबंधन को

हराकर कांग्रेस जीत गई तो भूपेंद्र हुड्डा का डंका जाटों में और भी सिर चढ़कर बोलेगा।

 

उपचुनाव में बीजेपी का समर्थन करने की बढ़ी कीमत दुष्यंत चौटाला को चुकाने के लिए तैयार रहना होगा।

बरोदा उप चुनाव के जरिए बीजेपी ने जेजेपी को कुएं का मेंढक बनाने का चक्रव्यूह रच दिया है।

 

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