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दूसरा दुष्यंत मिलना मुमकिन नहीं.,अजीत पवार पर भरोसा करना महंगा पड़ा भाजपा को

दूसरा दुष्यंत मिलना मुमकिन नहीं.,अजीत पवार पर भरोसा करना महंगा पड़ा भाजपा को

=राजकुमार अग्रवाल===
चंडीगढ़ । सियासत में किसी का सगा संबंधी होना ज्यादा मायने नहीं रखता है बल्कि सगा संबंधी होने के साथ-साथ प्रतिभा और गुण होना ज्यादा मायने रखता है। 1 महीने की सियासत के दौरान देश को 2 भतीजों ने राजनीति के कई रंग दिखाएं।
एक महीना पहले 27 अक्टूबर को हरियाणा में बहुमत हासिल नहीं करने वाली भाजपा ने इनेलो प्रमुख अभय चौटाला के भतीजे जेजेपी मुखिया दुष्यंत चौटाला के साथ गठबंधन करते हुए सरकार बनाई। दूसरी तरफ 4 दिन पहले भाजपा ने महाराष्ट्र में शरद पवार के भतीजे अजीत पवार के साथ मिलकर गठबंधन सरकार को परवान चढ़ाया।
दोनों ही सरकारों को बनाने में भतीजे दुष्यंत चौटाला व अजित पवार सबसे अहम कड़ी रही लेकिन दोनों ही सरकारों का आगाज एक समान होने के बावजूद अंजाम 80 घंटे में ही जुदा-जुदा निकला।
80 घंटों में ही साबित हो गया कि अजित पवार दुष्यंत चौटाला साबित नहीं हो पाए।
भाजपा ने अजित पवार पर दुष्यंत चौटाला की तरह भरोसा करते हुए सरकार बनाई थी लेकिन वे भाजपा की उम्मीदों पर खरे नहीं उतरे जिसके चलते न केवल 80 घंटों में सरकार गिर गई बल्कि उसके साथ भाजपा को भारी फजीहत का सामना भी करना पड़ा।

दुष्यंत बने भरोसे के प्रतीक

हरियाणा में भाजपा के साथ सरकार बनाने के बाद दुष्यंत चौटाला एक ही महीने में भरोसे के प्रतीक बन गए हैं। 1 महीने की सरकार के दौरान दुष्यंत चौटाला ने एक बार भी अपनी मर्यादाओं को नहीं लांघा और गठबंधन सरकार की कामयाबी के लिए बड़े सहयोगी भाजपा से ज्यादा लगन के साथ कामकाज किया।
दुष्यंत चौटाला ने विभागों के बंटवारे और दूसरे कामकाज में न तो कोई टोका-टोकी की और ना ही कोई अड़चन डाली। इसके बजाय वे मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर के साथ पूरा तालमेल बनाते हुए एक ही महीने में अपने विभागों को सेट करने में सफल हो गए हैं।
दुष्यंत चौटाला के साथ मिलकर भाजपा टिकाऊ सरकार हासिल कर गई है। दुष्यंत चौटाला ने जेजेपी को मिले 11 विभागों में तेजी से काम करते हुए सभी बड़े अफसरों के साथ बैठकर करते हुए कामकाज के ब्लू प्रिंट का खाका तैयार कर दिया है। वे पार्टी कार्यालय और अपने ऑफिस में प्रदेशभर की जनता की समस्याओं को भी सुनते हुए मौके पर ही निदान करने का काम बखूबी अंजाम दे रहे हैं। दुष्यंत चौटाला के साथ गठबंधन करके भाजपा बेहद फायदे में रही है क्योंकि उसकी निर्दलीय विधायकों की प्रेशर पॉलिटिक्स के सामने झुकने की मजबूरी खत्म हो गई है और इसीलिए मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर बिना किसी दबाव के काम कर पाएंगे।

उम्मीदों पर खरे नहीं उतरे अजीत पवार

महाराष्ट्र में भाजपा ने इस उम्मीद के साथ अजीत पवार को डिप्टी सीएम बनाया था कि उनके साथ एनसीपी के अधिकांश विधायक आ जाएंगे। अजित पवार का एनसीपी के विधायकों पर दबदबा तो बहुत था लेकिन उनकी पकड़ चाचा शरद पवार के सामने फीकी हो गई।
अधिकांश विधायकों ने पलटी मारते हुए शरद पवार के प्रति निष्ठा दिखाई।
अजित पवार इस गलतफहमी का शिकार थे कि सरकार में भागीदारी के लिए अधिकांश विधायकों उनके साथ खड़े होंगे लेकिन उन्हें यह आभास नहीं था कि एनसीपी में सवार की मर्जी के बगैर पत्ता भी नहीं हिलता है और वह चाचा पवार के सामने अभी भी बच्चे ही हैं।
अजित पवार की जड़ें कमजोर साबित हुई जिसके चलते न केवल 80 घंटे में भाजपा की सरकार का काम तमाम हो गया बल्कि उसके साथ-साथ भाजपा को भी शर्मिंदगी का सामना करना पड़ा।
गलत दांव खेलने के चलते अजित पवार की व्यक्तिगत सियासत खतरे में पड़ गई है। एनसीपी में उनकी भूमिका अब पहले की तरह नहीं रहेगी।

बात यह है कि दुष्यंत चौटाला ने अपनी काबिलियत और मेहनत के बलबूते पर जहां परिवार की पार्टी इनेलो से चाचा अभय चौटाला द्वारा बेदखल किए जाने के बावजूद 10 महीने में ही जजेपी को सत्ता का शिकार बना दिया, वहीं दूसरी तरफ अजित पवार 30 साल की सियासत के बाद भी अपने चाचा शरद पवार के सामने ढेर हो गए।
दुष्यंत चौटाला की कामयाबी का राज यही रहा कि उन्होंने जनता के बीच जाकर अपने लिए जनसमर्थन हासिल किया, वहीं दूसरी तरफ अजित पवार अभी भी शुद्ध पवार की छाया में जी रहे हैं। दुष्यंत चौटाला ने जेजेपी का पूरे प्रदेश में मजबूत जनाधार खड़ा करते हुए जहां इनेलो का खात्मा कर दिया वहीं दूसरी तरफ समझदारी दिखाते हुए भाजपा के साथ गठबंधन सरकार में शामिल हो गए।
दुष्यंत चौटाला ने जमीनी हकीकत को समझते हुए फैसला लिया और डिप्टी सीएम का पद हासिल करके अपनी व्यक्तिगत सियासत के अलावा पार्टी को भी मजबूती देने का काम किया।
दूसरी तरफ अजित पवार की हसरत भी दुष्यंत चौटाला की तरह ही थी लेकिन वे अपने साथ एनसीपी के विधायकों को खड़ा रखने में नाकाम रहे।
दुष्यंत चौटाला के साथ गठन करके भाजपा जहां सरकार के प्रति निश्चिंत हो गई वहीं दूसरी तरफ अजीत पवार के साथ गठबंधन करना महंगा सौदा साबित हुआ।
दुष्यंत चौटाला ने 1 महीने की सरकार में अपने काम और व्यवहार से यह साबित कर दिया कि वे युवा होते हुए भी परिपक्व सियासत कर रहे हैं और गठबंधन सरकार की मजबूती के इरादे के साथ कामकाज को अंजाम दे रहे हैं।
दूसरी तरफ अजित पवार ने सिर्फ व्यक्तिगत फायदे के लिए एनसीपी में तोड़फोड़ करते हुए भाजपा के साथ गठबंधन करने का काम किया लेकिन उनकी विधायकों पर कमजोर पकड़ ने उनके फैसले को भस्मासुरी साबित कर दिया।
हरियाणा और महाराष्ट्र के सियासी नजारों ने यह बात साबित कर दी कि दुष्यंत चौटाला बनना सबके लिए मुमकिन नहीं है और अजीत पवार की तरह गलत फैसले लेने पर धूल चाटने के आसार ज्यादा बन जाते हैं।

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