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नई भाजपा’ किस तरह चुनती है मुख्यमंत्री, जानते हैं केवल तीन लोग

प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में ‘नई भाजपा’ किस तरह चुनती है मुख्यमंत्री, जानते हैं केवल तीन लोग


प्रधानमंत्री मोदी की अगुवाई में किसी राज्य का मुख्यमंत्री चुनने के लिए भाजपा का फॉर्मूला गोपनीयता और हैरानी पर आधारित रहा है।

दबाव काम आया न पुराना अनुभव… अब कैसा दिख रहा है वसुंधरा राजे का राजनीतिक भविष्य?

Vasundhara Raje: राजस्थान में सीएम की रेस से क्यों बाहर हुईं वसुंधरा राजे, जानें 5 बड़े कारण

अटल हिन्द रिपोर्ट

बीते दिनों पांच राज्यों में हुए विधानसभा चुनाव में तीन में बहुमत से जीत हासिल करने वाली भाजपा अब यह तय करने में जुटी है कि इन तीनों राज्यों में मुख्यमंत्री कौन होगा। पिछला पैटर्न बताता है कि जब मुख्यमंत्री चुनने की बात आती है तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में नई भाजपा ‘गोपनीयता’ और ‘आश्चर्य’ को साथ लेकर चलती है।

मुख्यमंत्री पद के दावेदारों का न दबाव काम करता है और न ताकत। नई भाजपा सही फैसले को ज्यादा महत्व दे रही है बजाय इसके कि फैसला लेने में समय कितना लग रहा है। कुल मिलाकर भाजपा के शीर्ष तीन नेता ही जानते हैं कि आखिरी पसंद कौन होगा। ये तीन नेता हैं नरेंद्र मोदी, गृह मंत्री अमित शाह और भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा।

Vasundhara Raje Political Future : मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ की तरह ही राजस्थान में भाजपा ने सबको चौंकाते हुए पहली बार विधायक बने भजन लाल शर्मा को मुख्यमंत्री घोषित किया है। इसी के साथ वसुंधरा राजे का तीसरी बार मुख्यमंत्री बनने का सपना टूट गया, हालांकि उन्होंने इसके लिए अपनी ओर से पूरा जोर लगाया था।

Vasundhara Raje Political Future : राजस्थान में मुख्यमंत्री पद को लेकर चल रहा संशय समाप्त होने के बाद अब एक सवाल यह उठ रहा है कि प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री और भाजपा की दिग्गज नेता वसुंधरा राजे का भविष्य क्या होगा। तीन दिसंबर को चुनाव परिणाम आने के बाद से ही वसुंधरा दिल्ली के चक्कर लगा रही थीं। उन्हें मुख्यमंत्री पद के लिए एक प्रमुख दावेदार भी माना जा रहा था। लेकिन, भाजपा ने इस पद के लिए चुना है पहली बार विधायक बने भजन लाल शर्मा को।

दो बार राजस्थान की मुख्यमंत्री रह चुकीं वसुंधरा राजे इस बार विधानसभा चुनाव में भाजपा की ओर से मुख्यमंत्री का चेहरा तो नहीं थीं लेकिन परिणाम आने के बाद उन्होंने शक्ति प्रदर्शन खूब किया था। हालांकि, भले ही कोई इस बात को सामने स्वीकार न करे लेकिन मुख्यमंत्री के लिए वसुंधरा भाजपा आलाकमान की पहली पसंद बिल्कुल नहीं थीं। इसका एक कारण पूर्व में पार्टी के शीर्ष नेतृत्व के साथ हो चुकी तकरारों को भी माना जा रहा है।

लोकसभा चुनाव में भाजपा दे सकती है जिम्मेदारी
एक खबर यह भी सामने आई है कि भाजपा ने वसुंधरा के सामने विधानसभा स्पीकर के पद की पेशकश की थी लेकिन उन्होंने इससे इनकार कर दिया। हालांकि, भले ही वसुंधरा राजे को मुख्यमंत्री न बनाया गया हो लेकिन इस बात का यह मतलब कतई नहीं है कि राजस्थान की राजनीति में उनका कद घट जाएगा। इस बात को भाजपा के नेता भी स्वीकार करते आए हैं। हो सकता है कि उनकी क्षमताओं का इस्तेमाल भाजपा अब लोकसभा चुनाव में करे।

इन सब बातों पर गौर करने से प्रतीत होता है कि अगर वसुंधरा राजे को सक्रिय राजनीति में बने रहना है तो भाजपा के शीर्ष नेतृत्व से उन्हें बनाकर चलना पड़ेगा और शायद यह बात उन्होंने स्वीकार भी कर ली है। इसके अलावा यह कयास भी लगाए जा रहे हैं कि अगले लोकसभा चुनाव में अगर भाजपा जीतती है तो वसुंधरा राजे को केंद्रीय कैबिनेट में भी जगह दी जा सकती है। लेकिन तुष्टीकरण की राजनीति भाजपा करती दिख नहीं रही। हालांकि, जो भी होगा वह आने वाले समय में ही पता चल पाएगा।

विधायक दल की बैठक में खुश नहीं दिखीं वसुंधरा!
सूत्रों की मानें तो मंगलवार को विधायक दल की बैठक में रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने उन्हें कागज का एक टुकड़ा पकड़ाया था जिसमें नए मुख्यमंत्री का नाम लिखा था। वसुंधरा ने उसे खोलकर पढ़ा तो लेकिन बेमन से और तुरंत मंच से नीचे उतर गईं। इससे संकेत मिला है कि वह भाजपा शीर्ष नेतृत्व के इस फैसले से खुश नहीं हैं। लेकिन शायद पार्टी के शीर्ष नेतृत्व ने भी उन्हें संदेश दे दिया है कि दबाव की राजनीति अब ‘नई भाजपा’ में नहीं चलेगी।

इस साल पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव हुए थे और इनमें से छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश और राजस्थान में भाजपा ने बहुमत से जीत हासिल की। किसी भी राज्य में भाजपा ने मुख्यमंत्री के लिए किसी नाम का ऐलान नहीं किया था। हर चुनाव पार्टी ने कमल के फूल और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नाम पर लड़ा। ऐसे में पार्टी का रुख साफ था कि जीतने पर मुख्यमंत्री तय करने में भी वह किसी का दबाव नहीं सहेगी और ऐसा ही भगवा दल ने किया भी।

भाजपा ने तीनों राज्यों में दिया नए चेहरों को मौका
तीनों राज्यों में भाजपा ने ऐसे नेता को मुख्यमंत्री बनाया है जिनके नाम पर चर्चा या तो नहीं चल रही थी या फिर बेहद कम थी। इसके अलावा पार्टी ने पहले ही ऐसे संकेत दे दिए थे कि जीतने पर किसी भी राज्य में मुख्यमंत्री पद की जिम्मेदारी नए चेहरे को ही दी जाएगी और ऐसा ही तीनों राज्यों में देखने को मिला है। इसके अलावा भाजपा अगले साल होने वाले लोकसभा चुनाव को देखते हुए नेताओं की नई पीढ़ी तैयार करती भी नजर आ रही है।

Vasundhara Raje Not Selected Rajasthan CM: राजस्थान में भजनलाल शर्मा को मुख्यमंत्री बनाया गया है। इस बार भी बीजेपी ने चौंकाने वाले नाम का ऐलान किया। इससे पहले पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे ने 2 बार अपने समर्थक विधायकों के साथ शक्ति प्रदर्शन कर आलाकमान को आंख दिखाने की कोशिश की थी, लेकिन मोदी-शाह के दबाव के चलते उन्हें पीछे हटना पड़ा। आइए जानते हैं ऐसे कौनसे पांच कारण है जिसकी वजह से वसुंधरा सीएम की रेस से बाहर हो गई।

नई लीडर शिप की तैयारी में पार्टी
पार्टी आलाकमान शुरू से ही यह कहता आया है कि इस बार का चुनाव कमल और पीएम मोदी के चेहरे पर लड़ा जाएगा। ऐसे में वसुंधरा कई बार दिल्ली जाकर पार्टी के आला नेताओं से मिली लेकिन उनको पार्टी ने यह बताने से इंकार कर दिया कि चुनाव में उनकी क्या भूमिका होगी। यानी हर बार उन्हें पार्टी ने यह संकेत दिया कि आप इस बार पार्टी के सीएम कैंडिडेट नहीं होंगे। इसके बावजूद वसुंधरा हरी झंडी मिलने का इंतजार करती रही। विश्लेषकों की मानें तो पार्टी अब राज्यों के सीनियर नेताओं को केंद्र में लाकर राज्य में नई लीडरशिप तैयार करना चाहती है इसी क्रम में छत्तीसगढ़ और राजस्थान में नये सीएम देखने को मिले हैं।

2018 में हार की वजह
पार्टी ने 2018 में वसुंधरा को सीएम फेस बनाकर चुनाव लड़ा। पार्टी चुनाव में 163 सीटों से 72 पर सिमट गई। इस दौरान प्रदेश की सियासी फिजाओं में एक ही नारा गुंजता था वसुंधरा तेरी खैर नहीं, मोदी तुझसे बैर नहीं। यानी लोगों का स्पष्ट संदेश था कि पार्टी वसुंधरा को सीएम के पद से उतारकर किसी अन्य को चेहरा बनाए। इतना ही नहीं इसके 6 महीने बाद हुए लोकसभा चुनाव में पार्टी ने 25 सीटों पर जीत दर्ज की थी।

सीएम गहलोत से करीबी ले डूबी
राजस्थान की राजनीति में वसुंधरा और गहलोत का सियासी गठजोड़ हर समय चर्चा में रहता है। पिछले दिनों सीएम गहलोत ने धौलपुर की एक रैली में कहा था कि वसुंधरा और कैलाश मेघवाल की वजह से उनकी सरकार जाने से बच गई। हालांकि जब गहलोत सत्ता में होते हैं तो वे वसुंधरा सरकार के दौरान हुए भ्रष्टाचार पर कोई एक्शन नहीं लेते हैं। वहीं जब वसुंधरा सत्ता में होती है तो वे गहलोत सरकार के भ्रष्टाचार पर कोई एक्शन नहीं लेती थी। देश में दो विरोधी दलों के शीर्ष नेताओं में ऐसा गठजोड़ कहीं नहीं देखा गया।

2018 में हार के बाद सिनेरियो से गायब रही वसुंधरा
वसुंधरा के सीएम की रेस से बाहर होने का एक कारण उनकी निष्क्रियता भी है। वसुंधरा पार्टी के सत्ता से बाहर होते ही एकदम निष्क्रिय हो जाती है। वे कभी भी सार्वजनिक कार्यक्रमों में नहीं जाती। ना ही पार्टी के विरोध कार्यक्रमों का हिस्सा बनती है। इसकी बानगी मार्च में प्रदेश सरकार के खिलाफ हुए प्रदर्शन के दौरान देखने को मिला। जब पार्टी ने 8 मार्च को महिला दिवस पर विधानसभा के सामने विशाल धरना प्रदर्शन का आयोजन किया था जिसमें सभी विधायकों को पहुंचने के लिए कहा गया था। इस दिन वसुंधरा ने चूरू के सालासर बालाजी में अपने जन्मदिन पर शक्ति प्रदर्शन किया जिसमें 57 से ज्यादा विधायक पहुंचे थे।

भाजपा के रिवाज बदलने में बनती बड़ा रोड़ा
वसुंधरा अटल-आडवाणी के जमाने की नेता है। उस समय पार्टी हिंदी भाषी राज्यों तक सीमित हुआ करती थी। भैंरोसिंह शेखावत से नजदीकी होने के कारण उन्हें राजनीति में उतरने का मौका मिला और इसके बाद वे लगातार सीएम बनती गई। 2014 में जब से भाजपा की सरकार बनी है पार्टी सभी राज्य इकाइयों में लगातार बदलाव कर रही है। उसी का नतीजा है कि वसुंधरा अब प्रदेश में सीएम की रेस से बाहर हो गई है। इसके अलावा कई मौकों पर उनकी आलाकमान से ठन भी गई। 2018 में हार के बाद मदनलाल सैनी प्रदेश अध्यक्ष बनाए गए। पद पर रहते हुए उनका देहांत हो गया। इसके बाद करीब 2 महीने तक पार्टी नया अध्यक्ष नहीं बना पाई। वजह थी वसुंधरा राजे क्योंकि वसुंधरा अपनी पसंद का अध्यक्ष चाहती थी। ऐसे में पार्टी ने सतीश पूनिया को पार्टी का अध्यक्ष बनाया। हालांकि उनके साथ भी वसुंधरा के रिश्ते कभी सहज नहीं रहे।

सीएम रहते खास कमाल नहीं कर पाई
राजस्थान में वसुंधरा 2003-2008 और 2013-2018 तक सीएम रहीं। इस कार्यकाल के दौरान पार्टी ऐसी कोई खास रणनीति नहीं बना पाई ताकि पुनः सत्ता में वापसी सुनिश्चित हो सकें। वहीं राज परिवार से होने के कारण और अन्य कारणों के चलते वह जनता के कभी करीब नहीं हो पाई। अक्सर ऐसी शिकायतें सुनने को मिलती थी कि वसुंधरा लोगों के लिए आसानी से उपलब्ध नहीं है। ऐसे में पार्टी आलाकमान ने उन्हें सीएम उम्मीदवार के तौर पर कभी पहली पसंद में नहीं रखा। वहीं एक और कारण 2023 चुनावों के बाद बाड़ेबंदी भी है। हालांकि उसका खंडन एक विधायक ने किया था। इसके बाद लगातार उनका अपने समर्थक विधायकों से मिलना भी एक कारण था।

चुनावों का परिणाम तीन दिसंबर को आया था। इनमें मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में भाजपा को बेहतरीन जीत मिली थी। लेकिन इस बात पर सस्पेंस अभी भी बना हुआ है कि इन राज्यों में मुख्यमंत्री की कुर्सी पर कौन बैठेगा। तीनों ही राज्यों में दावेदारों के नाम पर लगातार अटकलें लग रही हैं लेकिन कुछ भी स्पष्ट नहीं हो पाया है।

दरअसल ऐसा पहली बार नहीं हो रहा है। भाजपा पहले भी इसे लेकर चौंका चुकी है। माना जा रहा है कि इन तीन राज्यों में भी कुछ ऐसा ही देखने को मिल सकता है। पार्टी की नजर अगले साल होने वाले लोकसभा चुनावों पर भी है जो इस फैसले का एक अहम कारक है। पढ़िए इससे पहले भाजपा ने सीएम के लिए कब-कब चौंकाया।

 

यूपी में योगी आदित्यनाथ

Yogi Adityanath

साल 2017 में उत्तर प्रदेश में चुनाव प्रचार के बाद योगी आदित्यनाथ ने सोचा था कि उन्हें ब्रेक मिलेगा क्योंकि उन्हें एक संसदीय समिति के टूर के लिए विदेश यात्रा पर जाना था। बता दें कि चुनाव के दौरान उनका नाम मुख्यमंत्री पद की दौड़ में कहीं सुनाई नहीं दिया था और न ही उनकी तस्वीर ही किसी चुनावी पोस्टर पर देखने को मिली थी।

लेकिन पीएम मोदी के निर्देश पर विदेश मंत्रालय ने उन्हें बाहर जाने की अनुमति देने से इनकार कर दिया। इसके कुछ दिन बाद तत्कालीन भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने उन्हें दिल्ली बुलाया और बताया कि वह उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री होंगे। इसके बाद वह लखनऊ गए और उन्हें सीएम घोषित कर दिया गया था। इस फैसले ने सबको हैरान कर दिया था।

 

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गुजरात में भूपेंद्र पटेल


साल 2021 में भूपेंद्र पटेल अहमदाबाद में अपनी विधानसभा में एक बैठक कर रहे थे और सड़क पर पौधरोपण कर रहे थे जब उनके पास एक फोन आया जिसमें उन्हें और सभी विधायकों को भाजपा कार्यालय बुलाया गया था। यहां वह आखिरी पंक्ति में बैठे थे जब गुजरात के मुख्यमंत्री के तौर पर विजय रूपाणी की जगह उनका नाम लिया गया।

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