नया गुल खिलाने की फिराक में अशोक तंवर ,ना घर के ना घाट  के 

डॉ. अशोक तंवर(ASHOK TANWAR) के स्वाभिमान बिगुल से हरियाणवी राजनीति में बदलाव के आसार
सिरसा।(SIRSA) सीएम सिटी करनाल(KARNAL) में अपने जन्मदिन को स्वाभिमान दिवस के रूप में मनाकर पूर्व सांसद डॉ. अशोक तंवर ने हरियाणवी राजनीति में हडकंप मचा दिया है, जिसमें राज्य की राजनीति में बदलाव के आसार नजर आने लगे है। इस स्वाभिमान दिवस पर देशभर से उपस्थित हुए साधु महात्माओं के अतिरिक्त बहुजन समाज पार्टी से पूर्व प्रदेशाध्यक्ष प्रकाश भारती व नरेश साखा, पूर्व बसपाई सांसद प्रमोद कुरील, सेवानिवृत्त राजदूत आजाद सिंह सहित अनेक अधिकारियों ने संकेत दिया कि डॉ. तंवर का यह प्रथम प्रयास सराहनीय है और उज्जवल भविष्य की राह पर चल पड़ा है।लेकिन अशोक तंवर की हालत आज हरियाणा की राजनीति में ना घर के ना घाट के नेता जैसी है
काबिलेगौर है कि हरियाणा के प्रमुख विपक्षी दल की भूमिका निभा रही कांग्रेस ने डॉ. तंवर के प्रदेशाध्यक्ष कार्यकाल में अपनी स्थिति मजबूत की थी, मगर कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व को राजनीतिक दवाब के चलते स्वाभिमानी व संघर्षशील परिश्रम रास नहीं आया, तो डॉ. तंवर ने अपने लक्ष्य से भटक चुकी कांग्रेस को अलविदा कह दिया। वर्तमान में हरियाणा के राजनीतिक मानचित्र अनुसार प्रदेशवासी सत्तारूढ़ भाजपा-जजपा शासन से संतुष्ट नहीं है और न ही कांग्रेस की विपक्ष भूमिका जन भावनाओंं पर खरा उतर पा रही है। हिचकोले खा रही हरियाणवी राजनीति धीरे-धीरे बदलाव की राह पकड़ रही है। ऐसी राजनीतिक परिस्थितियों में और दिल्ली विधानसभा चुनाव परिणाम ने डॉ. तंवर की स्वाभिमानी बिगुल को राजनीतिक मैदान में उतारने पर मजबूर कर दिया और इसी के साथ डॉ. अशोक  तंवर प्रदेशवासियों का फोक्स बन गए है। डॉ. तंवर ने स्वाभिमान दिवस का सफल आयोजन संकेत छोड़ गया है कि स्वाभिमान बिगुल ही राज्य की राजनीति में बदलाव लाकर नई दिशा दे सकता है। डॉ. तंवर में केजरीवाल की तरह संघर्ष व परिश्रम का चेहरा देखते हुए प्रदेशवासियों की निगाहें डॉ. तंवर के अगले निर्णय पर टिक गई है। राजनीति में संघर्ष व परिश्रम को ही सफलता की सीढ़ी माना जाता है। कांग्रेस ने डॉ. तंवर के कार्यक्रम में बाधा पहुंचाने के लिए स्वाभिमान दिवस के ही दिन प्रदेशभर में प्रदर्शन करने की घोषणा की, ताकि कांग्रेसीजन करनाल में न पहुंच पाए। बसपा हरियाणा अपनी सुप्रीमों मायावती के हरियाणा के राजनीति दलों से तालमेल व अलविदाई से स्वयं को ठगा हुआ महसूस कर रहे है, जिन्हें अब स्वाभिमान चेहरा मिल गया है, जिसकी पुष्टि बसपा के दो पूर्व प्रदेशाध्यक्षों का डॉ. तंवर के समर्थन में खड़ा होना करता है। हरियाणा राजनीति के विशेषज्ञ स्वीकार करते है कि डॉ. तंवर भविष्य में हरियाणावासियों के लिए एक सशक्त सूत्र बनकर उभर सकते है, क्योंकि संघर्ष व परिश्रम उनकी विशेषता है। अपने समर्थकों के बढ़ते दवाब और हिचकौले खा रही हरियाणवी राजनीति की तस्वीर को देखते हुए डॉ. तंवर का अगला निर्णय क्या रहेगा, इस प्रश्र का उत्तर तो प्रश्र के गर्भ में है। हरियाणा में विधानसभा चुनाव 2024 में होने है, मगर फिर भी कई राजसी दिग्गजों की नजदीकियां डॉ. तंवर की तरफ बढ़ती दिखाई देने लगी है, जोकि डॉ. तंवर की सराहना करते नजर आ रहे है। करनाल में उमड़े जन समूह से ऐसे आसार नजर आने लगे है कि निकट भविष्य में स्वाभिमानी बिगुल के कारवां में स्वाभिमानी राजसी दिग्गजों का आंकड़ा तेजी पकड़ेगा। हरियाणा (HARIYANA)की राजनीति मेंं भविष्य की तस्वीर कैसी रहेगी, यह तो आने वाला समय ही बताएगा, मगर डॉ. तंवर के प्रथम प्रयास से मचे हडकंप से कई राजनीतिक दलों से जुड़े राजसी दिग्गजों की बेचैनी जरूर बढ़ गई है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *