बंटाधार-हरियाणा से शुरू हुई बगावत मध्य प्रदेश के बाद राजस्थान में भी साबित हो रही आत्मघाती

कमजोर हाईकमान ने किया कांग्रेस का बंटाधार

दो पीढ़ियों का टकराव संभाल नहीं पा रहा कांग्रेस हाईकमान

हरियाणा से शुरू हुई बगावत मध्य प्रदेश के बाद राजस्थान में भी साबित हो रही आत्मघाती

 

====अटल हिन्द ब्यूरो ===

 

नई दिल्ली। कमजोर हाईकमान कांग्रेस के लिए आत्मघाती साबित होता जा रहा है।

पुराने क्षेत्रीय नेताओं के आगे घुटने टेकने की मानसिकता के कारण कांग्रेस की दूसरी पंक्ति के नेताओं को सत्ता की बागडोर मिलने का रास्ता

बंद हो चुका है जिसके चलते कांग्रेस में एक के बाद एक राज्यों में बगावत का बिगुल बज रहा है।

अक्टूबर 2019 में हरियाणा से कांग्रेस में बगावत का सिलसिला आरंभ हुआ था। तब हरियाणा प्रदेश कांग्रेश अध्यक्ष पद से हटाए जाने के

कारण नाराज चल रहे अशोक तंवर ने टिकटों के आवंटन में अपनी अनदेखी के चलते कांग्रेस को अलविदा कह दिया था।

अशोक तंवर को कांग्रेस के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी का खासमखास माना जाता था।

पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र हुड्डा को हरियाणा की कमान सौंपने के अलावा कांग्रेस के पास कोई विकल्प नहीं होने के चलते अशोक तंवर को हटाकर

कुमारी शैलजा को प्रदेश अध्यक्ष बनाया गया था और कोआर्डिनेशन की कमान भूपेंद्र हुड्डा को सौंपी गई थी।

अशोक तंवर को हाईकमान का फैसला रास नहीं आया जिसके चलते उन्होंने कांग्रेस को अलविदा कह दिया।

हरियाणा से कांग्रेस में बगावत का दरवाजा खुल गया।

उसके बाद पंजाब कांग्रेसमें बड़ी बगावत हुई जिसमें तेजतर्रार नेता नवजोत सिद्धू मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह के प्रताड़ना की खिलाफत करते

हुए मंत्री पद छोड़कर बागी हो गए।

हरियाणा के बाद मध्य प्रदेश में ज्योतिरादित्य सिंधिया भी पुराने कांग्रेसी दिग्गजों कमलनाथ और दिग्विजय सिंह के दो पाटों के बीच में पिस

रहे थे। अपनी लगातार अनदेखी के चलते सिंधिया भी कांग्रेस को छोड़ने को मजबूर हो गए।

कांग्रेश के पुराने महारथियों ने सिंधिया के राज्यसभा में जाने का रास्ता भी बंद कर दिया था। लगातार हो रही जलालत के चलते सिंधिया को

कांग्रेस से निकलने में ही भलाई नजर आई।

भाजपा ने सिंधिया की नाराजगी को तुरंत लपकते हुए उन्हें राज्यसभा में भेज दिया और उनके समर्थक विधायकों को मंत्रिमंडल में शामिल

करके दोहरा लक्ष्य हासिल किया।

सिंधिया की बगावत के चलते जहां मध्यप्रदेश में कांग्रेस की सरकार चली गई वही भाजपा को बड़े सियासी परिवार का मजबूत सिपहसालार

मिल गया।
मध्यप्रदेश की आग ठंडी होने से पहले ही राजस्थान में भी बगावत का बिगुल बजने की चर्चा गर्म हो चली थी।

गातार फील्ड में रहकर कांग्रेस की सरकार बनाने में अहम योगदान देने वाले सचिन पायलट को कांग्रेस हाईकमान ने सीएम बनाने की बजाय

अशोक गहलोत को ही मुख्यमंत्री गद्दी सौंप दी।

इससे आहत सचिन पायलट निरंतर अपने वजूद के लिए लड़ते रहे। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष और उप मुख्यमंत्री होने के बावजूद सचिन पायलट

को राजस्थान सरकार में वह भागीदारी नहीं मिल पाई जिसके वे हकदार थे।

मध्य प्रदेश में हुए उलटफेर ने सचिन पायलट को भी बगावत के रास्ते पर चलने के लिए तैयार कर दिया।

आज सचिन पायलट विधायक दल की बैठक में शामिल नहीं हुए और उन्हें उप मुख्यमंत्री पद के अलावा प्रदेश अध्यक्ष पद से हटा दिया गया।

उससे यह साफ हो चला है कि देर सवेर राजस्थान में भी कांग्रेस घर की महाभारत का शिकार होगी और सचिन पायलट के जरिए भाजपा

कांग्रेऊश से एक और राज्य छीन लेगी।

कांग्रेश में कमजोर हाईकमान के चलते बिखराव का दौर चल रहा है।

पुराने नेता जहां अपने वर्चस्व को कायम रखने के लिए लगातार हाईकमान पर दबाव डाल रहे हैं वहीं दूसरी तरफ दूसरी पीढ़ी के नेता अपनी

मेहनत का फल हासिल करने के लिए हाथ पैर मार रहे हैं।

राहुल गांधी के साथ खड़े रहने वाली युवा नेताओं की कतार धीरे-धीरे बागी हो रही है।

राहुल गांधी के बाद उनके नवरत्नों को पुराने नेता चमकने का मौका नहीं दे रहे हैं। भाजपा मौकापरस्ती की सियासत को बखूबी अंजाम देते

हुए नवरत्नों को लुभा रही है और अपने सत्ता के दायरे को बढ़ा रही है।

कांग्रेस हाईकमान पुराने और नए नेताओं के बीच सत्ता के संतुलन बनाने में नाकाम रहा है जिसके चलते कांग्रेश से मजबूत युवा नेता पलायन

कर रहे हैं।

कांग्रेस की घरेलू जंग के कारण भाजपा की पौ बारह हो रही है। अगर कांग्रेस हाईकमान ने अपनी गलतियों से सबक नहीं लिया तो आने वाले

समय में कांग्रेस से दमदार नेता पल्ला झाड़ जाएंगे।

कांग्रेस हाईकमान को मेहनत और पकड़ के हिसाब से नेताओं को पार्टी और सत्ता की कमान सौंपने होगी।

इस मामले में प्रेशर पॉलिटिक्स के आगे झुकने की कमजोरी उसे छोड़नी होगी।

अगर ऐसा नहीं किया गया तो कांग्रेश के लिए दिल्ली में सत्ता में वापसी के दरवाजे लंबे समय के लिए के लिए बंद हो जाएंगे‌ और प्रदेशों में

मजबूत नेता हाईकमान को ठेंगा दिखाते हुए अपनी मनमर्जी के फैसले लेने लग जाएंगे।

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