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बदल गया सियासत का नजारा खट्टर बन गए सरताज, दुष्यंत सबसे बड़ा सितारा

(Khattar became the scene of politics, Sartaj, Dushyant became the biggest star)बदल गया सियासत का नजारा

खट्टर बन गए सरताज, दुष्यंत सबसे बड़ा सितारा

===राजकुमार अग्रवाल  ==
कैथल। कल प्रदेश की राजधानी में मनोहर लाल खट्टर के दोबारा( CM)मुख्यमंत्री और दुष्यंत चौटाला ने उप मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने के साथ प्रदेश का सियासी नजारा पूरी तरह से बदल गया।
बड़े सियासी उलटफेर के परिणाम के बीच नई सरकार के गठन में 14 का अंक निर्णायक रहा।
-14वीं विधानसभा में मनोहर लाल खट्टर को दोबारा सीएम(CM) बनने का गौरव हासिल हुआ।
-14 साल बाद भाजपा और देवीलाल परिवार ने मिलकर सरकार बनाई।
-14 साल का सत्ता का वनवास दुष्यंत चौटाला ने खत्म करवाया।

जनता ने ऐसा जनादेश दिया कि भाजपा बहुमत को मोहताज हो गई।(The people gave such a mandate that the BJP fell in love with the majority.)कांग्रेस मजबूत होकर भी सत्ता से बेदखल रह गई।सत्ता की चाबी दुष्यंत चौटाला के हाथ में दे गई।नई सरकार के गठन के साथ ही प्रदेश का सियासी नजारा हर तरह से बदल गया।

खट्टर बने सत्ता के सरताज

मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर भाजपा हाईकमान के भरोसे के बलबूते पर दोबारा सत्ता के सरताज बन गए। 5 साल की सत्ता के दौरान पारदर्शी सिस्टम देने के प्रयासों ने उनका साथ दिया और बड़े-बड़े दिग्गजों के चुनावी दंगल में लुढ़क जाने के चलते मनोहर लाल खट्टर ही भाजपा हाईकमान को नई सरकार में पहले और अंतिम विकल्प नजर आए।
पिछली गलतियों से सबक लेते हुए मनोहर लाल खट्टर को इस बार खुद को पिछली बार से ज्यादा बेहतर मुख्यमंत्री साबित करना होगा।

दुष्यंत बने सत्ता के नए युवराज

जेजेपी बनाने के 11 महीने के अंदर सरकार के हिस्सेदार बनने वाले दुष्यंत चौटाला सत्ता के नए युवराज बन गए हैं।चुनावी जंग में सबसे ज्यादा सुर्खियां हासिल करने वाले दुष्यंत चौटाला ने यह साबित कर दिया कि संघर्ष कभी व्यर्थ नहीं जाता है।
उप मुख्यमंत्री बनने के साथ दुष्यंत चौटाला के कंधों पर बड़ी जिम्मेदारी और जवाबदेही आ गई है। उन्हें बेहतरीन परफॉर्मेंस के जरिए यह साबित करना होगा कि वह जहां एक तरफ जननायक स्वर्गीय देवीलाल की तरह जन हितेषी फैसले लेने की सोच रखते हैं वहीं दूसरी तरफ दादा ओम प्रकाश चौटाला की तरह कुशल प्रशासक के रूप में धड़ल्ले सरकार चलाने का दमखम रखते हैं।
उप मुख्यमंत्री बनकर दुष्यंत चौटाला समकालीन सभी युवा नेताओं से काफी आगे निकल गए हैं और नई सरकार में निभाई गई उनकी परफॉर्मेंस उन्हें और बड़े मुकाम पर ले जाने का काम करेगी।

हाथ मलते रह गए हुड्डा

चुनावों के दौरान जीत की गुंजाइश देखने की बजाय रिश्तो की रेवडि़यों के रूप में टिकट बांटने वाले भूपेंद्र हुड्डा को यह एहसास नहीं था कि जनता उनकी पार्टी को उम्मीद से 3 गुना ज्यादा सीटें जिताने का काम करेगी। अगर भूपेंद्र हुड्डा को यह एहसास होता कि उनके पार्टी 30 से ज्यादा सीटें जीत जाएगी तो वह जीत सकने वाले 20 नेताओं की टिकट नहीं काटते। अगर वे सही नेताओं को टिकट देते तो आज सत्ता के सरताज बने होते। गलत टिकटें बांटने के लिए भूपेंद्र हुड्डा सारी उम्र खुद को कोसते रहेंगे।

भस्मासुर साबित हो गए चौटाला

अजय चौटाला, दुष्यंत चौटाला और दिग्विजय चौटाला को इनेलो से बाहर फेंकने वाले पूर्व सीएम ओमप्रकाश चौटाला अपने भस्मासुरी फैसले पर पछता रहे होंगे। अगर गोहाना की रैली में ओम प्रकाश चौटाला दुष्यंत चौटाला के सिर पर आशीर्वाद का हाथ रख देते तो आज इनेलो सत्ता की सरताज होती लेकिन ऐसा करने के बजाय ओम प्रकाश चौटाला ने परिवार के सबसे काबिल युवा को पार्टी और परिवार से बेदखल करते हुए सबसे नाकाबिल अभय चौटाला को अपना सियासी वारिस घोषित कर दिया।
इस आत्मघाती फैसले के कारण जहां इनेलो लगभग खत्म हो गई है वहीं दूसरी तरफ दुष्यंत चौटाला ने 11 महीनों के अंदर ही नई पार्टी के जरिए सत्ता में हिस्सेदारी लेकर दादा को आइना दिखा दिया है।

धुरंधर बैठ गए घर

प्रदेश के सियासी इतिहास में पहली बार सभी दलों के बड़े बड़े सियासी धुरंधरों को जनता ने घर बैठाने का प्रबंध कर दिया ।
भाजपा सरकार के दो बड़े मंत्रियों राव नरबीर सिंह और विपुल गोयल को तो पार्टी ने टिकट देने के काबिल ही नहीं समझा।
इनके अलावा रामविलास शर्मा, कैप्टन अभिमन्यु, ओमप्रकाश धनखड़, कृष्ण लाल पंवार, करण देव कंबोज, कविता जैन, कृष्ण बेदी और सुभाष बराला चुनावी जंग हार जाने के कारण विधानसभा में नजर नहीं आएंगे।
कांग्रेस के बड़े चेहरे रणदीप सुरजेवाला, करण सिंह दलाल, आनंद सिंह दांगी, जयप्रकाश और कुलदीप शर्मा की आग उगलती दलीलें और छींटाकशी से इस बार विधानसभा वंचित रहेगी।
5 साल विपक्ष के नेता के रूप में सबसे आगे बैठने वाले अभय चौटाला को इस बार कोने की सीट में दुबक कर बैठने को मजबूर रहना पड़ेगा
दल बदल करने वाले बड़े चेहरों अशोक अरोड़ा, परमिंदर ढुल, रामचंदर कंबोज, रविंद्र बलियाला, बलवान सिंह दौलतपुरिया, मक्खन लाल सिंगला, जाकिर हुसैन, नसीम अहमद, रईसा खान, नगेंद्र भडाना, केहर सिंह रावत के सपने तार-तार हो गए हैं।
पार्टी की टिकट कट जाने के कारण बगावत करने वाले रणजीत सिंह, बलराज कुंडू, नैनपाल रावत, रणधीर गोलन, धर्मपाल गोंदर, राकेश दौलताबाद और सोमवीर सांगवान की बल्ले बल्ले हो गई है।

बात यह है कि प्रदेश की जनता ने भाजपा के 75 पार के नारे की ऐसी तैसी करने के अलावा तमाम टीवी चैनलों के सर्वे की धज्जियां उड़ाते हुए जहां भाजपा को आईना दिखाते हुए उसे सबसे बड़ी पार्टी बनाया है वहीं दूसरी तरफ कुंदर हुड्डा को गलत टिकटें बांटने का सही अंजाम दे दिया है।
जेजेपी के हाथ में सत्ता की चाबी देकर दुष्यंत चौटाला को जन नायक चौधरी देवी लाल की ख्वाहिशों को पूरा करने का अवसर दिया है।
ओम प्रकाश चौटाला को कुंठित और अंध सोच का नेता करार दे दिया है।
दलबदलू नेताओं को हार की मार दे कर कड़वा सबक दे दिया है।
मनोहर लाल खट्टर को पिछली गलतियों से सबक लेते हुए इस बार खुद को बेहतर मुख्यमंत्री साबित करना होगा।
अफसरों के घेरे से बाहर निकलकर उन्हें जनता और पार्टी कैडर के बीच खुद को पुल के रूप में ढालना होगा। हेड मास्टर की वर्किंग छोड़कर उन्हें धरातल की राजनीति करनी होगी।
65 साल के मनोहर लाल खट्टर को 31 साल के युवा दुष्यंत चौटाला के रूप में प्रतिभाशाली सत्ता का सारथी मिल गया है। दोनों ही शख्सियतों को परस्पर बेहतरीन तालमेल बनाते हुए जनता की उम्मीदों पर खरा उतरते हुए 5 साल जन हितैषी सरकार चलाकर दिखानी होगी।
अगर दोनों नेताओं ने परस्पर समझदारी की जुगलबंदी बनाते हुए प्रदेश को विकास के पथ पर ले जाने वाली, युवाओं को रोजगार देने वाली, महिलाओं को सुरक्षा प्रदान करने वाली, व्यापारियों और उद्यमियों को बेहतरीन माहौल देने वाली सरकार देने का काम किया तो 5 साल के बाद प्रदेश की जनता एक बार फिर उन्हें सत्ता का सरताज बनाने का काम करेगी।
अगर दोनों नेताओं ने एक दूसरे से उलझते हुए अहंकार के शिकार होकर सरकार चलाई तो बीच रास्ते में ही दोनों का रिश्ता टूट जाएगा और सरकार के खात्मे के साथ ही दोनों पार्टियों के सियासी भविष्य पर सवालिया निशान लग जाएगा।
मनोहर लाल खट्टर और दुष्यंत चौटाला को प्रदेश और जनता की जरूरतों को समझते हुए सरकार की नीतियां निर्धारित करनी होंगी और जन हितैषी फैसले लेते हुए प्रदेश को विकास से जगमग करना होगा।
दोनों का बेहतरीन तालमेल जहां पर्देश को विकास के मार्ग पर सरपट दौड़ाने का काम करेगा वही दोनों की टकराहट दोनों के सियासी खात्मे का कारण साबित होगी।
अब देखना ही है कि दोनों नेता कितनी सूझबूझ और समझदारी के साथ जनता की उम्मीदों की कसौटी पर खुद को किस तरह से सौ फीसदी खरा उतारते हैं??

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