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भारत विभाजन के समय इस सरायनुमा इमारत में रहे थे शरणार्थी, आज भी यहीं बसेरा कायम

भारत विभाजन के समय इस सरायनुमा इमारत में रहे थे शरणार्थी, आज भी यहीं बसेरा कायम

 

– यह पृथ्वी राज चौहान का किला या फिर सराय इसको लेकर असंमजस में शहरवासी

– 1191-92 में पृथ्वी राज चौहान और मोहम्मद गौरी के बीच हुए थे दो निर्णायक युद्ध

तरावड़ी, 13 सितम्बर (अटल हिन्द/रोहित लामसर)। कस्बा तरावड़ी का ऐतिहासिक दृष्टि में इसलिए ज्यादा

महत्त्व है कि यहां पर पृथ्वी राज चौहान व मोहम्मद गौरी के बीच सन 1191-92 में दो युद्ध हुए थे। जिसमें दूसरे

युद्ध में अंतिम हिन्दू सम्राट पृथ्वी राज चौहान मोहम्मद गौरी के हाथों से तराईन के (तरावड़ी) में पराजित हो गए

थे। जिन्हें यहीं से बंदी बनाकर गजनी में ले जाया गया था, वहां पर पृथ्वी राज चौहान को  मोहम्मद गौरी ने बहुत

यातनाएं दी थी। इतिहास इस बात का गवाह है कि तरावड़ी कस्बा शेरशाह सूरी मार्ग, जो आज राष्ट्रीय राजमार्ग

(नैशनल हाईवे-1) पर स्थित है। यहीं से होकर शेरशाह सूरी का मार्ग गुजरता था, जहां आज यह धरोहर स्थित

है। जो कलकत्ता से लेकर पैशावर तक जाता था। आज भी इस मार्ग पर शेरशाह सूरी द्वारा निर्मित कोस मीनार

जोकि 3.2 किलोमीटर का एक कोस होता था, इस ऐतिहासिक धरोहर (सराय) के अगल-बगल स्थित हैं। दोनों

कोस मीनारे आज भी कायम है, जो एक नई अनाज  मंडी के पास तथा दूसरी बादशाही पुल के पास अंजनथली

रोड पर कायम हैं। इस ऐतिहासिक धरोहर को जो नाम काटजू नगर दिया गया है, उसका भी इतिहास में एक

महत्त्व है। आपको बता दें कि सन 1947 में भारत विभाजन के समय जो लोग पाकिस्तान (जिला मुल्तान) की

तरफ से हिन्दूस्तान में आए थे, वह उस समय की इस सरायनुमा इमारत में शरणार्थी के रूप में बैठ गए थे,

जिनका आज तक यहीं पर बसेरा कायम है। भारत के तत्कालीन गृह मंत्री कैलाश नाथ काटजू  ने तरावड़ी में

पहुंचकर इसका उदघाटन किया,  उन्हीं के नाम से इसका नाम काटजू नगर पड़ा। वर्षों बीत गए, लेकिन वर्षाें

बाद भी न तो कैलाश नाथ काटजू ने इसकी सुध ली थी और न किसी सरकार के आलाधिकारियों ने। आपको

बता दें कि शहरवासियों के साथ-साथ दूर दराज के लोगों में आज भी यह असमंजस की स्थिति है कि यह धरोहर

पृथ्वी राज चौहान का किला हैं या फिर सराए, क्योंकि पृथ्वी राज चौहान का किला हरियाणा के हांसी हिला

हिसार में भी स्थित है, जोकि पुरातत्व विभाग द्वारा संरक्षित हैं। लेकिन तरावड़ी में पुरातत्व विभाग द्वारा भी इस

इमारत को संरक्षित नही किया गया और न ही जो लोग इसमें रह रहे हैं, यह जगह उन्हीं की मलकीयत बन

सकी। वह भी पिछले समय से लेकर आज तक बिना किसी राजस्व अधिकार के यहां पर बसे हुए हैं। हालांकि

यहां रह रहे लोगों को नगरपालिका प्रशासन की प्रत्येक सुविधा तो मिल रही हैं, लेकिन  आज तक इन्हें

मालिकाना हक नही प्राप्त हुआ। वहीं इसके साथ ही पुरातत्व विभाग द्वारा संरक्षित दो कोस मीनारों की भी

हालत बेहद खस्ता है। गंदगी के ढेर इन ऐतिहासिक धरोहरों की असलियत ब्यान कर रहे हैं।

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