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भूपेंद्र हुड्डा और कुमारी शैलजा को अब गलत टिकटें बांटने का पछतावा हो रहा होगा

भूपेंद्र हुड्डा और कुमारी शैलजा को अब गलत टिकटें बांटने का पछतावा हो रहा होगा

चंडीगढ़।
विधानसभा चुनाव में 31 सीटें हासिल करने के बाद पूर्व से भूपेंद्र हुड्डा के खेमे में उत्साह का माहौल लौट आया है। कांग्रेस के किसी भी नेता को यह भरोसा नहीं था कि विधानसभा चुनाव में पार्टी 31 सीटों पर जीत हासिल कर लेगी।
भारतीय जनता पार्टी सरकार के प्रति लोगों में नाराजगी ने कांग्रेस को 31 सीटें जीतवा दी। कांग्रेस ने अगर जीत के सही दावेदारों को टिकट दिए होते तो कांग्रेस बहुमत भी हासिल कर सकती थी।
भूपेंद्र हुड्डा और कुमारी शैलजा को अब गलत टिकटें बांटने का पछतावा हो रहा होगा ‌
कांग्रेस हाईकमान 2024 के विधानसभा चुनाव में सत्ता हासिल करने के लिए भूपेंद्र हुड्डा पर निगाहें गड़ाए हुए हैं लेकिन कांग्रेस हाईकमान का यह इकलौता विकल्प उसके लिए भारी समस्याएं भी खड़ी कर सकता है।

अकेले हुड्डा पर आश्रित रहना गलत

कांग्रेस सत्ता में वापसी के लिए पूर्व सीएम भूपेंद्र हुड्डा पर ही आश्रित नजर आ रही है। उसकी यह सोच पूरी तरह से गलत साबित हो सकती है। अगर किसी कारण भूपेंद्र हुड्डा फेल हो गए तो कांग्रेस की सत्ता की सारी उम्मीदें धूमिल हो जाएंगी।
इसलिए कांग्रेस को भूपेंद्र हुड्डा के साथ-साथ दूसरे गैर जाट नेताओं को भी अपने इलाकों में मजबूत करना होगा। कांग्रेस को सत्ता तभी हासिल हुई है जब अलग-अलग क्षेत्रों के मजबूत नेताओं ने अपने जिलों में सीटें जितावाई हैं।
भूपेंद्र हुड्डा के कारण कांग्रेस के अधिकांश मजबूत नेता या तो कांग्रेस छोड़ गए हैं या फिर खुड्डेलाइन हो गए हैं। कांग्रेस को भूपेंद्र हुड्डा के साथ-साथ जाट नेताओं रणदीप सुरजेवाला और क्रीम चौधरी को भी बराबरी का सम्मान देना होगा। उसके अलावा कुमारी शैलजा की प्रधानगी रखने के साथ-साथ कुलदीप बिश्नोई और अजय यादव जैसे दूसरे गैर जाट नेताओं को भी सियासी रूप से अहमियत देनी होगी।
कांग्रेश को ब्राह्मणों, पंजाबी और बनिया समुदाय के अलावा पिछड़ा वर्ग के नेताओं को भी उभार देना होगा।
अगर कांग्रेस ने सिर्फ भूपेंद्र हुड्डा को ही सत्ता का सिकंदर समझा तो उसके लिए भारी गलती होगी।
बात यह है कि 31 सीट मिलने के बाद भूपेंद्र हुड्डा और उनके समर्थक अपने नेता के जमकर गुणगान कर रहे हैं लेकिन हकीकत यह है कि भारतीय जनता पार्टी सरकार के प्रति जनता की नाराजगी ने ही इतनी सीटें दिलाने का काम किया। इस लिए अकेले हुड्डा के बलबूते पर कांग्रेस की सत्ता में वापसी आसान नहीं होगी। 2024 आते-आते हुड्डा 78 साल की उम्र पार कर जाएंगे और उनका शारीरिक और मानसिक तौर पर स्वस्थ रहना “गारंटिड” नहीं है।
कांग्रेस को हुड्डा के विकल्प के बारे में भी सोच कर रखना चाहिए। उसे सिर्फ एक नेता के बलबूते पर सत्ता वापसी की आस नहीं करनी चाहिए। कांग्रेस को एक नेता पर आश्रित रहने की बजाए सामूहिक नेतृत्व के बलबूते पर सत्ता हासिल करने की रणनीति पर काम करना चाहिए। 2014 और 2019 में कांग्रेस ने भूपेंद्र हुड्डा को ही टिकट बांटने का एकाधिकार दिया था लेकिन दोनों ही बार वे कांग्रेस को बहुमत दिलाने में नाकाम रहे।
अगर कांग्रेस सत्ता का फिर से सरताज बनना चाहती है तो उसे भूपेंद्र हुड्डा को अकेला सीएम का दावेदार बनाने की बजाए सामूहिक नेतृत्व के आधार पर चुनावी जंग लड़नी होगी। ऐसा नहीं किया गया तो कांग्रेसी 2024 में भी खाली हाथ रह सकती है।

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