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मजदूरी करने को हुई मजबूर !देश को गोल्ड मेडल जीताने वाली

देश को गोल्ड मेडल जीताने वाली अंतरराष्ट्रीय स्तर की प्रतिभा मजदूरी करने को हुई मजबूर !
सरकार और प्रशासन की बेरुखी के कारण मजदूरी कर रहा है अंतरराष्ट्रीय कराटे खिलाड़ी !
सरकार को बनानी चाहिए ऐसी नीति जिससे अभावग्रस्त खिलाड़ियों को मदद मिलती रहे : कुलदीप
अगर आर्थिक स्थिति तंगी नहीं होती तो वे देश के लिए पदकों की झड़ी लगा देते : अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ी
कैथल/पुंडरी, 26 दिसम्बर (कृष्ण प्रजापति): आर्थिक स्थिति कमजोर होने के चलते और सरकार व प्रशासन की बेरुखी के कारण अंतरराष्ट्रीय स्तर के कराटे खिलाड़ी आज दिहाड़ी मजदूरी करने को मजबूर है। कैथल जिले व पुंडरी हल्के के साँच गांव निवासी कुलदीप सिंह एक अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ी हैं लेकिन आजकल मजदूरी करने को मजबूर है। देश की प्रतिभा वर्तमान में केवल मात्र डीसी रेट पर ग्रुप डी की नौकरी पाने के लिए संघर्ष कर रही है लेकिन हैरानी की बात है कि इस पारदर्शी सिस्टम में वो भी नसीब नही हो रही है। अपनी उपलब्धियों की कहानी स्थानीय नेताओं और अधिकारियों को सुनाते हुए कुलदीप कई बार भावुक भी हुआ लेकिन कोई भी अधिकारी और जनप्रतिनिधि व अधिकारी उनकी उपलब्धियों को सुन नहीं रहा और उनको रोजगार देने की बजाय अंतरराष्ट्रीय प्रतिभा को अनदेखा व अनसुना कर रहे हैं। बातचीत के दौरान साँच निवासी कुलदीप सिंह ने बताया कि फ़िल्म अभिनेता अक्षय कुमार और अजय देवगन की फिल्मों में कराटे फाइट देखकर उनके शरीर में ऐसी झनझनाहट पैदा हुई और मन मे ठान लिया कि वह भी कराटे खिलाड़ी बनेगा लेकिन आर्थिक तंगी के कारण उसने कराटे सीखने के सपने को दबाए रखा।
वर्ष 2000 में दसवीं पास करने के बाद कुलदीप घर पर माता-पिता के साथ मिट्टी ढोने के कार्य में हाथ उठाने लगा था। वर्ष 2007 में गांव का ही एक व्यक्ति जो हिमाचल के शिमला में सेना के लिए कुकिंग का कार्य करते थे उन्हें अपने साथ ले गया, और काम दिलाया। यह काम हेल्पर का था, सिर्फ 4 महीनों के लिए मिला था। इस दौरान कर्मचारियों के बच्चों को एक महिला कोच कराटे सिखाने के लिए आती थी, कुलदीप ने उनसे कराटे सीखने की बात कही। करीब 22 दिनों तक महिला कोच ने उन्हें कराटे का प्रशिक्षण दिया, 4 महीने का काम खत्म होने के बाद उन्हें वापस लौटना पड़ा। लौटते समय महिला कोच ने उन्हें कुरुक्षेत्र पीपली के रहने वाले कराटे कोच सुशील शर्मा के बारे में बताया। वापस आने के बाद कुलदीप ने सुशील शर्मा से कोचिंग लेना शुरू किया लेकिन गरीबी के कारण जारी नहीं रख पाया। इस दौरान कुलदीप ने एक अंतरराष्ट्रीय, दो राष्ट्रीय और तीन राज्य स्तरीय समेत कुल 6 पदक अपने नाम किए। बाद में वह भी कोचिंग देने लगे लेकिन सीखने के लिए बच्चे नहीं जुटा पाया। सर्व शिक्षा अभियान के तहत साल में 3 महीने मिलने वाले रोजगार पर लगा, 2014 के बाद यहां भी काम नहीं मिला और पिछले 6 वर्षों से गांव में मजदूरी का कार्य कर अपने बुजुर्ग माता-पिता, पत्नी और दो बच्चों का पेट पाल रहे हैं।
बॉक्स- ये हैं खिलाड़ी कुलदीप की उपलब्धियां
सांच निवासी अंतर्राष्ट्रीय कराटे खिलाड़ी कुलदीप ने 2008 में रोड धर्मशाला कुरुक्षेत्र में हुई राज्य स्तरीय प्रतियोगिता में गोल्ड मेडल, 2009 में काठमांडू में हुई अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिता में गोल्ड मेडल, 2009 में भिवानी में हुई राज्य स्तरीय प्रतियोगिता में गोल्ड मेडल, 2009 में सैनी धर्मशाला कुरुक्षेत्र में हुई राज्य स्तरीय प्रतियोगिता में गोल्ड मेडल, 2010 में करनाल में आयोजित हुई नॉर्थ इंडिया प्रतियोगिता में कांस्य पदक और 2010 में ही दिल्ली में हुई नॉर्थ इंडिया प्रतियोगिता में रजत पदक अपने नाम किया है।
बॉक्स- समय के साथ हौसले और सपने भी धुंधले पड़ने लगे !
2009 में जब काठमांडू में अंतरराष्ट्रीय स्पर्धा में गोल्ड मेडल जीता तो कुलदीप ने तत्कालीन पुंडरी विधायक दिनेश कौशिक ने उनको 51 सो रुपए और ग्राम पंचायत ने 21 सौ रुपये इनाम देकर सम्मानित किया था। तब कुलदीप खुली आंखों से सपने देखने लगा था, गरीबी को मात देकर सपने पूरे करने का लेकिन हौसला समय के साथ टूटता गया क्योंकि परिवार की जिम्मेवारी आने के बाद कुलदीप प्रैक्टिस करने की बजाय मजदूरी करने में जुट गया।
बॉक्स- जनप्रतिनिधियों को सुनाई संघर्ष की कहानी, फिर भी नहीं मिली किसी से कोई मदद
पुंडरी क्षेत्र के गांव सांच निवासी खिलाड़ी कुलदीप प्रजापति ने बताया कि उनके संघर्ष और सपनों की कहानी स्थानीय जनप्रतिनिधियों विधायक, पूर्व विधायको, पूर्व सीपीएस, पूर्व मंत्रियों और अधिकारियों को पसंद तो बहुत आई लेकिन किसी ने मदद नहीं की। अब तक कुलदीप सिंह तत्कालीन विधायक दिनेश कौशिक, सुल्तान सिंह जी जड़ौला, तत्कालीन सांसद नवीन जिंदल से कई बार मिला लेकिन कहीं से भी कोई मदद नहीं मिली। वर्ष 2017 में मुख्यमंत्री के ओएसडी से कल्पना चावला मेडिकल कॉलेज करनाल में ग्रुप डी की नौकरी पर रखने की गुहार भी लगाई, कई बार मिला भी लेकिन उनसे भी कोई मदद नहीं मिल पाई। कुलदीप ने हार नहीं मानी व कैथल के सभी अधिकारियों से मिलकर अपनी प्रतिभा की फाइल रखी लेकिन सभी अधिकारियों ने बिना सिफारिश नौकरी देने से हाथ खड़े कर दिए और साफ मना कर दिया।
अब ऐसे में सवाल उठता है कि प्रदेश सरकार पारदर्शिता, ईमानदारी और प्रतिभाशालियो को नौकरियां देने के बड़े-बड़े दावे तो करती है, योजनाएं बनती हैं लेकिन कुलदीप जैसे अनेकों खिलाड़ी हैं, जिनकी प्रतिभा आर्थिक अभाव के कारण दबकर रह जाती हैं। पत्रकारों के समक्ष अपना दर्द बयान करते समय भावुक होकर कराटे खिलाड़ी ने बताया कि खेलना उसका जुनून है, जिला और राज्य स्तर पर ही नहीं देश विदेश में भी अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया है लेकिन वह स्थानीय राजनेताओं से और अधिकारियों के सामने हार चुके हैं। आज दुनिया नेपाल देश को कराटे का पिता कहती है लेकिन उसने कराटे में ही वर्ष 2009 में दशरथ स्टेडियम काठमांडू में अपने देश का प्रतिनिधित्व किया था और कराटे प्रतियोगिता में देश के नाम स्वर्ण पदक जीतकर यह साबित कर दिया था कि जिस देश को दुनिया कराटे का पिता कहती थी, उसी की सरजमीं से वह स्वर्ण पदक लेकर आया है। उन्होंने बताया कि वह अपनी प्रतिभा का श्रेय माता-पिता, हरियाणा कराटे एसो. के महासचिव योगेश कालड़ा, कोच सुशील शर्मा देते हैं। कुलदीप ने बताया कि आज के दौर में उसे खेल के लिए आर्थिक सहायता की जरूरत पड़ती है। सरकार को ऐसी नीति बनानी चाहिए जिससे अभावग्रस्त खिलाड़ियों को मदद मिलती रहे। उन्होंने कहा कि अगर उनके सामने आर्थिक स्थिति तंगी नहीं होती तो वे देश के लिए पदकों की झड़ी लगा देते।
बॉक्स- एम्बुलेंस कंट्रोल रूम में बैठे कर्मचारी कुलदीप सिंह व जेडकिंग शिक्षण संस्थान के संचालक बलविंदर ढुल ने जब उनकी व्यथा सुनी तो वे तुरंत भावुक हो गए। उन्होंने कुलदीप साँच की आर्थिक मदद की। अब वे खुद कुलदीप खिलाड़ी की सहायता करके खुद को गौरवान्वित महसूस कर रहे हैं।उन्होंने कहा कि उन्हें उम्मीद है कि समाज व जिले के अन्य समाजसेवी लोग, संस्थाएं, नेता व अधिकारी आगे आएंगे और खिलाड़ी की प्रतिभा का सम्मान करेंगे।
फ़ोटो- स्वर्ण पदक, रजत व कांस्य पदकों के साथ अंतरराष्ट्रीय कराटे खिलाड़ी कुलदीप सिंह।

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