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मैंने 32 साल तक सेना में सेवा की है. मेरे भाई की मौत ‘मेरी वफादारी का इनाम’ है-नूर अहमद

मैंने 32 साल तक सेना में सेवा की है. मेरे भाई की मौत ‘मेरी वफादारी का इनाम’ है-नूर अहमद

Jammu and Kashmir-सेना की हिरासत में तीन नागरिकों की प्रताड़ना के बाद मौत से लोगों में ग़ुस्सा

Jammu and Kashmir-सेना की हिरासत में तीन नागरिकों की प्रताड़ना के बाद मौत से लोगों में ग़ुस्सा

नई दिल्ली: ‘मैंने 32 साल तक सेना में सेवा की है. मेरे भाई की मौत ‘मेरी वफादारी का इनाम’ है’, ये नूर अहमद के शब्द हैं, जो उन आठ नागरिकों में से एक के भाई हैं, जिन्हें बीते शुक्रवार (22 दिसंबर) को कथित तौर पर सेना ने जम्मू कश्मीर के पुंछ जिले से पूछताछ के लिए उठा लिया था.अहमद के भाई सफीर पुंछ जिले के टोपा पीर गांव में मोहम्मद शौकत और शब्बीर अहमद के साथ उस जगह के पास मृत पाए गए थे, जहां आतंकवादियों ने 21 दिसंबर को सेना के जवानों पर हमला किया था और गोलीबारी में पांच जवान शहीद व दो घायल हो गए थे.

टोपा पीर के निवासियों का दावा है कि इसी हमले के सिलसिले में 48 राष्ट्रीय राइफल्स के जवानों ने शुक्रवार को कम से कम आठ नागरिकों को पूछताछ के लिए उठाया था.

Jammu and Kashmir-नूर अहमद ने कहा कि तीन दशकों की सेवा के दौरान उन्होंने जो भी पुरस्कार हासिल किए, उनके लिए अब उनका कोई मतलब नहीं बचा है.

उन्होंने द वायर से कहा, ‘मेरे छोटे भाई सफीरर को हिंसा का सामना करना पड़ा है; मेरा विश्वास डोल गया है. शीर्ष अधिकारियों ने हमारे घरों का दौरा किया, हमें मुआवजा दिया, न्याय का आश्वासन दिया, लेकिन क्या हमें वह कभी मिलेगा? मेरा 43 वर्षीय भाई अपने पीछे चार बच्चे छोड़ गया है, उन्हें कौन पालेगा?’

अहमद ने यह भी कहा, ‘मैंने पूरे भारत में सेना के लिए अपनी सेवा दी है, खुफिया सेवाओं का हिस्सा रहा हूं; अगर हमारे साथ ऐसा हो सकता है तो कोई और कैसे सुरक्षित रह सकता है?’

गांव के सरपंच महमूद अहमद ने कहा कि तीनों नागरिक गरीबी से जूझ रहे परिवारों से थे और मुश्किल से अपना गुजारा करते थे.

अहमद ने कहा, ‘वे सभी गुज्जर आदिवासी समुदाय से थे. ऐसे परिवारों से थे, जो केवल अपना गुजारा करने की कोशिश कर रहे थे; यहां तक कि उनकी जान भी सस्ती साबित हुई है.’

अहमद ने खुलासा किया कि अब स्थानीय लोगों में डर के साथ-साथ नुकसान की भावना भी बढ़ रही है, क्योंकि वह अपने परिजनों के ऐसे शव देख रहे हैं जिन पर यातना और उत्पीड़न के निशान हैं.

उन्होंने द वायर को बताया कि कैसे अन्य पांच बंदियों को कथित तौर पर इतनी बेरहमी से पीटा गया कि उन्हें सेना के अस्पताल ले जाया गया था.

कई लोगों को इसने अमशीपोरा फर्जी मुठभेड़ की याद दिला दी, जहां दक्षिण कश्मीर के शोपियां जिले में जुलाई 2020 में एक फर्जी मुठभेड़ में तीन लोगों की हत्या के लिए सेना की अदालत ने सेना के कैप्टन को आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी, जिसे एक न्यायाधिकरण ने निलंबित करके कैप्टन को जमानत दे दी थी.

बहरहाल कथित तौर पर हिरासत में लिए गए पुंछ जिले के नागरिकों की यातना दिखाने वाले वीडियो ऑनलाइन फैलने के बाद उनके उत्पीड़न और दर्दनाक मौत की जानकारी ने श्रीनगर में व्यापक विरोध को जन्म दे दिया.

कथित तौर पर पूछताछ और यातना के वीडियो में बंधक बनाए गए लोगों की बेरहमी से पिटाई करने से पहले उनकी पीठ पर मिर्च पाउडर छिड़कते हुए देखा जा सकता है.

इस पर जम्मू कश्मीर के राजनीतिक दलों ने तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की है.

नेशनल कॉन्फ्रेंस (एनसी) ने मामले की न्यायिक जांच की मांग की है और पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (पीडीपी) ने मांग की है कि परिवारों को 50 लाख रुपये का मुआवजा दिया जाए.

द वायर ने राजौरी-पुंछ रेंज के पुलिस उप महानिरीक्षक (डीआईजी) डॉ. हसीब मुगल से भी संपर्क किया, जिन्होंने इस मामले पर टिप्पणी करने से इनकार कर दिया और सुझाव दिया कि अधिक जानकारी के लिए सरकारी घोषणाओं का अनुसरण करें.

हालांकि वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों ने गांव का दौरा किया है और मृतकों के दफनाए जाने की प्रक्रिया की निगरानी की, लेकिन स्थानीय लोग ऐसी किसी भी स्थिति को लेकर चिंतित हैं, जिससे क्षेत्र में तनाव बढ़ सकता है.

स्थानीय अधिकारियों ने कहा कि पुलिस घटना की जांच करेगी और उचित कार्रवाई करेगी.

समाचार एजेंसी एसोसिएटेड प्रेस के मुताबिक, स्थिति को देखते हुए अधिकारियों ने शनिवार (23 दिसंबर) सुबह पुंछ और राजौरी में स्मार्ट डिवाइसेज पर इंटरनेट सेवाएं बंद कर दी हैं.

सरकार के सूचना विभाग ने एक्स (पूर्व में ट्विटर) पर लिखा कि चिकित्सीय औपचारिकताओं के बाद हत्याओं में ‘उचित प्राधिकारी द्वारा कानूनी कार्रवाई शुरू कर दी गई है.’

इसमें कहा गया है कि अधिकारियों ने पीड़ित परिवारों को वित्तीय सहायता की भी घोषणा की है.

अनुच्छेद 370 के निरस्त होने के बाद से जम्मू के राजौरी और पुंछ में सेना के खिलाफ बड़े हमले हुए हैं – खासकर पिछले दो वर्षों में. ऐसे हमलों में कम से कम 35 सैनिक मारे गए हैं, जिससे क्षेत्र में व्यापक भय, गुस्सा और चिंता फैल गई है.

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