AtalHind
लेख

रंजन गोगोई महिला यौन उत्पीड़न के आरोपी और भारत के एक खराब मुख्य न्यायाधीश होने पर मोदी सरकार में बने राज्य सभा सांसद

मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई  के तौर पर गोगोई के कार्यकाल में तीन गुनाह हुए.

रंजन गोगोई  महिला यौन  उत्पीड़न के आरोपी और भारत के एक खराब मुख्य न्यायाधीश होने पर मोदी सरकार में बने राज्य सभा सांसद 

Advertisement

रंजन गोगोई की किताब ‘जस्टिस फॉर द जज’ उनके द्वारा की गई नाइंसाफ़ियों का सबूत है

BY सिद्धार्थ वरदराजन

रंजन गोगोई भारत के एक खराब मुख्य न्यायाधीश थे और उनकी हाल ही में प्रकाशित आत्मकथा- जिसका मकसद उनके विवादास्पद कार्यकाल का बचाव करना है- बताती है कि वे कितने खराब वकील भी हैं, वह भी तब जब उन्हें खुद अपना बचाव करना है. उनके द्वारा दिए गए साक्षात्कारों के सिलसिले से यह धारणा और पुख्ता होती है.

Advertisement

मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई  के तौर पर गोगोई के कार्यकाल में तीन गुनाह हुए.

पहला था महत्वपूर्ण मामलों को भटकाने, कुछ मामलों को फास्ट ट्रैक करने और राजनीतिक तौर पर संवेदनशील मसलों को अपने चुने हुए जजों को सुपुर्द करने के लिए मास्टर ऑफ रोस्टर की अपनी शक्ति का दुरुपयोग.

दूसरा था, विभिन्न बेंचों के प्रमुख के तौर पर उनके द्वारा दिए गए बेहद विवादास्पद फैसले- जिनमें अयोध्या और रफाल जैसे बेहद अहम मामले से लेकर अभिजीत अय्यर मित्रा की अभिव्यक्ति की आजादी की याचिका, जिन्हें एक चुटकुले के लिए ओडिशा पुलिस ने गिरफ्तार किया था, जैसे दूसरे मामले शामिल हैं. नागरिकों के राष्ट्रीय रजिस्टर (एनआरसी) पर उनके द्वारा अपनाया गया रुख और शरणार्थियों के अधिकारों तथा अंतरराष्ट्रीय कानून के प्रति भारत के दायित्वों को लेकर उनका रवैया भी इसी श्रेणी में आता है.

Advertisement

सुप्रीम कोर्ट की एक पूर्व महिला कर्मचारी द्वारा उनके खिलाफ लगाए गए यौन उत्पीड़न के आरोपों पर उनका बर्ताव, तीसरा पाप था.सेवानिवृत्ति के बाद गोगोई ने अपने दामन पर एक और दाग लगा लिया: उन्होंने ऑफिस छोड़ने के कुछ हफ्तों के भीतर सरकार की तरफ से राजसभा में मनोनयन का तोहफा स्वीकार कर लिया. किसी पूर्व मुख्य न्यायाधीश द्वारा सरकार से ऐसा तोहफा स्वीकार करने की इससे पहले बस एक नजीर मिलती है, जब रंगनाथ मिश्रा ने पद से सेवानिवृत्त होने के छह साल बाद राज्यसभा का मनोनायन स्वीकार किया था.

मिश्रा को 1984 के सिख विरोधी दंगों की आधिकारिक जांच की लीपापोती करने का इनाम मिला था. अपनी किताब में गोगोई ने समझदारी दिखाते हुए इस शर्मनाक नजीर का हवाला नहीं दिया है. शायद यह कोई आश्चर्य की बात नहीं है कि बतौर सांसद उनके अब तक के करिअर में कुछ भी उल्लेखनीय नहीं हुआ है.यहां तक कि सदन में उनकी उपस्थिति भी काफी कम रही है. उनके बयान कि वे तभी संसद सत्र में शामिल होते हैं, जब ‘उनका मन होता है’, के कारण उन्हें विशेषाधिकार हनन नोटिस दिया गया है.

अपनी किताब में गोगोई के पास अयोध्या और रफाल के फैसलों पर कहने के लिए काफी कम है सिवाय इस तथ्य की आड़ में छिपने के कि पीठ के दूसरे जजों ने भी सहमति दी थी. हालांकि, सामान्य तौर पर किसी जज से उसके द्वारा दिए गए फैसलों के बचाव में कलम चलाने की उम्मीद नहीं की जाती है, फिर भी गोगोई रफाल फैसले की तथ्यात्मक गलतियों को लेकर मौन हैं.अयोध्या पर- यह इस भयंकर त्रुटिपूर्ण निर्णय में जाने की जगह नहीं है, जिसने वास्तव में 1992 में बाबरी मस्जिद का विध्संव करने वालों को इस अपराध के लिए इनाम से नवाजे जाने की इजाजत दे दी- गोगोई के पास इस सवाल का कोई वाजिब जवाब नहीं है कि आखिर आयोध्या की जमीन के मालिकाना हक वाला मुकदमा इतना ज्यादा अहम क्यों था कि इस मामले से जुड़े आपराधिक मुकदमे की सुनवाई के पूरा होने से पहले ही इसे फास्ट ट्रैक करने की जरूरत आन पड़ी वह भी तब जबकि भारत के लोकतंत्र के लिए गंभीर निहितार्थ वाले कई बेहद अहम संवैधानिक मसलों (मिसाल के लिए इलेक्टोरल बॉन्ड का मसला, या कानून-प्रशासन और संघवाद (अनुच्छेद 370)) के लिए सर्वोच्च न्यायालय के पास वक्त नहीं था.

Advertisement

गोगोई ने अपनी विचारहीन संवेदनहीनता का और परिचय देते हुए किताब में अयोध्या मामले पर फैसला देने वाली पीठ की होटल में वाइन और डिनर का आनंद लेते हुए तस्वीर भी प्रकाशित की है और उसका कैप्शन ‘ऐतिहासिक फैसले का जश्न मनाते हुए’ दिया है.

ये शब्द सिर्फ उनके हैं- न कि उनके साथी जजों के- लेकिन यह तथ्य कि भारत का मुख्य न्यायाधीश एक बेहद विवादित मामले के समापन का ‘जश्न’ मना सकता है- और इसकी घोषणा सार्वजनिक तौर पर कर भी सकता है- अपने आप में यह बताने के लिए काफी है कि वे इस मामले का निर्णय करने के लिए कितने अयोग्य व्यक्ति थे.

जम्मू और कश्मीर की स्वायत्तता छीनने और राज्य का दर्जा खत्म करने के फैसले से जुड़े मामले को प्रमुखता देने में अपनी नाकामी के साथ-साथ पूर्व राज्य के पूरे लोकतांत्रिक नेतृत्व को गैरकानूनी ढंग से हिरासत में लेने से उपजे बंदी प्रत्यक्षीकरण (हेबियस कॉर्पस) के मामले के निपटारे के तरीके का बचाव उन्होंने बेहद कमजोर तर्कों के साथ किया है.

Advertisement

सच्चाई इसके बिल्कुल उलट है और वे इस सवाल का जवाब देने की कोई कोशिश नहीं करते हैं कि आखिर भारत में स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव कराने के सवाल से जुड़े चुनावी बॉन्ड के बेहद अहम मसले की सुनवाई क्यों नहीं शुरू की गई?

लेकिन निस्संदेह तरीके से इस किताब के सबसे बेशर्म हिस्से वे हैं, जिसमें उन्होंने सुप्रीम कोर्ट की एक पूर्व महिला कर्मचारी द्वारा उन पर लगाए गए यौन उत्पीड़न के आरापों से निपटने की अपनी कोशिशों की सफाई देने का प्रयास किया है.

कानून और नैतिकता की थोड़ी-सी भी समझ रखने वाले लोगों की सर्वसम्मत राय के सामने झुकते हुए गोगोई यह स्वीकार करते हैं कि उन्हें इस मामले में भी एक जज बनने की कोशिश नहीं करनी चाहिए थी. लेकिन यह स्वीकृति भी आधे-अधूरे और कपटपूर्ण तरीके से की गई है: ‘पीठ में मेरी उपस्थिति, जिसके बारे में मुझे अब लगता है कि उससे बचा जा सकता था, एक विश्वास और समझ से परे आरोप से उपजे क्षणिक क्रोध की अभिव्यक्ति थी.’गोगोई इस दावे को दुहराते हैं कि उस महिला कर्मचारी को कुछ खास आरोपों के संदर्भ में एकतरफ़ा विभागीय कार्यवाही के बाद बर्खास्त किया गया था, और यह किसी भी तरह से उसके द्वारा लगाए गए आरोपों से जुड़ा हुआ नहीं था.’

Advertisement

उनका यह दावा ठोस कहा जा सकता था अगर वे ऐसी कोई जानकारी पेश कर पाते कि इन ‘विशेष आरोपों’ के कारण बर्खास्तगी सुप्रीम कोर्ट के हिसाब से असामान्य नहीं है. वे शायद इस ‘संयोग से भरे’ तथ्य का भी जवाब दे सकते थे कि उस महिला को इसके बाद झूठे आपराधिक आरोपों में गिरफ्तार भी किया गया था और उसके पति और देवर दोनों को ही उनकी पुलिस की नौकरी से सस्पेंड कर दिया गया था, जो साफ तौर पर बदले की कार्रवाई जैसी थी और जिसके पीछे उनका हाथ होने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता है.

इंडिया टुडे को एक इंटरव्यू में गोगोई ने यह स्वीकार करते हुए कि ‘शायद’ उस बेंच मे शामिल होना एक गलती थी, इस तथ्य की आड़ लेना चाहते हैं कि उस दिन लिए गए फैसले में उन्हें ‘क्लीन चिट’ नहीं दिया गया था. लेकिन यहां गोगोई तथ्यात्मक तौर पर गलत हैं.20 अप्रैल, 2019 को दिया गया संक्षिप्त आदेश इस प्रकार था:‘इस मामले पर विचार करने के बाद हम फिलहाल कोई न्यायिक आदेश पारित नहीं कर रहे हैं और इसे मीडिया के विवेक पर छोड़ रहे हैं कि वह संयम का परिचय देते हुए उनसे अपेक्षित जिम्मेदारी के साथ काम करें और उसी हिसाब से यह फैसला करें कि क्या प्रकाशित किया जाना चाहिए और क्या प्रकाशित नहीं किया जाना चाहिए, क्योंकि बेबुनियाद और अपमानजक आरोप न्यायपालिका की छवि को न सिर्फ धूमिल करते हैं और भरपाई न किए जा सकने की हद तक इसे नुकसान पहुंचाते हैं बल्कि उसकी आजादी को भी छीनते हैं. इसलिए फिलहाल हम अवांछित सामग्री को न छापने का जिम्मा यह मीडिया पर छोड़ते हैं.’उस दिन गोगोई द्वारा स्वतः संज्ञान लेकर की गई सुनवाई का विषय और उसका कारण गोगोई के खिलाफ लगाए गए आरोप थे, इसलिए मास्टर ऑफ रोस्टर द्वारा गठित की गई पीठ द्वारा मामले के तथ्यों में गए बगैर आरोपों को (बेबुनियाद और अपमानजनक) बताना और इसे ‘न्यायपालिका की साख को कमजोर करने वाला’ और उसे ‘भरपाई न किए जाने की हद तक नुकसान पहुंचाने वाला’ और उसकी ‘स्वतंत्रता छीनने वाला’ बताना, क्या यह अपने आप में -‘क्लीन चिट’ नहीं है?

इस मामले में अपने व्यवहार को लेकर उनकी सफाई का सबसे खराब हिस्सा वह है जिसमें वे आरोप लगाने वाली महिला के पूर्व जीवन का हवाला देते हैं और यह इशारा करते हें कि ये आरोप ‘कुछ लोगों द्वारा उस कर्मचारी को आगे करके’ उन्हें बदनाम करने की साजिश का नतीजा थे.

Advertisement

उनकी किताब द वायर द्वारा प्रकाशित इस न्यूज रिपोर्ट का भी इस्तेमाल करने की कोशिश करती है कि वह कर्मचारी और उसका परिवार संभवतः पेगासस स्पायवेयर के संभावित निशाने थे. इस रिपोर्ट में कहा गया था कि महिला और उनके परिवार वालों द्वारा इस्तेमाल किए जाने वाले कम से कम नौ फोन नंबर लीक डेटाबेस में थे.

‘यह जासूसी कथित तौर पर आरोपकर्ता द्वारा 19 अप्रैल, 2019 को अपना हलफनामा दायर करने के बाद हुई.’ इसके आगे वे जोड़ते हैं, ‘उसके सभी मुख्य आरोप, जिस पर विश्वास नहीं किया गया, कथित जासूसी से पहले के हैं.’ यानी वे एक तरह से कहना चाहते हैं कि ऐसे में इसके बाद उनकी जासूसी करने के लिए किसी के पास कोई कारण नहीं था.

वास्तव में, महिला द्वारा हलफनामा दायर करने के बाद और उनके परिवार को जासूसी करने के लिए चुनने के कई कारण हैं और इनमें से कोई भी कारण गोगोई और सुप्रीम कोर्ट के उनके नेतृत्व की प्रशंसा करने वाला नहीं है.

Advertisement

गोगोई इस अपरोक्ष इशारे से परेशान हैं- हालांकि वे यह नहीं बताते हैं कि यइ इशारा किसने किया- कि इकट्ठा की की गई सूचना उनके खिलाफ यौन उत्पीड़न के आरोपों की जांच करनेवाली बोबडे समिति द्वारा मुहैया कराई और उपयोग की गई होगी. वे स्वतंत्र मीडिया से चिढ़ी हुई सत्ता को डरावने अंदाज में चेतावनी देते हुए कहते हैं,

‘मेरे ख्याल से समय आ गया है कि सही सोच रखने वाला बहुमत अपनी आवाज बुलंद करे. वे अब मुद्दों के प्रति उदासीनता ओढ़कर और टकरावों से बचकर अपनी सुविधाभरी दुनिया में चैन की बंसी नहीं बजा सकते हैं और यह सोचकर संतोष नहीं कर सकते हैं कि दुर्भाग्य ने उन्हें बख्श दिया है. क्योंकि अगर काबू नहीं किया गया तो यह दानव कल उन्हें भी निगल सकता है.’

मुख्य न्यायाधीश के तौर पर गोगोई ने न्याय और संविधान को मजबूत करने के लिए कुछ खास नहीं किया. एक सांसद के तौर पर वे संवैधानिक मूल्यों को आज भी सीने से लगाए रखने वाले ‘दानव’ से मुकाबला करने वाली शक्तियां चाहते हैं.

Advertisement
Advertisement

Related posts

आरएसएस और भाजपा की घिनौनी चाल ,,, जो 30 साल बाद सत्ता हथियाने के लिए सिखों को खालिस्तानी और आंतकी बता ,फिर हिंदू दिमाग में सिख को लेकर संदेह और द्वेष भरने का संगठित प्रयास किया

admin

क्या प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को सत्य से परे दिए अपने वक्तव्यों पर कभी शर्मिंदगी नहीं होती

admin

फादर, उन्हें माफ़ कर देना…

admin

Leave a Comment

%d bloggers like this:
URL