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राजनीतिक दलों से पहले मतदाता जागे

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 मतदाताओं को जागरूक करने के लिये अहिंसा विश्व भारती ने मतदाता जागरूकता अभियान चला रही है। जिसका उद्देश्य है कि मतदाता को सोचने को विवश करना कि अपराधी हमारा वोट कैसे पा लेते हैं?

 

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राजनीतिक दलों से पहले मतदाता जागे

– आचार्य डॉ.लोकेशमुनि-

पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों की घोषणा हो चुकी है, लेकिन सबसे बड़ी विडम्बना जो हर बार की तरह इस बार भी देखने को मिल रहा है, वह है इन चुनावों का मुद्दाविहीन होना और दलबदल की स्थितियों का बढ़चढ़ कर सामने आना। उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड से लेकर गोवा, मणिपुर और पंजाब तक में अब मतदाताओं के हाथ में राजनीतिक दलों और नेताओं के भाग्य की कुंजी आ गई है। इन चुनावों में भी हर बार की तरह इस बार भी जातिवादी जुनून, सांप्रदायिक कट्टरता और मतदाता को लुभाने-भरमाने की कोशिशें लोकतन्त्र की जड़ों को कमजोर कर रही है। मौजूदा समय में धनबल और बाहुबल चुनावों में हावी होता जा रहा है, राजनीति कभी सेवा का जरिया हुआ करती थी किन्तु आज व्यवसाय बनती जा रही है, यह चिंता का विषय है और इससे लोकतंत्र की जडे़ कमजोर हो रही है।    इन पांच राज्यों के चुनावों में मतदाता को दोहरी भूमिका निभानी होगी- घर के मालिक की भी और घर के पहरेदार की भी। मालिक के नाते उसका कर्तव्य होगा कि वह जनता के हितों के ठेकेदार कहलाने वालों को ठोक बजाकर देखे-परखे। और घर के पहरेदार के नाते उसका कर्तव्य बनता है कि वह सिर्फ जागे ही नहीं बल्कि सतत सावधान भी रहे। इसी जागरूकता और सावधानी का तकाजा है कि वह सत्ता में बैठने के इच्छुक लोगों की कथनी-करनी को विवेक के तराजू पर तोलेे। चूंकि उसे ही सबसे अधिक खोना और सबसे अधिक पाना है, इसलिए सबसे बड़ी जिम्मेदारी भी उसी की है। इस जिम्मेदारी को मतदाता वैयक्तिक स्तर पर भी निभाएं- अपने आप से यह पूछकर कि उसके वोट देने का आधार क्या होगा। पहला निर्णय तो मतदाता को यह करना होगा कि उसे वोट देना ही है। फिर यह तय करना होगा कि वह ‘गलत’ के पक्ष में वोट नहीं देगा। जब प्रत्येक मतदाता अपने वोट का प्रयोग बहुत सोच-समझकर करेगा तभी लोकतंत्र मजबूत होगा और तभी सशक्त भारत का निर्माण हो सकेगा।     मतदाताओं को जागरूक करने के लिये अहिंसा विश्व भारती ने मतदाता जागरूकता अभियान चला रही है। जिसका उद्देश्य है कि मतदाता को सोचने को विवश करना कि अपराधी हमारा वोट कैसे पा लेते हैं? राष्ट्र की धन-सम्पदा से खिलवाड़ करने वाले भ्रष्टाचारी हमारे आदर्श कैसे बन जाते है? क्यों हम भ्रष्टाचारियों, अवसरवादियों और अपराधियों को वोट देते हैं और फिर वे हम पर राज करते हैं? हम इन स्थितियों को चुपचाप स्वीकार किए रहते हैं। लेकिन आखिर कब तक? कब तक हम ठगे जाते रहेंगे? कब तक मूक दर्शक बनकर राष्ट्र को लूटता हुआ देखते रहेंगे?    व्यक्ति और व्यवस्था के समवेत सुधार से ही समाज में बदलाव आ सकता है। व्यवस्था को संचालित करने वाले हाथ जब तक पवित्र नहीं होंगे, तब तक व्यवस्था को बदलना भी अपर्याप्त होगा। लोकतन्त्र को मजबूत बनाने के लिए योग्य प्रत्याशी का चयन जरूरी है। जिस तरह विभिन्न परीक्षाओं में मापदंड जरूरी होता है, उसी तरह राजनीति में भी योग्यता का मापदंड निश्चित होना चाहिए। वोट उसी को दें, जो ईमानदार हो, नाशमुक्त हो, जातिवादी जुनून और सांप्रदायिक कट्टरता से दूर हो तथा राष्ट्रीय एकता, मानवीय मूल्यों और सामाजिक सौहार्द में जिसका विश्वास हो। व्यक्ति जिस तरह अपनी बेटी का हाथ थमाते समय विचार करता है उसी प्रकार वोट देते समय भी विचार कर ही अपना वोट देना चाहिए।

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i    राजनीतिक दल अपने-अपने ढंग से चुनावों की तैयारियों में जुट गये हैं। गठबंधनों की बातें ही नहीं हो रही, गठबंधनों की रणनीतियां तैयार होने लगी। दलबदल हो रहा है। विभिन्न राजनीतिक दल समीकरण बनाने-बिठाने की जोड़तोड़ में जुट गये हैं। कुछ राष्ट्रीय दलों में घमासान मचा हुआ है, तो कुछ क्षेत्रीय राजनीतिक दलों के लिये ये चुनाव प्रतिष्ठा का प्रश्न बने हुए हैं। इन स्थितियों के बीच मतदाता को भी जागरूक होना है। आने वाले चुनाव में मतदाता इतने सशक्त रूप में अपनी भूमिका को प्रस्तुत करें कि राजनीतिक दल चुनाव के बाद उसकी अनदेखी करने का दुस्साहस न कर सके। यहां तक कि मतदाता को लुभाने की कोशिशें और उसे भरमाने के प्रयासों से भी राजनैतिक दल उपरत हों, यही वर्तमान की सबसे बड़ी अपेक्षा और एक सशक्त संदेश है।    राजा और प्रजा, शासक और शासित की यह व्यवस्था सदैव रही है और सदैव रहेगी। पद्धतियां बदलती रहती हैं। पहले राजा रानी के पेट से पैदा होता था और अब ‘मत पेटी’ से पैदा होता है। इसीलिये जनतंत्र में सबसे महत्वपूर्ण पहलू चुनाव है। यह राष्ट्रीय चरित्र का प्रतिबिम्ब है। जनतंत्र में स्वस्थ मूल्यों को बनाये रखने के लिए चुनाव की स्वस्थता और उसमें आम मतदाता की सक्रिय भागीदारी अनिवार्य है। राजनीतिक दलों से पहले मतदाता को जागना होगा। सभी राजनीतिक दल तो अपने घोषणा-पत्र प्रकाशित करते हैं- जनता को पांच वर्षों में अमीर बना देंगे, हर हाथ को काम मिलेगा, सभी के लिए मकान होंगे, सड़कें, स्कूल-अस्पताल होंगे, अब तो बिजली और पानी मुफ्त देने की भी होड़ लगी है। मुफ्त की नयी पनपती राजनीतिक संस्कृति में जनता मीठे स्वप्न लेती रहती है। कितने ही पंचवर्षीय चुनाव हो गये और कितनी ही पंचवर्षीय योजनाएं पूरी हो गईं पर यह दुनिया का आठवां आश्चर्य है कि कोई भी लक्ष्य अपनी समग्रता के साथ प्राप्त नहीं हुआ। मतदाता हर बार ठगा गया, भरमाया गया। फिर भी उसकी आंखें क्यों नहीं खुलती?    एक युग था जब सम्राट, राजा-महाराजा अपने राज्य और प्रजा की रक्षा अपनी बाजुओं की ताकत से लड़कर करते थे और इस कर्त्तव्य एवं आदर्श के लिए प्राण तक न्यौछावर कर देते थे। आज नारों और नोटों से लड़ाई लड़ी जा रही है, चुनाव लड़े जा रहे हैं- सत्ता प्राप्ति के लिए। जो जितना लुभावना नारा दे सके, जो जितना धन व्यय कर सके, वही आज मतदाता को भरमा सकता है। इसलिये चुनावों की तैयारी सिर्फ राजनीतिक दलों को नहीं करनी है, मतदाता को भी करनी होगी। पर क्या हम कोई तैयारी करते हैं? अथवा कोई तैयारी कर रहे हैं? राजनीतिक जोड़तोड़ और रेवड़ियां बांटने के खेल राजनीतिक दलों को ही मुबारक हों, लेकिन मतदाता की जागरूकता ही राष्ट्र को और लोकतंत्र को शुद्ध सांसे दे सकती है और इसके लिये व्यूह-रचना तो मतदाता को भी करनी होगी। मेरा वोट किसी को क्यों मिले? जिसे मैंने वोट दिया था, क्या वह मेरी अपेक्षाओं पर खरा उतरा है? वोट देने के मेरे निर्णय को गलत बातों ने तो प्रभावित नहीं किया था? जिसे मैंने वोट नहीं दिया था, क्या उसने अपनी कमियों को दूर करने की कोई कोशिश की है? ये और ऐसे अनेक सवाल हैं, जो मतदाता को लगातार खुद से पूछने होंगे। हमारा दुर्भाग्य यह है कि मतदाता की उदासीनता और उपेक्षा राजनीतिक भ्रष्टाचार एवं अपराधीकरण का सबसे बड़ा कारण है।     सच बात तो यह है कि मतदाता का काम सिर्फ विवेकपूर्ण ढंग से वोट देना ही नहीं होता, इस बात की लगातार जांच करते रहना भी होता है कि उसके वोट का सही उपयोग हो रहा है या नहीं। सवाल राजनीतिक दलों के स्वार्थों का ही नहीं है, सवाल मतदाता के साथ अक्सर होने वाले विश्वासघात का है। और इस बात का भी है कि मतदाता स्वयं को जनतंत्र के योग्य बनाने के लिए क्या कर रहा है? विकास के नाम पर लम्बे-चौड़े बजट के बावजूद क्यों सूखे के हालात, अशिक्षा, बेरोजगारी, महंगाई, कुपोषण की स्थिातियां देखनी पड़ती हैं? ऐसे सवालों का एक लम्बा सिलसिला मतदाता के दिमाग में उठना चाहिए। सवाल यह भी है कि राजनीतिक स्वार्थ अक्सर समाज और देश के हितों से बड़े क्यों हो जाते हैं? सवाल यह भी है कि देश में नोटबंदी जैसी स्थितियां क्यों आती है? सवाल यह भी है कि भ्रष्टाचार एवं कालेधन पर लम्बे समय से नारेबाजी करने वाले दलों के सामने जब इनके खिलाफ सशक्त वातावरण बन रहा होता है तो ये दल क्यों इस मुहिम से मुंह चुरा रहे थे? वे क्या देश में गरीब जनता की चिन्ता मिटायेंगे जिन्हें अपनी सत्ता बनाए रखने की चिन्ताओं से उबरने की भी फुरसत नहीं है। ऐसे राजनीतिक दल क्या भ्रष्टाचार मुक्त सशक्त नैतिक राष्ट्र का निर्माण करेंगे जिन पर रोज भ्रष्टाचार के आरोप लगते रहे हैं। जनतंत्र में सबसे बड़ा अंकुश राजनीति का नहीं, जनमत का होना चाहिए।

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