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व्यवसायिकता की अंधाधुंध दौड़ में दम तोड़ती कलम…. लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ के समक्ष चुनौतियों का पहाड़

व्यवसायिकता की अंधाधुंध दौड़ में दम तोड़ती कलम….

लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ के समक्ष चुनौतियों का पहाड़…..

राष्ट्रीय प्रेस दिवस पर विशेष….

हर वर्ष की 16 नवंबर को राष्ट्रीय प्रेस दिवस बनाकर पत्रकार इतिश्री कर लेंगे लेकिन पत्रकारिता दिवस का यह दिन हमारे अंतर्मन में झांकने और यह विचार करने का दिन है कि क्या लोकतंत्र का चौथा स्तंभ पत्रकारिता अपना दायित्व सही से निभा पा रहा है। लोकतंत्र का चौथा स्तंभ पत्रकारिता जिसका मुख्य उद्देश्य सूचना, शिक्षा एवं संचार है लेकिन वर्तमान में पत्रकारिता की बदलती परिभाषा से लोगों का पत्रकारिता से उठता विश्वास किसी से छिपा नहीं है। चैनलों से आजकल जमीनी मुद्दे बिल्कुल गायब दिखाई देते हैं और बेवजह के मुद्दों पर बहस होती है और बहस भी ऐसी मानो कोई लड़ाई का मैदान हो। विज्ञापन के पीछे भागते मीडिया ने अपनी ही मौलिकता की धज्जियां उड़ाने का कार्य किया है। चाटुकारिता अक्सर असल मुद्दों को निगल जाती है। जो हमें पूरी तरह प्रभावित करते हैं। मीडिया के कुछ चैनलों ने तो चाटुकारिता की सारी हदें पार कर दी। सत्ता पक्ष या सरकार का विपक्ष माना जाने वाला लोकतंत्र का चौथा स्तंभ मीडिया जब सरकार की चाटुकारिता में गमगीन हो जाए तो समझ लीजिए जो रिपोर्ट्स न्यूज़ चैनल पर हम देख रहे हैं वह केवल सरकार या सत्ता पक्ष का प्रोपेगेंडा हैं जो हमारे सामने परोसा जा रहा है। हमें क्या देखना चाहिए, वह हमें कभी दिखाया ही नहीं जाता बल्कि हमें सिर्फ और सिर्फ वह दिखाया जाता है जो हमें चैनलों अथवा मीडिया संस्थानों द्वारा अपने लाभ के लिए दिखाया जाना चाहिए और हम उसे बड़े चटकारे के साथ देखते हैं। हद तो तब हो जाती है जब हम अपनी सोच उसी हिसाब से बना लेते हैं। खैर यह स्वाभाविक भी है कि जो दिखता है वही बिकता है लेकिनअब चाटुकारिता की इतनी अधिक हदें पार हो चुकी है कि आम आदमी का मीडिया या पत्रकारिता से उठता भरोसा किसी से छिपा नहीं है और मीडिया का स्कॉलर होने के नाते कई बार यह सब चीजें चाह कर भी यह सब न बदल पाने का बड़ा अफसोस होता है। ऐसा नहीं है कि सभी पत्रकार सिर्फ चाटुकारिता करते हैं बल्कि बहुत से ऐसे पत्रकार हैं जो बेहद ईमानदारी और बहादुरी के साथ पत्रकारिता करते हैं लेकिन जब चैनल मालिक, मीडिया संस्थानों द्वारा उन्हें नौकरी से बार-बार निकाला जाता है तो उनकी हिम्मत जवाब दे जाती है। परिवार तो उनके साथ भी जुड़े हुए हैं और उसी के साथ जुड़ी हैं उनकी जिम्मेदारियां। ऐसे में ऐसे पत्रकार और करें भी तो आखिर करें ही क्या! पत्रकारिता की लत है ऐसी है कि छुटती ही नहीं और कोई और कार्य पत्रकार कर नहीं सकता क्योंकि उसकी पहचान एक पत्रकार के रूप में स्थापित हो चुकी है और उसके लिए पत्रकारिता ही जीवन बन चुकी होती है। लेकिन वर्तमान के दिनों में जिस तरह से बेवजह के मुद्दों को उठाकर पत्रकारिता के नाम पर कालिख पोतने का कार्य किया जा रहा है वह बेहद चिंताजनक है। आपने कभी सोचा है कि जो हमारे जमीनी मुद्दे हैं, क्या उन्हें कभी उनको मीडिया चैनलों द्वारा उठाया गया है। जिनमें शिक्षा, बेरोजगारी बिजली, पानी, सांसद विधायकों का रिपोर्ट कार्ड बहुत सारे और भी अन्य मुद्दे जो आम आदमी को पूरी तरह प्रभावित करते हैं। उनसे किसी का कोई सरोकार ही नहीं दिखता। इस समस्या का सबसे बड़ा कारण तो अधिकतर चैनलो या मीडिया संस्थानों के मालिक राजनेता हैं या बड़े बिजनेसमैन। जिनका सीधे-सीधे पत्रकारिता से कोई लेना देना नहीं है और ना ही उन्हें इस क्षेत्र का कोई ज्ञान या शिक्षा ही अर्जित की है। जो उनके द्वारा ली गई हो। वह तो बस अपने व्यापार को बढ़ावा देने के लिए पत्रकारिता को भी व्यापार का माध्यम बनाए हुए हैं। बहुत से मीडिया संस्थान पर्दे के पीछे से सरकार के साथ मिलकर एजेंडा सेट करते हैं और उस सेट किए हुए एजेंडे के हिसाब से न्यूज़ पैकेज बनाए जाते हैं और जनता को परोस दिए जाते हैं। जनता वही देखती है जो दिखाया जाता है और असलियत कुछ और ही होती है। पत्रकार अपनी जान पर खेलकर कुछ न्यूज ऐसी जुटाता है जो सनसनीखेज हो। उसे चैनलों या अखबारों द्वारा अपने नफे नुकसान के हिसाब से प्रदर्शित किया या छापा जाता है। सरकार बसपा तमाशबीन की तरह शब्द देखती रहती है क्योंकि इशारा तो सरकार का ही होता है। आजादी से पहले पत्रकारिता एक मिशन हुआ करती थी लेकिन आज वर्तमान की स्थिति को देखें तो पत्रकारिता केवल और केवल शुद्ध मुनाफा बनकर रह गई है। मुझे आज तक कोई ऐसा पत्रकार नहीं मिला जो यह कह दे कि उसे उसके मीडिया संस्थान या अखबारों द्वारा खुली छूट दी गई है कि वह जो भी न्यूज़ भेजेगा वह प्रकाशित होगी या प्रदर्शित होगी। यहां सब कुछ मैनेज है। पत्रकारिता शिक्षा देखकर नहीं बल्कि विज्ञापन देखकर मीडिया संस्थानों और चैनलों द्वारा करवाई जाने लगी है। आज का युवा महंगे विश्वविद्यालयों और कॉलेजों से मास कम्युनिकेशन और जर्नलिज्म की डिग्री तो लेकर आता है लेकिन जब वह है फील्ड में काम करता है तो उसे असलियत का पता चलता है। मीडिया संस्थानों या चैनलों द्वारा पत्रकार को लगाने से पहले ही पूरे साल के विज्ञापन इकट्ठे करने का टारगेट दे दिया जाता है। जनता के सरोकार की कोई न्यूज़ या स्टोरी एकत्रित हो या ना हो लेकिन अगर विज्ञापन एकत्रित नहीं हुए तो पत्रकार या मीडिया कर्मी की छुट्टी तय मानिए। संविधान में जो भावों की अभिव्यक्ति का अधिकार आर्टिकल 19 1a में आम जन को मिला हुआ है वही अधिकार पत्रकारों और मीडिया को मिला हुआ है। यानी संविधान में भी अभी तक की सरकारों ने लोकतंत्र के चौथे स्तंभ माने जाने वाले मीडिया के लिए अलग से किसी कानून या अधिकारों की व्याख्या ही नहीं की है। पत्रकारिता करते समय बहुत सी चीजों को झेल चुका हूं इसलिए काफी हद तक समझ चुका हूं कि आखिर वर्तमान समय में पत्रकारिता है क्या। विज्ञापन जुटाओ और मालिक की डफली बजाओ तो पत्रकारिता दौड़ने लगती है लेकिन जब बात इमानदारी और बहादुरी से पत्रकारिता करने की आती है तो पत्रकारिता धरी की धरी रह जाती है। सच में बहुत कुछ है कहने को लेकिन करने को कुछ ज्यादा है ही नहीं। ऐसे समय पर पूर्व प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी वाजपेई जी की कुछ पंक्तियां याद आती हैं कि माना अंधेरा घना है लेकिन दीप जलाना कहां मना है। आप जागरूक दर्शक और जागरूक पाठक बनिए तभी कुछ चीजों पर लगाम लगाना संभव हो सकेगा। न्यूज़ और आंकड़ों की गहराई में जाइए और सच को परखिए। चैनलों और अखबारों के हिसाब से अपनी सोच को मत बदलिए। यह वही चैनल है जो रात को 10 बजे से पहले अंधविश्वास के खिलाफ न्यूज़ दिखाते हैं और रात 10 बजे के बाद उसी चैनल पर कोई ना कोई बाबा जादूगरी शक्तियों और वशीकरण का ज्ञान पेल रहा होता है। यही हाल अखबारों का भी हो चला है। आज मीडिया की पहुँच हर घर तक है। लेकिन आज मीडिया की भूमिका पर प्रश्न चिन्ह
लगने लगा है। एक तरफा खबरें और पीत पत्रकारिता अपने चरम पर है। आज मीडिया
उद्देश्यहीन और अर्थहीन खबरे अधिक देखने को मिलती है। मीडिया लोगों की निजी
जिंदगी में तांक-झाँक करने लगा है। जिससे लोगों ने सोशल मीडिया को अपना हथियार
बना लिया है। मीडिया की चमक दमक भरी जिंदगी सबको अपनी और आकर्षित करती है। सबसे ज्यादा
आकर्षित होने वाला वर्ग युवा वर्ग है जोकि मीडिया की शिक्षा प्राप्त कर मीडिया
लाइन में चला तो जाता है। लेकिन यहाँ बिना मीडिया की शिक्षा प्राप्त किए
पत्रकारों का साम्राज्य है। यहाँ पहले से ही इतनी बेरोजगारी फैली हुई है। इसके
चलते शिक्षित मीडिया छात्रों को बिना वेतन के ही कार्य करना पड़ता है। अब मांग
उठने लगी है कि केवल मीडिया शिक्षा की डिग्री वाले छात्रों को ही पत्रकारीता
करने का दर्ज़ मिले। जिससे अच्छी और शिक्षाप्रद पत्रकारिता हो सके। पत्रकारिता को अपना खोया गौरव प्राप्त करने के लिए फिर से पत्रकारिता को मिशन बनाना होगा। तभी लोगों का लोकतंत्र के चौथे स्तंभ पर फिर से वही विश्वास और भरोसा कायम हो सकेगा।
वर्तमान समय में बड़ी मुश्किल हो चुकी है पत्रकारिता की डगर….

प्रदीप दलाल की कलम से…..

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं. इस आलेख में दी गई किसी भी सूचना की सटीकता, संपूर्णता, व्यावहारिकता अथवा सच्चाई के प्रति ATAL HIND उत्तरदायी नहीं है. इस आलेख में सभी सूचनाएं ज्यों की त्यों प्रस्तुत की गई हैं. इस आलेख में दी गई कोई भी सूचना अथवा तथ्य अथवा व्यक्त किए गए विचार #ATALHIND के नहीं हैं, तथा atal hind उनके लिए किसी भी प्रकार से उत्तरदायी नहीं है.

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