शर्मनाक =  Coronavirus ,इससे भयानक और खतरनाक  क्या हो सकता है.  

शर्मनाक =  Coronavirus से ज्यादा खतरनाक तो देश के नेता है
भारत की जनता के लिए इससे भयानक और खतरनाक  क्या हो सकता है.
  कैथल (राजकुमार अग्रवाल )
भाइयो बहनो आज रात 12 बजे यानी आधी रात से फलां कानून लागू होगा ,यानी हिटलरशाही आदेश किसी के घर  सुबह रोटी बनाने  के लिए आटा भी है  या नहीं ,कोई बिमारी आ जाये उसके लिए आम आदमी की जेब में चार आने भी है या नहीं ,कल जिसे दिहाड़ी पर जाना तो उसका क्या होगा ,जिन जगहों पर आम आदमी अपने परिवार का भरण -पोषण करने के किये काम करता है वो भी बंद ,आपके इस आदेश से आम आदमी का सब कुछ खत्म हो गया क्योंकि आम आदमी तो आम आदमी है आप जैसा गरीब चाय वाला तो है नहीं और ना ही आपके अरबों पति  मंत्रियों जैसे जिनकी सम्पति हर साल हजारों गुणा बढ़ जाती है।

विश्व में महामारी आई यानी कोरोना वायरस जिसे बड़े लोग ही हवाई जहाजों में लेकर आये ,यहाँ यह लिखना भी गलत नहीं होगा की भारत के नेता जो विदेशों में आते जाते रहते है वे भी तो इस भयानक वायरस कोरोना को अपने साथ ला सकते है इसमें कोई शक नहीं होना चाहिए क्योंकि भारत के नेता कोई दूध के धुले नहीं है उनको भी आइसोलेशन में आम आदमी के बीच रखा जाना चाहिए था लेकिन यह सब आपने नहीं किया और देश इस माहामारी की चपेट में आ गया. । अब पूरे देश में लॉकडाउन होने के कारण सैकड़ों प्रवासी पैदल ही अपने घरों की ओर लौटने को मजबूर हैं. इन लौटने वालों में हिंदुस्तान के मस्तक से गुजरती तकलीफ और वेदना की लकीरें दिखती हैं. भूख और गरीबी की अटूट जंजीरें, बिलखते बच्चे, तड़पती माताएं और छटपटाते पिता इस भीड़ का हिस्सा हैं.  प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जैसे ही देश में तालाबंदी की घोषणा की वैसे ही जनता ने उसको दिलो जान से स्वीकार कर लिया।

सुबह सड़कें ऐसी सन्नाटा थीं कि परिंदा भी पर नहीं मार रहा था। स्पष्ट था कि जनता ने सरकार को कोरोना वायरस के विरुद्ध युद्ध में अपना सहयोग देने को राजी थी। लेकिन, देश की तालाबंदी के दो दिन के अंदर कुछ-कुछ बेचैनी दिखने लगी। तुरंत यह चर्चा शुरु हो गई कि लॉकडाउन की परिस्थिति में उन करोड़ों लोगों का क्या होगा जो रोज कमाते हैं और रोज खाते हैं। जब हर कारोबार ठप है, तो यह खतरा पैदा हो गया कि रोजमर्रा की दिहाड़ी पर जीने वाला मजदूर, रिक्शेवाला, रेहड़ी वाला आदि करोडों लोगों की रोजी-रोटी कैसे चलेगी। अभी चर्चा चल ही रही थी कि प्रधानमंत्री ने दूसरे ही रोज फिर देश को संबोधित किया हर वर्ग के लिए एक पैकेज का ऐलान किया। देशवासियों को उम्मीद जगी कि चलो तालाबंदी में किसी प्रकार सरकार ने कमसे कम पेट पालने की व्यवस्था तो कर दी लेकिन लॉकडाउन की तीसरी शाम से जनता के सब्र का पैमाना छलक उठा।

 

देश की राजधानी दिल्ली में शाम होते-होते हजारों लोग सीमा पर पहुंच गए। यह सारे के सारे रोजमर्रा कमा कर खाने वाले लोग थे। वे पैदल ही कई किलोमीटर तक चलकर बॉर्डर तक पहुंचे थे और इसी प्रकार सैकड़ों मील का पैदल चलकर किसी तरह अपने-अपने गांव-शहर जाने की कोशिश कर रहे थे। उनसे पत्रकारों ने सवाल किया कि वे इस तरह कोरोना वायरस जैसी भीषण बीमारी का खतरा मोल लेकर अपने घरों से क्यों निकल पड़े। उनका सीधा जवाब था, हम कोरोना वायरस से तो मर सकते हैं, लेकिन भूख से मरना गवारा नहीं। बिना कामकाज दिल्ली में भूखों मरने से अच्छा है कि सैकड़ों मील दूर पैदल चलकर अपने गांव पहुंच जाएं, वहां कुछ नहीं तो दाल-रोटी तो नसीब होगी। दिल्ली और ऐसी ही जगहों से मजदूर वर्ग की बहुत महानगरों से पलायन की खबरों से साफ था कि सरकार ने तालाबंदी और उससे निपटने की लंबी चौड़ी घोषणाएं तो कर दीं, लेकिन कोरोना वायरस जैसे महाकाल से निपटने की कोई जमीनी तैयारी नहीं की।

बस सरकार ने केवल भाषण ही भाषण दिया, जनता के राशन पानी की कोई व्यवस्था नहीं की। और होती भी कैसे? कोरोना वायरस आपदा पड़ोस में तीन माह पूर्व शुरु हुई। चीन में हजारों लोग मर गए। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने इसे वैश्विक महामारी घोषित कर दिया। परंतु मोदी सरकार हाथ पर हाथ धरे बैठी रही। आखिर मौत का खतरा हमारे आपके घरों का दरवाजा खटखटाने लगा तो मोदी जी जागे और राष्ट्र को संबोधित किया। जनता कर्फ्यू लगाया और फिर सो गए। पहले संदेश में मोदी जी ने इस आपदा से निपटने की सारी जिम्मेदारी जनता के सिर कर दी। सोशल डिस्टेंसिंग पर लंबा चौड़ा भाषण देकर जनता को तीन सप्ताह तक घरों में कैद रहने का ऐलान कर दिया। फिर प्रधानमंत्री को सोते-सोते ध्यान आया कि पैकेज की घोषणा भी होनी चाहिए, सो वह ऐलान भी हो गया। परंतु लॉकडाउन के चौथे दिन तक सारी जिम्मेदारी जनता की ही रही थी।

 

 

सरकार क्या कर रही थी, इसका कोई पता-ठिकाना नहीं था। घोषणाएं बहुत हैं, पंरतु अभी तक जनता को कोई राहत नहीं पहुंची है। दिल्ली का यह हाल नहीं होता, लोग कोरोना वायरस का खतरा उठाकर पैदल ही सैकड़ो मील दूर अपने घरों के लिए नहीं निकल पड़ते। देश के नेता बिरादरी के लोग दिल्ली के जिन आलीशान बंगलों में रहते है ,केंद्र में सत्ताधारी पार्टी का हजारों करोड़ का आधुनिक दफ्तर ,बगलों में बने स्मारक ,किसी नेता बाप -दादा की जागीर नहीं है यह सब इन्ही गरीब जनता का है आप लोगों ने तो कब्जा किया हुआ है। आज देश के जो हालत है ये सब नेताओं की देन है ,आज लाखों महिला -पुरुष अपने नवजात बच्चों ,के साथ भूखे प्यासे इस माहामारी के बीच अपनी जान की परवाह किये बिना खुले आसमान के नीचे बैठे है इससे ज्यादा भारत के लिए शर्म की बात क्या होगी। इसलिए देश की गरीब जनता को घबराने की जरूरत नहीं है क्योंकि देश की बेरहम नेता बिरादरी उनकी रक्षा कर रही है। अब सरकारें किराया माफ करवाएं या फिर बसें चलवाएं, फर्क क्या पड़ता है. अब तो राहत के सारे ऐलान भी बेमानी से लगते हैं क्योंकि हर तरफ अफरा तफरी का माहौल है. दिल्ली बॉर्डर से बस चलने की सूचना क्या मिली, पूरी की पूरी सड़क पट गई. तिल रखने तक की जगह नहीं बची है. जब ये पता है कि कोरोना छूने से फैलता है, तब इससे खतरनाक और क्या हो सकता है.

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