शिक्षा के नाम पर पनपता लूट का बाजार…

शिक्षा के नाम पर पनपता लूट का बाजार…

प्रदीप दलाल की कलम से….

शिक्षा के बिना मनुष्य का जीवन अधूरा होता है लेकिन वर्तमान समय में गिरती शिक्षा व्यवस्था और शिक्षा व्यवस्था के नाम पर चल रही लूट देश का सबसे बड़ा विषय होना चाहिए लेकिन न तो देश का मीडिया और ना ही लोगों के द्वारा चुनी गई सरकारों ने कभी शिक्षा जैसे जमीनी विषय को अधिक महत्ता दी। अब शिक्षा व्यवस्था के नाम पर हालत और हालात तो इतने बदतर हो चले हैं कि शिक्षा सिर्फ और सिर्फ पैसे वाले लोगों के लिए ही रह गई है। शिक्षा के नाम पर देश भर में चल रहे व्यापार के भुक्तभोगी समाज के हर वर्ग के लोग हैं। शिक्षा के नाम पर लूट का सिलसिला आज इतना विकराल रूप धारण कर चुका है कि शिक्षा एक बड़े बाजार के रूप में तब्दील हो चुकी है। साधारण परिवार के बच्चों के लिए शिक्षा ग्रहण करना किसी जंग जीतने से कम नहीं है। हर माता-पिता की तमन्ना रहती है कि उनका बच्चा पढ़-लिखकर खूब बड़ा बने और दुनिया में खूब नाम रोशन करे। इन स्वप्नों को पूरा करने में स्कूल और हमारे देश की शिक्षा व्यवस्था बहुत बड़ी भूमिका निभाते हैं। लेकिन विडंबना है कि लोगों के जीवन को गढ़ने वाली यह पाठशाला आजकल एक ऐसे भयावह काले वातावरण से घिरती जा रही है जिससे निकलना फिलहाल तो काफी मुश्किल नजर आ रहा है। यह काला स्याह वातावरण व्यावसायिकता का है। वो व्यवसायिकता, जिसने अच्छी शिक्षा को सिर्फ रईस लोगों की बपौती बनाकर रख दिया है और साधारण तथा मध्यमवर्गीय परिवार अब बड़े स्कूलों को दूर से टकटकी लगाकर देखते हैं और सोचते हैं कि काश उनका बच्चा भी ऐसे स्कूलों में पढ़ पाता। आईये बात करते हैं स्कूल फीस की जो कि पहले ही आम आदमी के लिए जुटाना बहुत बड़ी बात है और जब उसमें आये दिन बाहर घुमाने के नाम पर होने वाले खर्चों को मनमाने ढंग से अभिभावक की जेब से निकाला जाता है तो एक मध्यम वर्गीय परिवार के लिए कठिन और निम्नवर्गीय परिवार के लिए असहनीय हो जाता है। विद्यालय के पहनावे के नाम पर भी विद्यालय के अन्दर ही कपड़ों का व्यापार होता है, कपड़ों और अन्य पाठ्य सामग्री को निम्न मूल्य पर खरीद कर अधिक मूल्य पर विधार्थियों को बेचा जाता है। ठीक यही पुस्तकों के साथ भी होता है। विद्यालय प्रशाशन द्वारा केवल उन्ही पुस्तकों को खरीदा जाता है जो उन्हें सस्ती पड़ती है। विद्यालयों को पुस्तकों की शब्दावली, पाठ्यक्रम अथवा लेखक से कोई लगाव नहीं है। इस प्रकार हर विद्यालय में अलग-अलग प्रकाशन की पुस्तकें चलायी जाती है। जो विद्यालयों द्वारा उच्च मूल्य पर बेचीं जाती हैं। महंगा होने के कारण इनको खरीदने के लिए अभिभावकों के माथे पर बल पड़ जाते हैं। जेएनयू में फीस बढ़ोतरी को लेकर जमकर बवाल हुआ। सरकार फीस बढ़ोतरी पर झुकी और बढ़ी हुई फीस वापस ले ली लेकिन हर स्थान और हर क्षेत्र के छात्र शिक्षा के नाम पर चल रही लूट को लेकर अपनी आवाज बुलंद नहीं करते और इसका खामियाजा वे मोटी फीस देकर भुगतते हैं। जो सीधे-सीधे छात्र की जेब पर किसी डाके से कम नहीं है। बड़ी-बड़ी यूनिवर्सिटीयों और शिक्षा संस्थानों से डिग्रियां करने के बाद छात्रों को जब बेरोजगारी ही हाथ लगती है तो वह रोजगार के लिए विदेश में चले जाते हैं और इस तरह देश की प्रतिभाओं का विदेश में प्रतिभा पलायन हो जाता है। यह हमारी व्यवस्था और देश के लिए सबसे चिंताजनक विषय है। सबसे बड़ी चिंता की बात तो यह है कि हमारी व्यवस्था और हमारा सिस्टम पीएचडी और एमफिल जैसी बड़ी शोध डिग्रियों के बावजूद युवाओं को सही रोजगार नहीं दे पाते। कई राज्यों में तो स्थितियां इतनी चिंताजनक है कि पीएचडी और एमफिल किए बच्चे चौकीदार और पीएन की नौकरी करने को मजबूर हैं। जब शिक्षा व्यवस्था में महंगाई का खेल छात्रों का तेल निकालने पर आमादा हो तो स्थिति बड़ी भयावह हो जाती है और कई बार तो छात्र उचित रोजगार न मिलने पर कई बार गलत कदम भी उठा लेता है लेकिन बावजूद इसके आजादी के 70 साल बाद भी शिक्षा व्यवस्था और हमारा सिस्टम ज्यों का त्यों बना हुआ है। सरकारें कोई भी रही हों लेकिन शिक्षा व्यवस्था दीमक की तरह खोखली होती जा रही है। दोष किसको दिया जाए हमारे द्वारा चुनी गई सरकारों को या स्वयं हमें जो गिरती शिक्षा प्रणाली और सिस्टम के खिलाफ अपनी आवाज बुलंद नहीं कर पाते। जेएनयू ही क्यों हर विश्वविधालय, कॉलेज, स्कूल में शिक्षा निशुल्क मिलनी चाहिए ताकि व्यक्ति समाज और देश को आगे बढाने में अपना योगदान सुनिश्चित कर सके।आज आवश्यकता है सरकार द्वारा इस दिशा में कुछ कड़े कदम उठाने की और फिर से वही भारत बनाने की जिसे विश्व गुरु का दर्जा प्राप्त था। आओ हम सब एक जिम्मेदार नागरिक की तरह अपनी भूमिका निभाएं और गिरती शिक्षा व्यवस्था के खिलाफ आवाज उठाएं…..

 

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