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समय के चाक की तेज़ी से मंद हुई चाक की गति.

समय के चाक की तेज़ी से मंद हुई चाक की गति….*
*असंध(दौलत बाहोत्रा)*
समय रूपी तेज़ चाक से चाक की गति मंद हुई है। चाक लकड़ी की कील पर घूमनेवाला गोलाकार पत्थर जिसपर कुम्हार मिट्टी का बर्तन बनाता है,कहा जाता है। आज भले ही चाक बिजली यंत्र के रूप में अस्तित्व में देखे जाते हैं,परंतु मंद गति से आशय आधुनिकता की दौड़ में मिट्टी को शक़्ल देने की यह कला सिमटती जा रही है और प्लास्टिक,डिस्पोजल व अन्य बाज़ारू सामानों से कुम्हार बिरादरी के रोज़गार पर ख़तरा मंडरा रहा है। ज्ञात हुआ है कि कुम्हार धने(जहां से कुम्हार मिट्टी लाकर बर्तन बनाता है) भी पूर्णतः सुरक्षित नही बता गए हैं।इनकी सुरक्षा की भी नितांत आवश्यकता महसूस की गई है।इसलिए कि जितने मिट्टी के बने बर्तन आज भी बिक जाते उससे उन्हें अपना रोज़गार चलाने में सहायता मिलती रहे।। एक समय था जब बारहों महीने कुम्हारों का चाक चला करता था एवं मिट्टी के सुंदर सुंदर बर्तन तैयार होकर हमारे घरों तक पहुंचा करते थे। कुल्हड़, मटके, सुराही, प्याली, बिलौनी, फरवा, कटोरी, कसोरे दीये व दोने आदि मिट्टी के बर्तन बनाने से पूरे परिवार को फ़ुर्सत ही नही मिलती थी साथ ही अच्छी कमाई भी हो जाती थी। इनमें खाद्दय सामग्रियों को स्टोर करने, खाना खाने के साथ-साथ हमें देश की मिट्टी को भी चुमने का सौभाग्य मिलता था। लेकिन समय के पहिये एवं आधुनिक संसाधनो ने कुम्हार जाति के चाक के पहिये की गति अब मंद कर दी है। एक तरफ बाजारों में डिस्पोजल से बने बर्तनों की बिक्री बढ़ती गई तो दूसरी तरफ मिट्टी के बर्तन बनाने वाले लोगों से रोजगार छीनता चला गया। यदि पुराने समय की बात की जाए तो मिट्टी के पात्रों का प्रयोग प्रत्येक त्यौहारो के अवसर पर किया जाता था। मिट्टी के बर्तन अपनी शुद्धता के कारण शादी विवाह के साथ अन्य समारोहों में भी काफी चलन में थे। बडी़ बात यह भी होती थी कि प्लास्टिक व थर्माकोल से बने बर्तनों की तरह मिट्टी के बने बर्तनों से पर्यावरण को भी कोई खतरा नही होता था। आज के दौर में चल रहे प्लास्टिक, एल्यूमिनियम सहित थर्माकाॅल से बने बर्तनों के प्रयोग से घातक बीमारी होने का खतरा होता है।

पुराने समय से ही चाक पर मिट्टी के बर्तन बनाना कुम्हार जाति का परंपरागत व्यवसाय रहा है। लेकिन आधुनिकता की चकाचौंध ने सब कुछ उलट कर रख दिया है। युवा वर्ग भी अब इस कला से जुड़ने की बजाय अन्य रोजगार की तरफ भाग रहा है क्योंकि आज के समय मे चाक के साथ जुड़कर दो वक्त की रोटी का जुगाड़ भी बडी़ मुश्किल से हो पाता है तो गौर किया जाए तो ऐसे इस पारंपारिक व्यवसाय का भविष्य खतरे में नजर आता है।

*राष्ट्रीय प्रजापति महासंघ* के राष्ट्रीय महासचिव सुरेंद्र कुमार प्रजापति ने दूरभाष पर हुई बात में कहा कि कुम्हार जाति के हितों के लिए वे प्रयासरत हैं। बिरादरी की जो भी समस्याएं हैं उन सबके सहयोग निवारण युक्तियां की जा रही है। उन्होंने कहा कि जहां विश्व व देश कोरोना जैसी महामारी से जूझ रहा है तो ऐसे में प्रजापति समाज के लोगों का रोजगार हाशिये पर है। कुम्हार समाज के लोगों का मुख्यतः रोजगार मिट्टी के बर्तन बनाने का है, *राष्ट्रीय कुम्हार महासभा* के राष्ट्रीयाध्यक्ष लक्ष्मीचन्द से फोन पर हुई बातचीत में उन्होंने कहा कि लाॅकडाऊन के चलते समाज के लोगों को भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है। प्रजापति समाज के मिट्टी बर्तनों से चलने वाले रोज़गार को बचाये जाने की आवश्यकता है। सरकारों को इस ओर ध्यान देना चाहिए ताकि समाज का रोजगार सूचारू रूप से चल सके व कुम्हार समाज का परंपरागत व्यवसाय सुरक्षित रह सके। एक प्रश्न के उत्तर में उन्होंने कहा कि माटी कला बोर्ड का गठन किया गया है, परंतु उसके बावजूद कुम्हार जाति के हितों की पूर्ण सुरक्षा न होना चिंता का विषय है?

लगभग 30 वर्षों से मिट्टी के बर्तन बना रहे राजबीर सिंह प्रजापति फफड़ाना ने बताया वह मटके,बिलौनी, कड़ौनी, करवे, कापनी, कसोरे, गुल्लक, चिलम, मैलखोरे, बच्चों के खिलौनें बनाते रहे हैं, परंतु इनमें से मटके फ्रिज की वजह से बहुधा कम बिकते हैं, वहीं कड़ौनी बाज़ार में बनी हुई मिल जाती है तथा कसोरे डिस्पोजल, करवे खाँड़ की बनने के कारण बिकने बंद हो गए है।मिट्ठी के खिलौनों भी नही बिकते। उन्होंने कहा कि उनकी पत्नी मीना देवी भी इस कार्य में सहायता खूब करती है। दिवाली पूजन और होई व्रत को मद्देनजर रख वे दीएं (चुग्गे),कुली,होई(छोटे मटके)बना रहे हैं। इन त्यौहारों में इनकी बिक्री कुछ ठीक हो जाती है। इसके बाद वे इस कार्य से रोज़गार नही चला सकते। परिवार का पालन-पोषण मुशिकल हो जाता है। मटके अब जन्म के समय, मृत्यु संस्कार तथा मंडे(विवाह की एक रस्म) में के लिए ही खरीदे जाते हैं। उन्होंने कहा कि शादी-विवाह में चाक पूजन की रस्म का पारम्परिक और स्थानीय लोगों द्वारा महत्व समझा जाता है।। *फोटो कैप्शन:दीएं, कुली,कापनी बनाते कुम्हार परिवार*

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