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सरकार ने संसद में ‘एनआरआई द्वारा किसान आंदोलन को फंड करने’ के सवाल को सूची से हटाया

इसे पहले बीते अक्टूबर महीने में -अटल हिन्द  – ने एक रिपोर्ट में बताया था कि किस तरह अमेरिका में रहने वाले भारतीय मूल के अरबपति दर्शन सिंह धालीवाल को 23-24 अक्टूबर की दरम्यानी रात में अमेरिका से आने के बाद दिल्ली हवाईअड्डे से ही अधिकारियों ने वापस भेज दिया था. धालीवाल छह जनवरी से सिंघु बॉर्डर पर किसानों के लंगर के लिए वित्तीय मदद दे रहे हैं.धालीवाल ने बताया था, ‘जब मैं इमिग्रेशन काउंटर पर गया तो अधिकारियों ने मुझे इंतजार करने को कहा. मैंने हवाई अड्डे पर एक घंटे से अधिक समय तक इंतजार किया. मैंने उनसे फिर पूछा कि क्या चल रहा है लेकिन उन्होंने मुझे और इंतजार कराया, दो घंटे बाद उन्होंने मुझसे कहा कि मुझे वापस अमेरिका जाना होगा.’

उन्होंने आगे कहा, ‘जब मैंने पूछा कि मुझे भारत में प्रवेश करने की अनुमति क्यों नहीं दी जा रही है, तो इमिग्रेशन अधिकारियों ने वही प्रश्न पूछे जो वे पहले से पूछ रहे थे- कि मैंने सिंघू बॉर्डर पर लंगर का आयोजन क्यों कराया और इसके लिए कौन भुगतान कर रहा है. उन्होंने कहा कि अगर मैं भारत में प्रवेश करना चाहता हूं, तो मुझे इस लंगर की फंडिंग बंद करनी होगी.’

धालीवाल ने जब दोबारा सवाल किया तो इमिग्रेशन के अधिकारियों ने कहा, ‘ऊपर से आदेश हैं.’

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राज्यसभा सांसद केसी वेणुगोपाल ने विदेश मंत्री से ये जानना चाहा था कि क्या भारत से बाहर रहने वाले आप्रवासी भारतीयों को एयरपोर्ट पर परेशान कर उन्हें वापस भेजने के मामले सामने आए हैं. उन्होंने इस संबंध में पिछले तीन साल के आंकड़े मांगे थे.

इसके साथ ही उन्होंने यह भी पूछा था कि क्या इसमें से कुछ को प्रदर्शनकारी किसानों की मदद बंद करने के लिए कहा गया था, यदि ऐसा है तो इसके विवरण उपलब्ध कराए जाएं.

इस प्रश्न को अंतिम रूप से स्वीकार कर लिया गया था और दो दिसंबर को इसका उत्तर दिया जाना था.

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इस संबंध में इंडियन एक्सप्रेस ने सूत्रों के हवाले से बताया है कि वेणुगोपाल सहित अंतिम रूप से स्वीकार किए गए प्रश्नों पर 29 नवंबर तक जवाब प्राप्त करने के लिए विदेश मंत्रालय के संबंधित कार्यालयों को 23 नवंबर को ईमेल भेजे गए थे.

हालांकि 26 नवंबर को जब मंत्रालय द्वारा स्वीकृत प्रश्नों की संभावित सूची जारी की गई तो उसमें वेणुगोपाल के सवाल शामिल नहीं थे.

इस संभावित सूची में यात्रा प्रतिबंधों में ढील, पासपोर्ट सेवा केंद्र, विदेशों में रहने और काम करने वाले लोगों के वेतन, परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह में सदस्यता, श्रीलंका में तमिल लोगों के खिलाफ मानवाधिकारों के उल्लंघन और इसी तरह के अन्य प्रश्न शामिल थे.

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इसके बाद बीते सोमवार को दो दिसंबर को जवाब देने के लिए जारी की गई अंतिम सूची में संभावित सूची के सभी प्रश्न शामिल हैं और इसमें से वेणुगोपाल के सवाल गायब हैं, जो  संभावित सूची में भी शामिल नहीं किए गए थे.

वेणुगोपाल ने कहा, ‘पहले सवाल को खारिज करने का स्पष्ट कारण बताया जाता था, लेकिन इस बार उन्होंने इसे केवल मौखिक रूप से बताया है.’

रिपोर्ट के मुताबिक किसी भी सवाल को स्वीकार करने का निर्णय राज्यसभा के सभापति द्वारा लिया जाता है, जो उपराष्ट्रपति वेंकैया नायडू हैं.

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इससे पहले मानसून सत्र के दौरान अगस्त महीने में केंद्र सरकार ने राज्यसभा सचिवालय को पत्र लिखकर कहा था कि भाकपा सांसद बिनॉय विश्वम द्वारा पेगासस मामले पर पूछे गए प्रश्न का जवाब नहीं दिया जाना चाहिए. मोदी सरकार ने दलील दी थी कि चूंकि ये मामले अभी सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन हैं, इसलिए इस पर जवाब नहीं दिया जा सकता है.इस सवाल को खारिज करने को लेकर केंद्र ने ‘राज्यों की परिषद (राज्यसभा) की प्रक्रिया और आचरण के नियम’ के नियम 47 (xix) का हवाला दिया था, जिसमें कहा गया है कि ऐसे मामले की जानकारी नहीं मांगी जानी चाहिए, जो मामला भारत के किसी भी हिस्से में न्यायालय में सुनवाई के लिए विचाराधीन है.

मालूम हो कि अंतरराष्ट्रीय मीडिया कंसोर्टियम,  ने पेगासस प्रोजेक्ट के तहत यह खुलासा किया था कि इजरायल की एनएसओ ग्रुप कंपनी के पेगासस स्पाइवेयर के जरिये नेता, पत्रकार, कार्यकर्ता, सुप्रीम कोर्ट के अधिकारियों के फोन कथित तौर पर हैक कर उनकी निगरानी की गई या फिर वे संभावित निशाने पर थे.

एनएसओ ग्रुप यह मिलिट्री ग्रेड स्पायवेयर सिर्फ सरकारों को ही बेचती हैं. भारत सरकार ने पेगासस की खरीद को लेकर न तो इनकार किया है और न ही इसकी पुष्टि की है. फिलहाल, सुप्रीम कोर्ट गठित जस्टिस रवींद्रन कमेटी इस मामले की जांच कर रही है.

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इसके अलावा केंद्रीय कानून मंत्रालय ने इसी साल 15 जुलाई को राज्यसभा सचिवालय को एक पत्र लिखकर कहा था कि तृणमूल कांग्रेस के सांसद शांता छेत्री द्वारा ‘लोकतंत्र सूचकांक में भारत की स्थिति’ पर पूछे गए एक प्रश्न को अस्वीकार कर दिया जाए, जिसका उत्तर 22 जुलाई को दिया जाना था.

छेत्री ने इकोनॉमिस्ट इंटेलिजेंस यूनिट (ईआईयू- (इकोनॉमिस्ट समूह की अनुसंधान एवं विश्लेषण विभाग)) के डेमोक्रेसी इंडेक्स (Democracy Index) में भारत की स्थिति पर सवाल उठाया था. रिपोर्ट में कहा गया है कि इस सूचकांक में भारत को ‘त्रुटिपूर्ण लोकतंत्र’ की श्रेणी में रखा था.

कानून मंत्रालय ने इसे लेकर तर्क दिया था कि ये ‘बेहद संवेदनशील प्रकृति’ का है, इसलिए इसे अस्वीकार किया जाए.

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