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सवाल है तो चुभेगा भी-दलित की बेटी या समाज की बेटी?

दलित की बेटी या समाज की बेटी?

सवाल है तो चुभेगा भी। होश में कब आएंगे राजनीतिक दल और मीडिया वालेे? हर बार बलात्कार और हत्या एवं उत्पीड़न के मामलों में जाति धर्म तलाश करने वालों का सिर्फ एक ही मकसद नजर आता है अपने वोटों का हित साधना।

मुंबई हाईकोर्ट ने 2018 के अपने एक फैसले में कहा था कि मीडिया को दलित शब्द का प्रयोग नहीं करना चाहिए इसके बाद सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय द्वारा भी टीवी चैनलों को अनुसूचित जाति जनजाति शब्द का प्रयोग करने की सलाह दी गई थी। लेकिन मीडिया लगातार न केवल दलित शब्द का प्रयोग करती है बल्कि पीड़ित कोई भी हो उसका धर्म और जाति पहले लिखी जाती है। पिछले दिनों उत्तर प्रदेश में ब्राह्मण समाज के लोगों की हत्याओं का मामला खूब उछला था, कभी मुस्लिम समुदाय के नाम पर कभी पिछड़ों के नाम पर राजनीति ही होती है जब सत्तासीन किसी भी दल को किसी कमजोर वर्ग को उसकी ज़रूरत के मुताबिक मदद करने का नंबर आता है तब सभी नागरिक समान हो जाते हैं और आरक्षण तक को दरकिनार कर दिया जाता है यहां तक कि आरक्षण का विरोध करने वाले और आर्थिक आधार पर आरक्षण देने का समर्थन करने वालों को भी कुछ नहीं मिलता। हां किसी की अस्मत, जान माल लूट ली जाए तो उसकी जाति धर्म देखकर वोटों की सेंधमारी ज़रूर की जाती है ऐसे में पीड़ित जिस वर्ग, समुदाय अथवा जाति से है उसका दोहरा चीर हरण किया जाता है।

शर्म आनी चाहिए एक ऐसा संविधान जो अपने नागरिकों में किसी प्रकार से जातिगत अथवा धार्मिक भेदभाव नहीं करता है उसी संविधान की रक्षा के लिए सड़कों पर उतरने वाले राजनीतिक दल जब किसी पीड़ित का वर्ग अथवा जाति का नाम लेकर संघर्ष करते हैं तब वह सब इस बात पर मुहर लगाते हैं, परोक्ष रूप में स्वीकार करते हैं कि हमारे समाज में एकजुटता नहीं है एक वर्ग विशेष आज़ादी के 75 वर्षों में भी दयनीय हालत में है।

हाथरस में एक लड़की की न केवल अस्मिता को बुरी तरह रौंदा गया बल्कि उसके साथ दरिंदगी की हदें पार करते हुए उसकी जीभ काट डाली गई, उसकी गर्दन तोड़ दी गई आखिर अस्पताल में मौत से लड़ते लड़ते वह हार गई और फिर पुलिस ने जबरन बिना किसी रस्मो रिवाज के उसके परिजनों को बंधक बनाकर अंतिम संस्कार के नाम पर उसकी लाश को जला दिया। यह सब भयावह था रूह कांप उठी यह सब सुनकर देखकर तमाम सामाजिक और राजनीतिक लोग विरोध में सड़कों पर आ गए आना ही चाहिए, ज़ुल्म को बर्दाश्त नहीं किया जा सकता, विरोध ज़रूरी है। लेकिन जिस तरह हर कोई दलित बेटी दलित बेटी का नारा लगाकर विरोध और आपत्ति दर्ज करा रहा है यह कहीं न कहीं जातिगत समीकरण साधने का प्रयास नज़र आता है या फिर वास्तव में आज भी अनुसूचित जाति जनजाति के लोगों के साथ उत्पीड़न और शोषण होता है। संघर्ष और विरोध करने वाले लोग खुद इसका जवाब तलाश करें साथ ही यह भी तय करें कि वह दलित की बेटी थी या हमारे समाज की।

डिसक्लेमर : ऊपर व्यक्त विचार लेखक के अपने हैं


रविश अहमद
मै स्वतंत्र रूप से भारतीय संविधान के अनुसार अपनी अधिकतम जानकारी के अनुसार आम आदमी के लिए उसके अधिकारों और संवैधानिक व्यवस्था के हित एवं जन्हितार्थ लिखने का प्रयास करता हूं। राजनीतिक, सामाजिक मुद्दों पर लिखना पसंद है।

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