सावित्री मिश्रा लिखती है एक रचना ओडिशा से ‘ विदाई

विदाई
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माता -पिता ने खुशी -खुशी कर दी बेटी की विदाई,
पर किस्मत को शायद ये खुशी रास ना आई।
दहेज लोलुपों को बहू में बेटी ना नज़र आई ,
जहर दिया फिर मिट्टी तेल डाल आग थी लगाई ।
जाको राखो साइयाँ की कहावत सच हो आई,
पड़ौसियों ने सूझ-बूझ से यामिनि की जान बचाई।
पिता संग यामिनि लौट के मायके जब आई,
देख के बेटी की हालत माँ की आँखें भर आईं।
बेटी को ममता के आँचल में समेट उसने लिया,
नए हौंसले नई प्रेरणा दे मुकाम उसे नया जीवन दिया।
आज यामिनी शिक्षा की जोत जगाती है,
बिखरी टूटी लड़कियों को जीने की राह दिखाती है।
हर माता-पिता से हाथ जोड़ ये निवेदनहै मेरा,
कभी ना कहना बेटी ये घर हुआ पराया तेरा।
विदाई के बाद भी बेटी अपनी ही होती है,
सदा माता-पिता की ममता की छाँव मे वो जीती है।।

सावित्री मिश्रा
झारसुगुड़ा,ओडिशा

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