सुरक्षा परिषद की सरंचना विश्व की वर्तमान स्थिति से मेल नहीं खाती

सयुंक्त राष्ट्र महासभा की 74वीं बैठक में  एक बार फिर भारत ने कहा कि सुरक्षा परिषद की सरंचना विश्व की वर्तमान स्थिति से मेल नहीं खाती और यह सही अर्थों में दुनिया की प्रतिनिधिमूलक संस्था नहीं है ।अतः इसके ढांचे में परिवर्तन की आवश्यकता है।
कुछ देशों ने सुझाव दिया है कि सुरक्षा परिषद के स्थायी सदस्यों की संख्या बढ़ा दी जाए या वीटो के अधिकार में संशोधन किया जाए या फिर वीटो का अधिकार ही पूर्णत: समाप्त कर दिया जाए। ये तीनों विकल्प भले एक-दूसरे के विरोधी जान पड़ें, पर इनसे संयुक्त राष्ट्र के शक्ति-संतुलन में निश्चित ही नाटकीय परिवर्तन हो सकेगा और इस प्रकार संयुक्त राष्ट्र, जो वर्तमान में एक प्रकार से अप्रभावी-सा है, बहुत कुछ प्रभावी हो सकेगा।

अगर सुरक्षा परिषद का परिचय दिया जाए तो यह संयुक्त राष्ट्र का सबसे शक्तिशाली निकाय है जिसकी प्राथमिक ज़िम्मेदारी अंतर्राष्ट्रीय शांति और सुरक्षा कायम रखना है। सयुंक्त राष्ट्र का अस्तित्व ही सुरक्षा परिषद पर आधारित है। उसके सारे कार्यक्रम तब तक कार्यरूप नहीं ले सकते जब तक सुरक्षा परिषद की उस पर स्वीकृति न हो। यहां तक कि संयुक्त राष्ट्र का बजट भी सुरक्षा परिषद के अधीन है। उसकी स्वीकृति के बिना बजट के लिए न तो धन की आपूर्ति हो सकती है और न ही कोई कार्य पूरा किया जा सकता है।
सुरक्षा परिषद की शक्तियों में शांति अभियानों का योगदान, अंतर्राष्ट्रीय प्रतिबंधों को लागू करना तथा सुरक्षा परिषद के प्रस्तावों के माध्यम से सैन्य कार्रवाई करना शामिल है।यह सदस्य देशों पर बाध्यकारी प्रस्ताव जारी करने का अधिकार वाला संयुक्त राष्ट्र का एकमात्र निकाय है।संयुक्त राष्ट्र चार्टर के तहत सभी सदस्य देश सुरक्षा परिषद के निर्णयों का पालन करने के लिये बाध्य हैं।
मूल रूप से सुरक्षा परिषद में 11 सदस्य थे जिसे 1965 में बढ़ाकर 15 कर दिया गया।वर्ष 1965 के विस्तार के बाद संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में कुल 15 सीटें हो गई। , जिनमें 4 अस्थायी सीटों को जोड़ा गया, लेकिन स्थायी सीटों की संख्या पूर्ववत ही रही। 1965 के बाद से सुरक्षा परिषद का विस्तार नहीं हुआ । सुरक्षा परिषद के पाँच स्थायी सदस्य हैं- अमेरिका, ब्रिटेन, फ्राँस, रूस और चीन। सुरक्षा परिषद के स्थायी सदस्यों के पास वीटो का अधिकार होता है। इन स्थायी सदस्य देशों के अलावा 10 अन्य देशों को दो साल के लिये अस्थायी सदस्य के रूप में सुरक्षा परिषद में शामिल किया जाता है। अस्थायी सदस्य देशों को चुनने का उदेश्य सुरक्षा परिषद में क्षेत्रीय संतुलन कायम करना है।अस्थायी सदस्यता के लिये सदस्य देशों द्वारा चुनाव किया जाता है। इसमें पाँच सदस्य एशियाई या अफ्रीकी देशों से, दो दक्षिण अमेरिकी देशों से, एक पूर्वी यूरोप से और दो पश्चिमी यूरोप या अन्य क्षेत्रों से चुने जाते हैं।

हालांकि इस संगठन पर वर्षों से अमेरिका का ही दबदबा रहा है । राष्ट्र संघ को सर्वाधिक आर्थिक सहयोग भी यही प्रदान करता है। वस्तुतः अमेरिकी वर्चस्व के कारण ही सयुंक्त राष्ट्र के 70 वर्ष पूरे हो जाने व उसकी सदस्य संख्या 193 हो जाने के बावजूद भी सुरक्षा परिषद का अभी तक विस्तार नहीं हुआ है। बदली हुई परिस्थितियों का तकाजा है कि सुरक्षा परिषद का सुधार व  विस्तार किया जाये ।सुधार केवल इसलिए नहीं कि ये पांच निर्णायक राष्ट्र विश्व-व्यवस्था में मनमाना रवैया रखते हैं बल्कि इनके नेतृत्व वाला संयुक्त राष्ट्र न ही आज की बहुपक्षीय आर्थिक-राजनीतिक विश्व प्रणाली का प्रतिनिधित्व करता है और न ही यह बहुधा वैश्विक विवादों का समाधान ही दे पा रहा है। दारफूर संकट, जंजावीड उन्माद, स्रेबेनिका सामूहिक हत्याकांड, इजराइल-अरब संघर्ष, कुवैत संकट , इराक संकट और रवांडा संकट  आदि मसलों पर संयुक्त राष्ट्र की विफलता इसके सुधारों के प्रति इसकी उदासीनता को ही पुष्ट करती है।
इसके अलावा आज चीन को छोड़कर सुरक्षा परिषद के बाकी चार स्थायी सदस्य देशों अमेरिका , रूस , ब्रिटेन और फ्रांस की कुल आबादी भारत की वर्तमान आबादी से आधी भी नहीं है । चीन को मिलाकर भी ये देश दुनिया की कुल आबादी के एक तिहाई हिस्से का भी प्रतिनिधित्व नहीं करते । दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी आबादी वाले व दुनिया के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश भारत का सुरक्षा परिषद में स्थायी प्रतिनिधिनत्व नहीं होना विडम्बना पूर्ण ही कहा जायेगा ।

वस्तुतः भारत , ब्राज़ील , जापान , जर्मनी और दक्षिण अफ्रीका को स्थायी सदस्यता देने की मांग पिछले कई वर्षों से उठती रही है ।  हम जानते है कि संयुक्त राष्ट्र के नियमित बजट में जापान दूसरा सबसे बड़ा योगदानकर्ता देश है, जबकि इस तरह के योगदान में जर्मनी का तीसरा स्थान है। ऐसे में जर्मनी और जापान की दावेदारी को समझा जा सकता है। लातिन अमेरिका में ब्राजील न केवल क्षेत्रफल बल्कि आबादी और अर्थव्यवस्था के लिहाज से भी सबसे बड़ा देश है। यही कारण है कि ब्राजील सहित संपूर्ण जी-4 की दावेदारी का भारत समर्थन करता है। जी-4 के अतिरिक्त, इटली के नेतृत्व में ‘यूनाइटिंग फॉर कंसेंसस’ भी सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता की मांग करता है।
इसके अतिरिक्त अफ्रीका का कोई भी देश सुरक्षा परिषद का स्थायी सदस्य नहीं है, जबकि संयुक्त राष्ट्र का 50 प्रतिशत से अधिक कार्य अकेले अफ्रीकी देशों से संबंधित है ।अफ्रीकी देशों का एक गुट ‘सी-10’ किसी अफ्रीकी देश की स्थायी सदस्यता की वकालत कर रहा है। इस गुट का भी कहना है कि अंतरराष्ट्रीय संघर्ष की स्थितियों में सुरक्षा परिषद समुचित भूमिका नहीं निभा पाता है। महाशक्तियों में मतभेद की स्थिति में वीटो भी अपनी प्रासंगिकता खोता जा रहा है।

जहां तक वीटो की बात है तो इस पर समय-समय पर इसके औचित्य पर सवाल उठाए जाते रहे है ।पिछले कुछ वर्षों में वीटो के इस अधिकार का सदस्य देशों ने दुरुपयोग भी किया है, जिसके कारण कई महत्त्वपूर्ण प्रश्न अनसुलझे रह गए या उन पर त्वरित निर्णय नहीं किया जा सका।  इसलिए इस वीटो अधिकार को अत्याचार , अन्याय और विश्व की जनता की स्वतंत्रता पर आक्रमण की संज्ञा दी गयी है । जब सब स्वतंत्र और सर्वसम्प्रभुता सम्पन्न राष्ट्र राजनीतिक दृष्टि से समान है तो कुछ राष्ट्रों को वीटो के जरिये विशेषाधिकार दे देना व बाकी राष्ट्रों को इससे वंचित रखना न्यायपूर्ण नहीं है।बल्कि  यह नैतिक , कानूनी और व्यवहारिक हर दृष्टिकोण से अनुचित है।

बहरहाल, अब यदि केवल एक ही नए सदस्य को स्थायी सदस्यता दी जाती है तो  भारत की आबादी , क्षेत्रफल , अर्थव्यवस्था व राष्ट्र संघ में इसकी भूमिका को देखते हुए सबसे अच्छा पात्र भारत ही है। प्राचीन संस्कृति और सांस्कृतिक धरोहर वाला देश होने के साथ-साथ भारत आत्मनिर्भर और अपनी एकता, अखंडता, सार्वभौमिकता की रक्षा करने में सक्षम देश है।
भारत ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर गुट निरपेक्षता , शांतिपूर्ण सहअस्तित्व की भावना का समर्थन तथा रंगभेद , नस्लवाद , उपनिवेशवाद एवं साम्राज्यवाद का प्रारंभ से ही विरोध किया है।
आज जहां संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद का काम दुनिया भर में शांति और सुरक्षा कायम करना है वहीं भारत भी शांति का हमेशा से पक्षधर रहा है तथा संयुक्त राष्ट्र शांति मिशन के सैनिकों में भारत का तीसरा सबसे बड़ा योगदान है। भारत अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जलवायु परिवर्तन के मुद्दे व इस हेतु आवश्यक कदमों के पुरजोर समर्थन करता है तथा आतंकवाद के खिलाफ आवाज़ उठाता रहा है।
इसके अलावा सुरक्षा परिषद में सुधार और उसमें भारत की स्थायी सदस्यता की दावेदारी का अमेरिका , ब्रिटेन और फ्रांस सहित कई सदस्य देशों ने समर्थन किया। इन देशों ने जोर दिया कि विश्व संस्था की शीर्ष इकाई को निश्चित तौर पर ऐसा होना चाहिए कि जो नई वैश्विक शक्तियों का प्रतिनिधित्व करे।   लेकिन भारत की सुदृढ़ स्थिति के बावजूद इस बात की संभावना बहुत कम जान पड़ती है कि सुरक्षा परिषद के वर्तमान ढांचे में कोई परिवर्तन होगा  क्योंकि सुरक्षा परिषद की संरचना में किसी भी बदलाव के लिये संयुक्त राष्ट्र के चार्टर में संशोधन की आवश्यकता होगी जिसे संयुक्त राष्ट्र महासभा  की सदस्यता के दो-तिहाई बहुमत से हस्ताक्षरित और समर्थन प्रदान करना होगा तथा इसके लिये वर्तमान पाँचों स्थायी सदस्यों की सहमति की आवश्यकता होगी जिसकी राजनीतिक राह सरल नहीं है क्योंकि इनमें से किसी एक का भी वीटो बाकी चार के बहुमत को अप्रभावी कर देता है जबकि चीन भारत की राह में सबसे बड़ा रोड़ा है। जैसे जैश-ए-मोहम्मद के सरगना मसूद अजहर पर पाबंदी लगाने का मामला सिर्फ चीन के वीटो की वजह से सिरे नहीं चढ़ पा रहा था। इसलिए अगर सुरक्षा परिषद का विस्तार होता है तो इसके फैसले ज्यादा तर्कसंगत हो सकेंगे।
विदित है कि 1955 में अमेरिका ने चीन की जगह भारत को सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता देने का प्रस्ताव रखा था लेकिन पंडित नेहरू ने इस ऐतिहासिक प्रस्ताव को ठुकरा दिया था तथा चीन को स्थान देने का समर्थन किया था।
इसके अलावा जहां स्थायी सदस्यता के मसले पर द्विपक्षीय वार्ताओं में तो रूस भारत की उम्मीदवारी का समर्थन करता है, लेकिन बहुपक्षीय स्तर पर विस्तार की प्रक्रिया का विरोध करता है। यह भारत के लिए बड़ा अवरोध है।
यह बात भी विचारणीय है कि पिछले साठ वर्षों में संयुक्त राष्ट्र के घोषणापत्र में कोई संशोधन नहीं हुआ है।  ऐसे में भारत के लिए स्थायी सदस्यता की राह असान नहीं लगती।
इसके अतिरिक्त जी-4 (भारत, ब्राज़ील, जर्मनी, जापान) सदस्यों के बीच सुधार के एजेंडे के संदर्भ में मतभेद है तथा उनके क्षेत्रीय प्रतिद्वंद्वी व कॉफी क्लब जैसे संगठन भी जी-4 के स्थायी सदस्य बनने के विरोध में है तथा अफ्रीकी देशों में से किसे स्थायी सदस्यता मिलनी चाहिए , यह भी साफ नहीं है।
हालांकि कुछ देश भारत के स्थायी सदस्यता के दावे के तो समर्थन करते है लेकिन वीटो पॉवर न देने की बात करते है। इस अवस्था में यह केवल एक नख दन्त विहीन पद होगा जिसका कोई औचित्य नहीं है। हालांकि भारत ने साफ कर दिया है कि वह वीटो के बगैर स्थायी सदस्यता स्वीकार नहीं करेगा ।

आज भारत दुनिया के टॉप दस औद्योगिक देशों की श्रेणी में आता है और विश्व की 7 सबसे बड़ी आर्थिक शक्तियों में से एक है। भरपूर सैन्य क्षमता और परमाणु शक्ति सम्पन्न देश होने के बावजूद इसे स्थायी सदस्यता न मिलना अनुचित है।
इसलिए नई विश्व व्यवस्था में यह जरूरी है कि राष्ट्र संघ की व्यवस्था और प्रणाली में सुधार किया जाए और इसे लोकतांत्रिक स्वरूप प्रदान किया जाए ।भारत और जर्मनी, ब्राजील तथा जापान जैसे देशों को समसामयिक वास्तविकताओं को बेहतर ढंग से प्रतिबिंबित करने के लिए  संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यों के तौर पर शामिल करने की ‘‘नितांत आवश्यकता’’ है।
हालांकि जापान को सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता मिलने की बात इस कारण भी नहीं सोची जा सकती कि चीन यह कभी पसंद नहीं करेगा। जर्मनी को इतने अधिक देशों के मत मिल ही नहीं सकते कि वह सुरक्षा परिषद का स्थायी सदस्य बन सके। ब्राजील का भी कई दक्षिण अमेरिकी देश  समर्थन नहीं करेंगे। ऐसी स्थिति में स्थायी सदस्यता के लिए सबसे प्रबल दावेदार भारत ही बचता है। अतः भारत को इसके लिए पुरजोर प्रयास करने होंगे ।

लेखक – नरेन्द्र   
काशी हिन्दू विश्वविद्यालय वाराणसी
Address – Village – patau khurd , Teh- Pachpadra , Distt. Barmer , ( Raj)
Mobile – +91 8090845640

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

%d bloggers like this: