हरियाणा पंचायत चुनाव : अनाप शनाप खर्चे व उनकी पूर्ति करने के लिए डगर आसान नहीं ! 

हरियाणा पंचायत चुनाव : अनाप शनाप खर्चे व उनकी पूर्ति करने के लिए डगर आसान नहीं !
चुनाव के बाद उम्मीदवार की ईमानदारी को चुनौती देते हैं अनावश्यक चुनावी खर्चे
कैथल, 07 जुलाई (कृष्ण प्रजापति): हरियाणा में ग्राम-पंचायत के चुनाव नजदीक हैं और ग्रामीण आपसी चर्चाओं में एक आदर्श और
समझदार सरपंच व पंचायत के चुनाव की ख्वाहिश हर चुनाव से पहले करते हैं। वर्तमान समय में भी सोशल मीडिया पर व आपसी
चर्चाओं में हर कोई पिछली पंचायत की रही कमियों को देखते हुए एक अच्छी पंचायत व सरपंच में क्या गुण-गुर होने चाहिए, इसको
लेकर अपने अपने विचार व सुझाव सांझा कर रहे हैं। लेकिन ज्यों-ज्यों चुनाव नजदीक आता है और अपने चरम पर होता है, हार-जीत
अपना-पराया आर्थिक खर्चों व किन्हीं सामाजिक दबाव  मे ज्यादातर मतदाता अपना मत निर्धारित कर लेते हैं।
इस बारे में जानकारी देते
हुए गांव पाई निवासी वीरेंद्र ढुल पंचायत सदस्य ने बताया कि मैं भी वर्तमान पंचायत का सदस्य हूँ और पंचायत चुनाव से लेकर पंचायत
कार्यों तक को नजदीक से समझने की कोशिश की है। हम सभी हमारे द्वारा चुने हुए प्रतिनिधियों को ही व्यवस्था और विकास के लिए
जिम्मेदार समझते हैं लेकिन जितनी जिम्मेदारी निर्वाचित लोगों की है उससे ज्यादा जिम्मेदारी आम जनता की है कि वे चुनाव के समय
अपने उम्मीदवारों के चयन के समय उस सोच को ध्यान में रखें जो सार्वजनिक विकास और व्यवस्था के लिए सामान्य समय में बातें करते
हैं। लेकिन यह भी सत्य है कि चुनाव के समय ज्यादातर मतदाता सार्वजनिक से व्यक्तिगत हो जाते हैं।
सार्वजनिक सोच से व्यक्तिगत सोच की ओर मतदाताओं के आकर्षण के अनेक कारण हैं। मुख्यतः चुनाव के अंतिम दिनों में जो प्रतिनिधि
मतदाताओं के समक्ष रहते हैं, उन्हें देखते हुए ही मतदाता अपना मत निर्धारित करते हैं। हां अगर किसी उम्मीदवार का सार्वजनिक जीवन
पुर्व में सार्वजनिक विकास कार्यों और सामाजिक मेल-मिलाप व रचनात्मक कार्य से जुड़ा रहा है तो वह मतदाताओं के अंतर्मन को
प्रभावित करता ही है। अमूमन मतदाता को सबसे ज्यादा उम्मीदवार की पारिवारिक नजदीकी प्रभावित करती है, व उम्मीदवार जिस
परिवार समुदाय विशेष से जुड़ा है उसके प्रतिष्ठित चेहरे उसके साथ हैं तो भी आमजन प्रभावित होता है और कहीं ना कहीं दबाव की
प्रक्रिया भी मतदाता पर इसी परिप्रेक्ष में बनाई जाती है। यह मतदाताओं को प्रभावित करने व उम्मीदवार की चुनौती को मजबूत करने का
ग्रामीण क्षेत्र में बड़ा व पहला तरीका है। इसके पश्चात वर्तमान स्थितियों में आर्थिक खर्चों से मतदाताओं को लुभाने की कोशिश भी
ज्यादातर उम्मीदवार करते हैं। ज्यों ही चुनाव नजदीक आते हैं तो उम्मीदवार अपने पक्ष को मजबूत दिखाने के लिए मतदाताओं के खाने
पीने की व्यवस्था सुरु हो जाती है। इस व्यवस्था पर इतना भारी खर्च होता है जो ना तो उम्मीदवार अपने चुनावी खर्चों में दर्शाता है और ना
ही इन खर्चों की चुनाव आयोग द्वारा अनुमति होती है। यही खर्च हैं जो चुनाव के बाद उम्मीदवार की इमानदारी को चुनौती देते हैं और
विकास कार्यों की गुणवत्ता में कमी और भ्रष्टाचार की जड़ है, जिसे मतदाता जानबूझकर भूल जाता है व चुनावी प्रक्रिया का जरूरी हिस्सा
समझकर उम्मीदवार के खर्चों में सम्मिलित हो जाता है और चुनाव के बाद जब विकास कार्यों की गुणवत्ता पर प्रश्न उठाता है तो उसे यही
सहज सा जवाब मिलता है कि चुनावी खर्च भी पूरे करने हैं। वीरेंद्र ढुल ने बताया कि चुनाव में कुछ मतदाताओं पर बड़ा अनचाहा दबाव
भी बनाया जाता है। यह अनचाहा दबाव पारिवारिक, व्यक्तिगत कार्यों को पूरा करने का प्रलोभन, सरकारी कार्यालयों में कार्य निकलवाने
का लालच, पिछले समय में सामाजिक पंचायत या अन्य सहयोग में अहसानों का दबाव आदी बहुत से प्रभाव हैं जो मतदाता मत किसी
ओर को देना चाहता है और दबाव बढ़ने से देना किसी दुसरे को पड़ता है।
मतदाता मतदान के दिन भी माहौल देखकर या बूथ पर ऐजेंट के प्रभाव में आकर अपने मतदान को सही नहीं दे पाता।
पंचायत चुनाव में मतदाता उलझन में उम्मीदवारों को लेकर भी रहता है। मतदाता सामान्य समय में अपने गाँव के लिए जिस आदर्श
सरपंच की कल्पना करता है, जब उम्मीदवारों की श्रेणी में ऐसा कोई चेहरा नहीं मिलता है तो भी मतदाता उपर वर्णित किसी ना किसी
कारण से इस चुनावी प्रक्रिया में बह जाता है।
सामान्यतः हमें देखना चाहिए कि जिस उम्मीदवार का हम गाँव के सरपंच या पंचायत सदस्य के लिए चुनाव करें वह सबसे पहले इतना
सक्षम हो कि वह परिवार की परेशानियों में ना उलझा रहे, उसका पुरा समय गाँव के विकास और समस्याओं से जुड़ा रहे।
उम्मीदवार की सोच गाँव की शिक्षा व्यवस्था, स्वास्थ्य जरूरतों, खेलों का अभ्यास व सैन्य भर्तियों के लिए उचित व्यवस्था, आदि में उसकी
पुर्व मे कैसी रूचि रही है और गाँव की सार्वजनिक जरूरतों और विकास कार्यों में आम नागरिक के रहते उसका क्या सहयोग रहा है।
अगर हम लोग अपने मत का प्रयोग बिना किसी दबाव के और चुनाव के एक दिन अपनी अंतरात्मा की आवाज सुनकर वोट करेंगे तभी
हमारे गाँव व समाज का विकास हो सकता है। पंच वीरेंद्र सिंह ने बताया कि मैने भगत सिंह के शहीदी दिवस पर प्रण लिया था कि मैं
अपने जीवन में अपने मत का प्रयोग बिना किसी दबाव के फिजूल खर्चि ना करने वाले व गाँव के विकास के लिए अपने चुनाव में संकल्प
पत्र लेकर आएगा उसे ही मतदान करूँगा वरना मेरा वोट नोटा पर जाएगा। अगर हम अपने शहीदों के सपनों का समाज और विकास
चाहते हैं तो हमारा दायित्व है कि हम सब ईमानदारी से मतदान करें।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Our COVID-19 India Official Data
Translate »
error: Content is protected !! Contact ATAL HIND for more Info.
%d bloggers like this: