हरियाणा सरकार में तूफ़ान से पहले की शांति , 5 निर्दलीय विधायकों में “नाराजगी” और “छटपटाहट”

हरियाणा सरकार में तूफ़ान से पहले की शांति , 5 निर्दलीय विधायकों में “नाराजगी” और “छटपटाहट”

-राजकुमार अग्रवाल
चंडीगढ़। 3 दिन बाद प्रदेश की गठबंधन सरकार को 5 महीने पूरे होने जा रहे हैं। 147 दिन पहले सरकार के गठन के लिए समर्थन देने वालों में निर्दलीय विधायक सबसे आगे थे।सभी सातों निर्दलीय विधायकों और हलोपा सुप्रीमो गोपाल कांडा ने बीजेपी की सरकार बनाने के लिए अपना समर्थन फटाफट दे दिया था।भाजपा के पास बहुमत नहीं होने के कारण निर्दलीय विधायकों को यह लगा कि उनके बलबूते पर बनने वाली सरकार में उनकी “तूती” बोलेगी और सभी को सरकार में “मलाईदार” एडजेस्टमेंट मिलेगी लेकिन चंद घंटों बाद ही जेजेपी के गठबंधन सरकार में शामिल होने के ऐलान होते ही निर्दलीय विधायकों के खुशी “काफूर” हो गई और उनका महत्व भी एकदम कम हो गया।जेजेपी के भरोसे सरकार नहीं छोड़ने की नीति के तहत 5 निर्दलीय विधायकों को मंत्री व चेयरमैन बनाया गया।

 

लेकिन 5 महीने में ही सात में से दो विधायक सरकार से दूर हो चुके हैं और 3 निर्दलीय विधायकों में छटपटाहट शुरू हो गई है और सरकार के साथ उनका लगाव कम हो गया है।बिजली बिजली मंत्री रणजीत सिंह और पृथला के विधायक नयन पाल रावत पूरी तरह से संतुष्ट हैं और सरकार का भरपूर गुणगान कर रहे हैं लेकिन 5 विधायकों बलराज कुंडू, राकेश दौलताबाद, धर्मपाल गोंदर, रणधीर गोलन और सोमवीर सांगवान ज्यादा या थोड़े सरकार से दूर हो चले हैं।

 

इतने कम समय में 5 विधायकों का सरकार से मोहभंग होना बड़े सियासी मायने रखता है। निर्दलीय विधायकों में सरकार के प्रति खटास पैदा होने के अलग-अलग कारण है।हरियाणा की गठबंधन सरकार में आये दिन कोई ना कोई मसला बना रहता है। दबंग अनिल विज से तो सभी भाजपाई खौफ खाते है इसलिए समय समय पर खुद सीएम मनोहर लाल को भी उनके सामने झुकना पड़ता है क्योंकि हरियाणा भाजपा में अनिल विज अकेली ऐसी शख्सियत है जिसके दम पर भाजपा है यानी अनिल विज को अम्बाला की जनता का व्यक्तिगत समर्थन है ना की भाजपा के कारण अनिल विज है।

 

 

इसलिए कई बार मुख्यमंत्री मनोहर लाल ने अनिल विज के पंख कुतरने की कोशिश की लेकिन कामयाब नहीं हो पाए वैसे भी मनोहर लाल समझ गए की अगर उन्हें हरियाणा की सत्ता पर काबिज  बने रहना है तो अनिल विज से बैर मोल लेना महंगा पड़ सकता है। शायद मनोहर लाल यह भी समझ गए होंगे की उनका हरियाणा का मुख्यमंत्री बनना बिल्ली के भाग्य छींका टूटने जैसा है इसलिए पानी में रह कर मग्गरमच्छ  से पंगा नहीं लेना चाहिए और चुप चाप सीएम की कुर्सी पर बैठे रहना ही उनके लिए बेहतर होगा तभी तो मनोहर लाल ने अनिल विज शांत किया हुआ है लेकिन इसके बावजूद हरियाणा सरकार में सब कुछ ठीक नहीं चल रहा वर्तमान को देखते हुए लग रहा है की हरियाणा सरकार में अभी जो शांति है वह तूफ़ान आने का सकेंत तो नहीं। अगर ऐसा हुआ तो यह मनोहर लाल के राजनीतिक जीवन का आखिरी सफर होगा।

बलराज कुंडू
बन गए धुर विरोधी

महम के निर्दलीय विधायक बलराज कुंडू इस समय निर्दलीय विधायकों में सबसे अधिक मुखर हो गए हैं। वे हर मोर्चे पर सरकार की खिलाफत कर रहे हैं और भ्रष्टाचार को लेकर जनता के बीच उतर गए हैं।
पूर्व मंत्री मनीष ग्रोवर के साथ 36 के आंकड़े के चलते बलराज कुंडू सरकार के भी धुर विरोधी हो गए हैं।

राकेश दौलताबाद
कर दिए साइड लाइन

बादशाहपुर के विधायक राकेश दौलताबाद बलराज कुंडू के बाद दूसरे इकलौते ऐसे निर्दलीय विधायक हैं जिन्हें सरकार में एडजस्ट नहीं किया गया। सत्ता खेमे के असरदार पूर्व मंत्री नरवीर सिंह के हलके से विधायक बनने के कारण राकेश दौलताबाद को “खास” मकसद के साथ खूड्डेलाइन किया गया है। राकेश दौलताबाद का भी सरकार से पूरी तरह मोहभंग हो चुका है

सोमवीर सांगवान
नहीं आ रहा मजा

हरियाणा पशुधन विकास बोर्ड के चेयरमैन बनाए गए दादरी के निर्दलीय विधायक सोमवीर सांगवान को सरकार में मजा नहीं आ रहा है। सांगवान के समर्थकों का कहना है कि उनके नेता को सिर्फ चेयरमैन तक सीमित रख दिया गया है।
शासन और प्रशासन में उनकी नहीं चल रही है जिसके चलते वर्करों के कामकाज नहीं हो पा रहे हैं। अधिकारियों द्वारा अनदेखा किए जाने के कारण ही सोमवीर सांगवान को सरकार में मजा नहीं आ रहा है। राज्यसभा चुनाव में वोटिंग होने पर दीपेंद्र हुड्डा के पक्ष में वोट डालने वालों की संभावित सूची में सोमवीर सांगवान का नाम भी लिया जा रहा था।

रणधीर सिंह गोलन
ठंडा पड़ रहा जोश

हरियाणा पर्यटन निगम के चेयरमैन बनाए गए पुंडरी के विधायक रणधीर सिंह गोलन का जोश 5 महीने में ही ठंडा पड़ गया है। गोलन अपने हलके में जोरदार विकास कार्य कराकर अपना मजबूत जनाधार बनाने की हसरत रखते हैं लेकिन उनके हलके में एडवोकेट वेदपाल की ज्यादा “पावर” होने के कारण गोलन को परेशानी हो रही है। अफसरशाही गोलन की बजाय एडवोकेट वेदपाल के कामों को प्राथमिकता देती है। इस अनदेखी के कारण ही रणधीर गोलन का जोश ठंडा पड़ रहा है। राज्यसभा के चुनाव में रणधीर गोलन के क्रॉस वोटिंग करने की प्रबल संभावना नजर आ रही थी

धर्मपाल गोंदर
मायूस हो रहे समर्थक

हरियाणा वन विकास निगम के चैयरमैन बनाए गए नीलोखेड़ी के विधायक धर्मपाल गोंदर के समर्थक 5 महीने में ही मायूस हो गए हैं। उनके समर्थकों का कहना है कि उनके नेता को उस विभाग का चेयरमैन बनाया गया है जहां करने के लिए कुछ भी नहीं है। धर्मपाल गोंदर सरकार में इससे बेहतर एडजेस्टमेंट की उम्मीद करते थे लेकिन कम महत्व की चेयरमैनी मिलने के कारण उनके खेमे में निराशा का माहौल है। अफसरशाही के रवैये को लेकर भी गोंदर में नाराजगी है। इसी नाराजगी के चलते राज्यसभा के चुनाव में दीपेंद्र हुड्डा को वोट देने वालों की सूची में उनका नाम भी गिना जा रहा था।

गोपाल कांडा
मजबूरी का समर्थन

हलोपा मुखिया व सिरसा के विधायक गोपाल कांडा ने भाजपा को सबसे पहले समर्थन दिया था लेकिन मंत्री बनने से पहले ही उनके समर्थन पर बवाल मचने के कारण भाजपा ने उनसे तुरंत पल्ला झाड़ लिया था। व्यवसायिक मजबूरियों के चलते गोपाल कांडा गठबंधन सरकार को मजबूरी में ही समर्थन दे रहे हैं।

 

जेजेपी का समर्थन मिलने के बाद बीजेपी ने रणजीत सिंह के अलावा बाकी निर्दलीय विधायकों को सरकार में बड़ी हिस्सेदारी देने की बजाय सिर्फ एडजस्ट करने का ही काम किया है। नयनपाल रावत इसलिए खुश है कि उनको मिली चेयरमैनी ए क्लास की मानी जाती है।रणजीत सिंह और राकेश दौलताबाद के अलावा बाकी पांचों निर्दलीय विधायक भाजपा के ही बागी नेता थे। निर्दलीय चुनाव जीतने के बाद इन नेताओं की भाजपा के साथ स्वाभाविक जुड़ाव होना चाहिए था लेकिन सरकार में एडजस्ट करने के बावजूद पांच निर्दलीय विधायकों को खुद की अनदेखी का आभास हो रहा है।

 

बलराज कुंडू और राकेश दौलताबाद तो पूरी तरह से सरकार से अलग हो चुके हैं। बाकी तीन विधायकों को भी सरकार का हिस्सा होने के बावजूद मजा नहीं आ रहा है।जेजेपी के समर्थन के चलते भाजपा सरकार को बेशक कोई खतरा नहीं है लेकिन इतने कम समय में पांच निर्दलीय विधायकों का मोहभंग होना सरकार के लिए शुभ संकेत नहीं है।जनता में सकारात्मक संदेश देने के लिए चेयरमैन बनाए गए सभी निर्दलीय विधायकों का संतुष्ट होना भी बेहद जरूरी है और मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर को इस बारे में ध्यान देना चाहिए क्योंकि सरकार के हिस्सेदार विधायक ही अगर सरकार के पक्ष में नहीं बोलेंगे तो उसका खराब सियासी संदेश जाएगा।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *