10 विधानसभा की जनता को जेजेपी वालों ने सत्ता के लालच में बेच दिया, कहीं यह  दुष्यंत चौटाला का सियासी खात्मा तो नहीं 

दुष्यंत ने हालात का लगाया सही हिसाब

10 विधानसभा की जनता को जेजेपी वालों ने सत्ता के लालच में बेच दिया, कहीं यह  दुष्यंत चौटाला का सियासी खात्मा तो नहीं

सरकार में शामिल नहीं होते तो हो जाते हजकां की तरह शिकार

=राजकुमार अग्रवाल =
चंडीगढ़। जेजेपी मुखिया दुष्यंत चौटाला ने भाजपा के साथ सरकार में साझेदारी करके यह साबित कर दिया है कि वह मुकद्दर के सिकंदर नहीं है बल्कि वह संघर्ष की जंग में जीतने वाले सिकंदर हैं।
दुष्यंत चौटाला ने पहले ही यह ऐलान कर दिया था कि सत्ता की चाबी उनके पास है उनकी कहीं बात सही साबित हुई और भाजपा सत्ता का ताला जेजेपी की चाबी के साथ ही खोलने में सफल हो पाई।लेकिन 10 विधानसभा की जनता को जेजेपी वालों ने सत्ता के लालच में बेच दिया, कहीं यह  दुष्यंत चौटाला का सियासी खात्मा तो नहीं
11 महीने पहले जननायक जनता पार्टी बनाने वाले दुष्यंत चौटाला ने तमाम विपरीत हालात का सामना करते हुए न केवल खुद को जन नायक चौधरी देवी लाल का असली सियासी वारिस साबित कर दिया बल्कि साथ ही प्रदेश की सियासत के सबसे चमकदार सितारे के रूप में स्थापित कर लिया।
जेजेपी को बेशक सीटों पर जीत हासिल हुई है लेकिन दुष्यंत चौटाला ने अपनी मेहनत और सूझबूझ से जेजेपी को पूरे देश में चर्चा का केंद्र बना दिया।
उनको इनेलो से बेदखल करने वाले अभय चौटाला जहां सिर्फ अपनी सीट पर ही सिमट कर रह गए वहीं दूसरी तरफ सत्ता का सरताज बनने के भूपेंद्र हुड्डा के अरमानों पर भी पानी फिर गया।
भाजपा के साथ मिलकर सरकार बनाने के दुष्यंत चौटाला के फैसले का काफी लोग विरोध भी कर रहे हैं और अनाप-शनाप बातें कह रहे हैं। दुष्यंत चौटाला पर फिजुल आरोप लगाने वाले लोग प्रदेश के सियासी हालात की असलियत को नहीं समझते हैं और वे गलतफहमी का शिकार होकर अनर्गल प्रचार कर रहे हैं।
दुष्यंत चौटाला ने बीजेपी के साथ सरकार बनाकर सही फैसला किया है।
दुष्यंत चौटाला और जेजेपी के पास तीन विकल्प थे …

एक -कांग्रेस के साथ जाएं
दूसरा- बीजेपी के साथ जाएं
तीसरा- विपक्ष में रहें…

कांग्रेस के साथ जाकर करते सियासी सुसाइड

दुष्यंत चौटाला के पास पहला विकल्प कांग्रेस के साथ मिलकर सरकार बनाना था। कांग्रेस और जेजेपी के विधायक मिलकर 41 बनते थे। सरकार बनाने के लिए पांच और विधायकों की जरूरत थी। सभी सात निर्दलीय विधायकों के भाजपा के पाले में जाने के चलते कांग्रेसी् और जेजेपी के पास सरकार बनाने का बहुमत नहीं था जिसके चलते पहला विकल्प पूरा नहीं हो रहा था।
इसके अलावा कांग्रेस में भूपेंद्र हुड्डा दुष्यंत को CM बनाने के लिए तैयार नहीं थे। अगर दुष्यंत भूपेंद्र हुड्डा को सीएम बनाने के लिए राजी हो जाते तो वह उनका सियासी सुसाइड होता क्योंकि सरकार की कमान मिलते ही भूपेंद्र हुड्डा जाट वोटरों में पूरी तरह से मजबूत हो जाते और दुष्यंत चौटाला का सियासी खात्मा हो जाता। कांग्रेस के साथ सरकार में सांझेदारी का मतलब खुद के हाथों बीजेपी के विकल्प के रूप में हुड्डा साहब को मजबूत करना होता जिसका आगामी चुनाव में हुड्डा को फायदा होता और दुष्यंत के सियासी सफर का अंत हो जाता।

भाजपा के साथ गठबंधन समझदारी

बीजेपी के साथ मिलकर सरकार बनाने से दुष्यंत चौटाला का काफी समर्थकों ने विरोध किया है। ऐसे लोगों का कहना है कि उन्हें जनादेश बीजेपी के खिलाफ का मिला है, इसलिए उन्हें बीजेपी से दूरी बनाए रखनी चाहिए थी। दुष्यंत चौटाला कुछ लोगों की नाराजगी पर ध्यान देने के बजाय ज्यादा लोगों की उस सोच का ज्यादा ख्याल रख रहे हैं जिनका यह मानना है कि 14 साल से सत्ता से दूर होने के कारण पार्टी का सत्ता में शामिल होना बेहद जरूरी है।
सत्ता का साझीदार बनने के बाद जहां पार्टी से जुड़े काफी लोगों को सत्ता में हिस्सेदारी मिलेगी वहीं पार्टी से जुड़े वर्करों को भी सरकार का हिस्सा बनने पर फायदा होगा। सियासी तौर पर भाजपा के साथ मिलकर सरकार बनाने से भविष्य की राजनीति में भी बेहतरी के अवसर रहेंगे। उन्होंने हालात का सही आकलन करते हुए भाजपा के साथ मिलकर सरकार बनाना बेहतर समझा।

विपक्ष में बैठने पर होते तोड़फोड़ के शिकार

दुष्यंत चौटाला के सामने तीसरा विकल्प विपक्ष में बैठने का था लेकिन ऐसा करने पर उनके साथ हजकां पार्ट – 2 दोहराए जाने का पूरा अंदेशा था। भाजपा हर हाल में स्थाई सरकार बनाए रखने का प्रबंध करती और ऐसा करने के लिए वह जेजेपी के विधायकों का पालाबदल भी जरूर कराते।
कर्नाटक में भाजपा ने कांग्रेस की सरकार गिराने के लिए मंत्रियों के भी इस्तीफे करवा दिए। यही नजारा हरियाणा में भी दोहराया जाना था। दलबदल हो जाने पर दुष्यंत चौटाला भी कुलदीप बिश्नोई की तरह अकेले रह जाते और इससे उनको बड़ा सियासी नुकसान होता।

बात यह है कि दुष्यंत चौटाला अपने बलबूते की सरकार बनाने का ख्वाब देख रहे थे। निर्दलीय विधायकों के फटाफट भाजपा के पाले में चले जाने के कारण उनके लिए कांग्रेस के साथ मिलकर सरकार बना पाना संभव नहीं था और भूपेंद्र हुड्डा को सीएम बनवाकर वह आत्मघाती गलती कर जाते।
बीजेपी के साथ मिलकर सरकार नहीं बनाने पर मौके पे चौका लगाने आए जो नेता जेजेपी की टिकट पर विधायक बने हैं वो राज के हिस्सेदार बनने के चक्कर मे पाला बदल सकते थे। विधायकों के पालाबदल कर जाने के बाद दुष्यंत चौटाला के लिए जेजेपी को मजबूत विकल्प बनाना बेहद कठिन हो जाता।
भाजपा के साथ राज में हिस्सेदारी करके दुष्यंत चौटाला ने पूरी तरह समझदारी का फैसला लिया है।इस फैसले के चलते विधायकों के दल बदल करने का खतरा खत्म हो गया है और राज में हिस्सेदारी करके दुष्यंत चौटाला बेहतरीन काम के बलबूते पर जनता का विश्वास हासिल कर सकते हैं।
दुष्यंत चौटाला सांसद की तरह उप मुख्यमंत्री के तौर पर सबसे बेहतरीन काम करके जनता की पहली पसंद बन सकते हैं। दुष्यंत चौटाला ने बीजेपी के साथ सरकार बनाकर अपने तमाम विरोधियों का हिसाब बिगाड़ाने का काम किया है।
बीजेपी के साथ जाना उनके सामने अंतिम ऑप्शन था‌। इस ऑप्शन की जरूरत इनके साथ बीजेपी को भी इतनी ही थी।जेजेपी के बगैर सरकार बनाने पर बीजेपी को सभी 8 निर्दलीय विधायकों को मंत्री बनाना पड़ता। अगर वह सभी आधे निर्दलीय विधायकों को मंत्री बनाती तो उनके नाराज होकर तख्तापलट करने का खतरा हमेशा मौजूद रहता।
निर्दलीय विधायकों की मनमानी और ब्लैक मेलिंग के चलते भाजपा सरकार के 6 महीने में ही फेल और बदनाम होने के आसार नजर आ रहे थे। निर्दलीय विधायकों की मनमानी रोकने और स्थाई सरकार के लिए जेजेपी वास्तव में भाजपा की नई सरकार में सत्ता की चाबी साबित हुई है…

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