12 लंबित सीटों पर  चयन चुनौती से कम नहीं ,जाट समुदाय के उम्मीदवारों को दिल खोलकर टिकट

विपुल गोयल और राव नरबीर सिंह का टिकट तो कटा ,जाट समुदाय के उम्मीदवारों को दिल खोलकर टिकट ,लेकिन 12 लंबित सीटों पर  चयन चुनौती से कम नहीं
कैथल (राजकुमार अग्रवाल )। भाजपा की 78 प्रत्याशियों की सूची से राज्य के दो हैवीवेट मंत्रियों विपुल गोयल और राव नरबीर सिंह का टिकट काट दिया गया। इस कदम ने सबको चौंका दिया और हरियाणा की राजनीति में हलचल मच गई। दरअसल उन पर राजनीति के दो धुरंधर खिलाडियों का दांव भारी पड़ गया। केंद्रीय राज्य मंत्री राव इंद्रजीत और कृष्णपाल गुर्जर भले ही अपने परिवार के सदस्यों को टिकट दिलाने में कामयाब नहीं हुए, लेकिन उन्होंने अपने बड़े राजनीतिक विरोधियों को चारों खाने चित्त कर दिया है। फरीदाबाद संसदीय क्षेत्र में विपुल गोयल, केंद्रीय मंत्री कृष्णपाल गुर्जर और गुरुग्राम संसदीय क्षेत्र में राव नरबीर, केंद्रीय मंत्री राव इंद्रजीत के लिए अक्सर राजनीतिक परेशानियां खड़े करते रहे हैं। बता दें कि राव और गुर्जर दोनों का ही अपने क्षेत्रों में मनोहर सरकार के मंत्रियों राव नरबीर सिंह और विपुल गोयल से 36 का आंकड़ा रहा है। मोदी का जब संगठन के पदाधिकारियों को यह निर्देश गया कि संबंधित क्षेत्र के सांसदों की राय पर ही विधानसभा क्षेत्रों के टिकट वितरित किए जाएं तो राव इंद्रजीत सिंह ने सबसे पहले अपने प्रतिद्वंद्वी राव नरबीर सिंह और कृष्णपाल गुर्जर ने विपुल गोयल के टिकट पर कैंची चलवा दी। नाराज राव इंद्रजीत को जब स्वदेश लौटने पर भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मिलने का समय नहीं मिला तो वह हिमाचल प्रदेश के कसौली में जाकर बैठ गए। संगठन महामंत्री बीएल संतोष सहित चुनाव प्रभारी व केंद्रीय मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर कसौली में ही उनके संपर्क में रहे और मुख्यमंत्री मनोहर लाल ने कृष्णपाल गुर्जर को मनाने की जिम्मेदारी संभाली। गुर्जर और राव को जब संगठन की तरफ से यह आश्वासन मिल गया कि उनके दोनों प्रतिद्वंद्वियों के टिकट काट दिए जाएंगे तो उनकी नाराजगी दूर हुई। गुर्जर व राव का दांव अपने परिवार के सदस्यों की टिकट के लिए तो नहीं चल पाया, लेकिन दोनों मंत्री अपने विरोधियों के टिकट कटवाने के लिए भाजपा हाईकमान को मनाने में कामयाब हो गए। उनके समर्थक इसे बड़ी जीत मान रहे हैं। गुर्जर हालांकि अब अपने बेटे देवेंद्र गुर्जर के लिए तिगांव से टिकट नहीं मांग रहे हैं, लेकिन राव इंद्रजीत ने अभी बेटी आरती राव के लिए आस नहीं छोड़ी है।

सीएम की खूब चली
टिकटों में सीएम मनोहर लाल की खूब चली है। केंद्रीय नेतृत्व ने उन्हें पूरी तव्वजो दी है। जहां भी मामला अटका, वहां सीएम के कहे अनुसार निर्णय लिया गया। जीटी बेल्ट पर ज्यादातर सीटें उन्हीं के अनुसार दी गई। एडवोकेट वेदपाल को भी उन्होंने एडजस्ट कराया।

जाट समुदाय के उम्मीदवारों को दिल खोलकर टिकट
इस बार के विधानसभा चुनावों में जिस तरह से जाट समुदाय के उम्मीदवारों को दिल खोलकर टिकट दिए गए हैं, उससे तमाम विपक्षी दल सकते में आ गए हैं। नई रणनीति से भाजपा यह उम्मीद कर रही है कि इस बार के चुनाव में उसे जाट और नॉन जाट, सभी का वोट मिल जाएगा। यही समीकरण भाजपा को 90 में से 75 सीट जीतने के लक्ष्य तक पहुंचा देगा। बता दें कि 2014 या उससे पहले तक हरियाणा में भाजपा को एक अलग ही नजरिए से देखा जाता था। भाजपा तो शहरी क्षेत्रों के लोगों की पार्टी है, इसमें किसान कम और व्यवसाय से जुड़े लोगों की बहुलता है। इसके अलावा भाजपा पर नॉन-जाट वर्ग की पार्टी का टैग भी लग चुका था। प्रदेश में 2016 के आरक्षण आंदोलन के दौरान जो दंगे हुए, उसके बाद एक ऐसी तस्वीर उभर कर सामने आई, जिसने भाजपा को पूरी तरह से गैर जाटों की पार्टी बना दिया।
उस वक्त विपक्षी दलों के बड़े नेताओं की कमी यह रही कि वे खुद को जाट समुदाय के आसपास ही रखकर चलते रहे। चूंकि भाजपा को मालूम था कि गैर जाट वोट अगर उसे मिलते हैं, तो उसकी भारी जीत सुनिश्चित है। वह अंदरखाने सोशल इंजीनियरिंग के इसी फार्मूले पर आगे बढ़ती रही। नतीजा, लोकसभा चुनाव में प्रदेश की सभी दस सीटें भाजपा की झोली में आ गिरीं। मतलब, भाजपा ने जो रणनीति बनाई थी, वह पूरी तरह कामयाब रही। पार्टी ने इस बार जाट समुदाय के 21 से अधिक नेताओं को विधानसभा का टिकट थमा दिया है। अभी दूसरी सूची आनी बाकी है। प्रमुख जाट नेता, जिनका नाम विधानसभा उम्मीदवारों की पहली सूची में शामिल है, उनमें सुभाष बराला, कमलेश ढांडा, महिपाल ढांडा, तीरथ सिंह राणा, परमिंदर ढुल, प्रेमलता, पवन बेनीवाल, संतोष, आदित्य देवी लाल, आशा खेदर, कैप्टन अभिमन्यु, सुरेंद्र पूनिया, जेपी दलाल, बबीता फौगाट, सतीश नांदल, प्रवीण डागर, ओमप्रकाश धनखड़ और विक्रम कादियान आदि शामिल हैं।

12 लंबित सीटों पर  चयन चुनौती से कम नहीं
भाजपा ने जिन 12 विधानसभा सीटें टिकटों के लिए अभी लंबित कर रखी हैं, उनमें रेवाड़ी सीट भी शामिल है। राव इंद्रजीत रेवाड़ी से ही आरती राव के लिए टिकट मांग रहे हैं। यहां से रणधीर कापड़ीवास मौजूदा विधायक हैं, जिनकी गिनती बागी विधायकों में होती है। उनका टिकट कटना तय माना जा रहा है। अगर आरती राव के लिए राव इंद्रजीत ज्यादा अड़े तो राव नरबीर को मोहरे के रूप में इस्तेमाल कर उन्हें कोसली में टिकट दी जा सकती है। हालांकि इसकी संभावना फिलहाल बहुत कम है। भाजपा लंबित सीट नारायणगढ़ पर सांसद नायब सिंह सैनी की पसंद का ख्याल रख सकती है। सैनी यहां से विधायक थे, लेकिन कुरुक्षेत्र से लोकसभा चुनाव जीतकर दिल्ली चले गए। पानीपत शहरी की विधायक रोहिता रेवड़ी की गिनती बागी विधायकों में है। उन्हें जीवन दान मिलेगा या नहीं, इस पर सबकी निगाह है। गन्नौर से सोनीपत के सांसद रमेश कौशिक के भाई टिकट मांग रहे हैं। इस सीट को लंबित रख दिया गया है। कौशिक से गन्नौर व खरखौदा के लिए कोई दूसरा नाम लिया जा सकता है। लंबित 12 सीटों में शामिल फतेहाबाद सीट अब हॉट बन गई है। यहां से इनेलो के विधायक रहे बलवान सिंह दौलतपुरिया को भाजपा ने पार्टी ज्वाइन कराई थी। कुछ दिन बाद पूर्व सीपीएस दूड़ा राम को भी भाजपा में लिया गया। अब यह तय होना बाकी है कि इस सीट पर बलवान दौलतपुरिया को टिकट मिलेगा या दूड़ा राम को। भाजपा ने आदमपुर सीट भी रोक रखी है। दूड़ा राम को आदमपुर में कांग्रेस के कुलदीप बिश्नोई के खिलाफ लड़ाया जा सकता है। दूड़ा राम पूर्व सीएम भजनलाल के परिवार से हैं और रिश्ते में कुलदीप बिश्नोई के भाई लगते हैं। भिवानी के सांसद धर्मबीर तोशाम से बेटे मोहित के लिए टिकट मांग रहे हैं। इसलिए यह सीट भी लंबित है। पलवल में कोई विवाद नहीं है, जबकि महम में यह तय होना बाकी है कि जाट या गैर जाट किसे लड़ाया जाए। भाजपा ने जिन 12 सीटों को लंबित रखा है, उनमें नौ सीटें ऐसी हैं, जहां भाजपा पिछले चुनाव में हार गई थी। इसके अलावा दो सीटें बागी विधायकों की हैं, जहां बदलाव संभव है। भाजपा ने सीएमओ से जुड़े किसी भी दावेदार, जिला परिषद के चेयरमैन अथवा बोर्ड निगम के चेयरमैन को विधानसभा चुनाव का टिकट नहीं दिया है।

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