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क्या राजनीति विपक्ष विहीन हो रही है?,विपक्ष की इतनी निस्तेज, बदतर एवं विलोपपूर्ण स्थिति कभी नहीं रही

यह स्थिति अचानक तो नहीं आयी है? इसकी असली वजह क्या हो सकती है? आखिर विपक्ष इतना कमजोर एवं नकारा कैसे हो गया?

क्या राजनीति विपक्ष विहीन हो रही है?
-ः ललित गर्ग :-

महाराष्ट्र एवं हरियाणा के विधानसभा चुनाव के परिदृश्यों को देखते हुए एक ज्वलंत प्रश्न उभर के सामने आया है कि क्या भारतीय राजनीति विपक्ष विहीन हो गई है? क्या विपक्ष राजनीति ही नहीं, नीति विहीन भी हो गया है? यही कारण है कि आजादी के बाद के राजनीतिक सफर में विपक्ष की इतनी निस्तेज, बदतर एवं विलोपपूर्ण स्थिति कभी नहीं रही। इस तरह का माहौल लोकतंत्र के लिये एक चुनौती एवं विडम्बना है। भले ही सात दशकों में कांग्रेस भारी बहुमत में आया करती थी परन्तु छोटी-छोटी संख्या में आने वाले राजनीतिक दल लगातार सरकार को अपने तर्कों एवं जागरूकता से दबाव में रखते थे, अपनी जीवंत एवं प्रभावी भूमिका से सत्ता पर दबाव बनाते थे, यही लोकतंत्र की जीवंतता का प्रमाण था। लेकिन अब ऐसी स्थिति समाप्त होती जा रही है बल्कि इस कदर बदतर हो चुकी है कि चुनावों से पहले ही स्पष्टता एवं दृढ़ता के साथ भविष्यवाणी की जा सकती है कि सत्ता में फिर से भाजपा ही आयेगी। महाराष्ट्र व हरियाणा में विधानसभा चुनाव परिणामों के बारे में यही कहा जा रहा है। यह स्थिति अचानक तो नहीं आयी है? इसकी असली वजह क्या हो सकती है? आखिर विपक्ष इतना कमजोर एवं नकारा कैसे हो गया?
आज देश में विपक्ष के पास खासकर कांग्रेस या किसी भी दल के पास कोई प्रभावी नेतृत्व नहीं है, जिसकी अगुवाई में बाकी राजनेता या दल एकत्र हो सकें। भाजपा और संघ परिवार पर वार करने लिए कोई धारधार हथियार भी इनके पास नहीं है। सब ये जानते हैं कि भाजपा को अब हरा पाना इनके बूते की बात है। इस तरह की संभावनाओं को तलाशने के लिये विपक्षी दलों को एकजूट होना होगा। अन्यथा अब इन दलों के सामने अपने अस्तित्व का खतरा भी है। गौर करने की बात ये है आखिर विपक्ष में ऐसा कौन है जो इतना सक्षम, समर्थ एवं सर्वस्वीकार्य है जो बाकी नेताओं को एकजुट कर सके या मोदी से टक्कर ने सके।
भारतीय लोकतंत्र में विपक्षी दल अपनी सार्थक भूमिका निर्वाह करने में असफल रहे हैं। क्योंकि दलों के दलदल वाले देश में दर्जनभर से भी ज्यादा विपक्षी दलों के पास कोई ठोस एवं बुनियादी मुद्दा नहीं रहा है, देश को बनाने का संकल्प नहीं है, उनके बीच आपस में ही स्वीकार्य नेतृत्व का अभाव है जो विपक्षी नेतृत्व की विडम्बना एवं विसंगतियों को ही उजागर करता है। ऐसा लग रहा कि विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र भारत में अब नेतृत्व की नैतिकता एवं नीतियों को प्रमुख मुद्दा न बनाने के कारण विपक्षी दल नकारा साबित हो रहे हैं, अपनी पात्रता को खो रहे हैं, यही कारण है कि न वे मोदी को मात दे पा रहे हैं और न ही सार्थक विपक्ष का अहसास करा पा रहे हैं। भाजपा एवं मोदी का कोई ठोस विकल्प पेश करने को लेकर विपक्षी दल गंभीर नहीं हैैं, वे अवसरवादी राजनीति की आधारशिला रखने के साथ ही जनादेश की मनमानी व्याख्या करने, मतदाता को गुमराह करने की तैयारी में ही लगे हंै। इन्हीं स्थितियों से विपक्ष की भूमिका पर सन्देह एवं शंकाओं के बादल मंडराने लगे।
क्या देश के अंदर विपक्ष को खत्म करने की साजिश हो रही है? क्या इसके लिए सत्ता की ताकत का गलत इस्तेमाल किया जा रहा है? ये आरोप निराधार एवं भ्रामक हैं। यह कहना बिल्कुल भी उचित नहीं है कि भारत की राजनीति विपक्ष विहीन हो चुकी है, मनोबल अवश्य टूटा है, अतीत के दाग पीछा कर रहे हैं लेकिन विपक्ष विहीन भारतीय राजनीति की स्थिति जब भी बनेगी, संभवतः लोकतंत्र भी समाप्त हो जायेगा। विपक्ष की कमजोर एवं नकारा स्थिति के लिये भाजपा या मोदी को जिम्मेदार ठहराना भी उचित नहीं है। विपक्ष अपनी इस दुर्दशा के लिये खुद जिम्मेदार है। विपक्ष वैचारिक, राजनीतिक और नीतिगत आधार पर सत्तारूढ़ दल का विकल्प प्रस्तुत करने में नाकाम रहा है। उसने सत्तारूढ़ भाजपा की आलोचना की, पर कोई प्रभावी विकल्प नहीं दिया। किसी और को दोष देने के बजाय उसे अपने अंदर झांककर देखना चाहिए। मुद्दा विहीनता उसके लिए इतनी अहम रही है कि कई बार राष्ट्रीय मुद्दों पर उसने जुबान भी नहीं खोली। लोकतंत्र तभी आदर्श स्थिति में होता है जब मजबूत विपक्ष होता है। क्यों नहीं विपक्ष सीबीआई, आरबीआई जैसे मुद्दों को उठाता, आम आदमी महंगाई, व्यापार की संकटग्रस्त स्थितियां, बेरोजगारी आदि समस्याओं से परेशान हो चुका है, वह नये विकल्प को खोजने की मानसिकता बना चुका है, जो विपक्ष नेतृत्व के उद्देश्य को नया आयाम दे सकता है, क्यों नहीं विपक्ष इन स्थितियों का लाभ लेने को तत्पर होता। बात केवल विपक्ष की ही न हो, बात केवल मोदी को परास्त करने की भी न हो, बल्कि देश की भी हो तभी विपक्ष अपनी इस दुर्दशा से उपरत हो सकेगा। वह कुछ नयी संभावनाओं के द्वार खोले, देश-समाज की तमाम समस्याओं के समाधान का रास्ता दिखाए, सुरसा की तरह मुंह फैलाती गरीबी, अशिक्षा, अस्वास्थ्य, बेरोजगारी और अपराधों पर अंकुश लगाने का रोडमेप प्रस्तुत करे, नोटबंदी, जीएसटी आदि मुद्दों से आम आदमी, आम कारोबारी को हुई परेशानी को उठाए तो उसकी स्वीकार्यता स्वयंमेय बढ़ जायेगी। व्यापार, अर्थव्यवस्था, बेरोजगारी, ग्रामीण जीवन एवं किसानों की खराब स्थिति की विपक्ष को यदि चिंता है तो इसे महाराष्ट्र एवं हरियाणा के चुनाव में दिखाना होगा। पर विपक्ष केंद्र या राज्य, दोनों ही स्तरों पर सरकार के लिये चुनौती बनने की बजाय केवल खुद को बचाने में लगा हुआ नजर रहा है। वह अपनी अस्मिता की लड़ाई तो लड़ रहा है पर सत्तारूढ़ दल को अपदस्थ करने की दृढ़ इच्छा उसने नहीं दिखाई। पूरे चुनाव परिदृश्यों में वह विभाजित और हताश दिखाई दे रहा है। इन स्थितियों के रहते आज भाजपा को सत्ता से बाहर जाने का रास्ता दिखाने की संभावनाएं कैसे रंग ला सकती है?
इन दो राज्यों के चुनावों में विपक्षी दल अनेक नाटक रच रहा है, भाजपा को हराने की तमाम जायज-नाजायज कोशिशें भी कर रहा है, लेकिन उनके कोई सार्थक परिणाम सामने आते हुए नहीं दिख रहे हैं। लग रहा है विपक्षी पार्टियों के लिये ये चुनाव सत्ता की पहुंच बनाने की बजाय राजनीतिक अस्तित्व को बचाए रखने की जद्दोजहद के रूप में होते हुए दिख रहे हैं, आखिर विपक्षी दल इस रसातल तक कैसे पहुंचे, यह गंभीर मंथन का विषय है। सवाल यह भी है कि यदि विपक्षी दल एवं नेता इन दोनों राज्यों में भाजपा सरकार की वापसी रोकने को लेकर इतने ही प्रतिबद्ध है तो चुनावों में उनकी प्रस्तुति एवं प्रशस्ति इतनी कमजोर क्यों है? अब कैसे वे सरकार बनाने की संभावनाओं को तलाश पायेंगे? भले ही वे इन संभावनाओं की तलाशने के लिए स्वतंत्र हैं, लेकिन नतीजा ढाक के तीन पात वाला ही होता दिखाई दे रहा है। क्योंकि हालत यह हो गई है कि कांग्रेस पार्टी में कोई ऐसा नेता नजर ही नहीं आ रहा है जो प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी के बराबर आकर खड़ा हो सके? इसकी वजह भी राजनीति से विचारधारा का दरकिनार होना है। संसदीय लोकतन्त्र में मजबूत विपक्ष का होना इसलिए बहुत जरूरी होता है जिससे बहुमत में आने वाली पार्टी की सरकार पर लगातार यह दबाव बना कर रखा जा सके कि उसकी नीतियां केवल जन कल्याण की दृष्टि से ही बनाई जाएं। इस काम में बहुमत पाने वाला दल जरा सी भी कोताही नहीं बरत सकता। ऐसा स्वतन्त्र भारत के शुरू के पांच दशकों तक होता रहा है, अब इसकी ज्यादा अपेक्षा है।
चुनावों में ही नहीं, बल्कि पिछले पांच सालों में विपक्षी दलों एवं कांगे्रस ने राष्ट्रीय मुद्दों की लगातार अनदेखी की, जनभावनाओं की उपेक्षा की। विपक्षी दलों ने यह बात कई बार कही कि वे भाजपा से विचारधारा की लड़ाई लड़ रहे हैं। यदि यह विचारधारा की लड़ाई है तो इन चुनावों दिखना चाहिए। लेकिन ऐसा होता हुआ नहीं दिख रहा है। इन चुनावों में विपक्षी दलों एवं कांग्रेस को एक सूरज उगाना था ताकि सूरतें बदले, राजनीतिक परिदृश्य बदले। जाहिर है, यह सूरत तब बदलती, जब सोच बदलती। इस सोच को बदलने के संकल्प के साथ यदि विपक्षी दल आगे बढ़ते तो ही भाजपा को टक्कर देने में सक्षम होते। यह भी हमें देखना होगा कि टक्कर कीमत के लिए है या मूल्यों के लिए? लोकतंत्र का मूल स्तम्भ भी मूल्यों की जगह कीमत की लड़ाई लड़ता रहा है, तब मूल्यों को संरक्षण कौन करेगा? एक खामोश किस्म का ”सत्ता युद्ध“ देश में जारी है। एक विशेष किस्म का मोड़ जो हमें गलत दिशा की ओर ले जा रहा है, यह मूल्यहीनता, अहंकार, कीमत की मनोवृत्ति एवं अपराध प्रवृत्ति को भी जन्म दे सकता है। हमने सभी विधाओं को बाजार समझ लिया। जहां कीमत कद्दावर होती है और मूल्य बौना। सिर्फ सत्ता को ही जब विपक्षी दल एकमात्र उद्देश्य मान लेता है तब वह राष्ट्र दूसरे कोनों से नैतिक, राजनैतिक और सांस्कृतिक स्तरों पर बिखरने लगता है। इस देश को साम्राज्यवाद से मुक्ति दिलाने वाली पार्टी कांग्रेस का क्षरण पिछले पांच वर्ष में जिस तेज गति से हुआ है उसका दूसरा उदाहरण किसी अन्य तीसरे लोकतान्त्रिक देश में नहीं मिलता। कांग्रेस ने भारतीय लोकतन्त्र में धन की महत्ता को ‘जन महत्ता’ से ऊपर प्रतिष्ठापित किये जाने के गंभीर प्रयास किये, जिसके परिणाम उसे भुगतने पड़ रहे हैं। क्या इन विषम एवं अंधकारमय स्थितियों में कांग्रेस या अन्य विपक्षी दल कोई रोशनी बन सकते है  अपनी सार्थक भूमिका के निर्वाह के लिये तत्पर हो सकते हैं? इन चुनावों में यदि कांग्रेस या अन्य विपक्ष दल मजबूती से अपनी सार्थक एवं प्रभावी भूमिका का निर्वाह नहीं किया तो उनके सामने आगे अंधेरा ही अंधेरा है।

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