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(Lay flowers, not thorns in the way of Kartarpur)करतारपुर की राह में कांटे नहीं, फूल बिछाये

(Lay flowers, not thorns in the way of Kartarpur)करतारपुर की राह में कांटे नहीं, फूल बिछाये
. ललित गर्ग .

गुरुनानक देव के 550वें प्रकाश पर्व पर आयोज्य करतारपुर की तीर्थ यात्रा की राह में पाकिस्तान सरकार द्वारा कांटे बिछाना न केवल दुखद बल्कि निंदनीय भी है। गुरुनानक देव केवल सिखों के ही नहीं बल्कि सम्पूर्ण मानवता के एक महान् धर्मगुरु हैं, भारत में ही नहीं बल्कि समूची दुनिया में उनको आदर प्राप्त हैं। उनका 550वां प्रकाश पर्व भारत और पाकिस्तान दोनों ही देशों के लिए एक अवसर होना चाहिए कि वे समस्याओं को सुलझाने के लिए उसी सद्भाव, समझ एवं मानवीयता से प्रेरित हों, जिसका संदेश गुरुजी दे गए थे। एक ऐसे गुरु की यात्रा में कूटनीतिक-आर्थिक सौदेबाजी का होना एवं प्रत्येक श्रद्धालु से 20 अमरीकी डॉलर यानी 1,421 रुपए की फीस वसूलने का सोचना एवं इस सोच पर अडे रहना दुर्भाग्यपूर्ण होने के साथ-साथ विडम्बनापूर्ण है। विश्व के किसी भी देश में धार्मिक कॉरिडोर पर एंट्री फीस वसूलने की प्रथा नहीं है। पाकिस्तान के राजनीतिक सोच का शून्य तो खतरनाक रहा ही है, पर मानवीय सोच में भी ऊपर से नीचे शून्य ही शून्य का होना अधिक चिन्तनीय है।
गुरुनानक देव से जुड़े करतारपुर गुरुद्वारा साहिब की यात्रा पर संकट के बादलों का मंडराना त्रासद है, चिन्तनीय है। जिस महापुरुष की मानवीय संवेदना ने पूरी मानवता को शांति, करुणा, प्रेम, सद्भावना, सह-अस्तित्व से भिगोया था, उसके जीवन से जुड़े ऐतिहासिक एवं पवित्र अवसर को अपने राजनीतिक स्वार्थ एवं आपसी दुश्मनी-द्वेष एवं नफरत का बदला लेने के लिये इस्तेमाल करना अमानवीय एवं अराष्ट्रीय है। इस तीर्थ यात्रा में रौड़ा खड़े करने वाले न केवल धार्मिक सद्भाव, बल्कि अमन-चैन के भी दुश्मन हैं। भारत-पाकिस्तान के बीच करतारपुर कॉरिडोर को लेकर अंतिम मसौदे पर सहमति न बनने के कारण गुरुद्वारा श्री करतापुर साहिब के दर्शनों के लिए रविवार को शुरू होने वाली ऑनलाइन रजिस्ट्रेशन प्रक्रिया स्थगित कर दी गई है। प्रत्येक श्रद्धालु से 20 अमरीकी डॉलर की फीस के कारण दोनों देशों के बीच करतारपुर कॉरिडोर के संचालन को लेकर गतिरोध बना हुआ है। भारत पाकिस्तान की इस शर्त का कड़ा विरोध कर रहा है। वहीं पाक फीस वसूलने पर अड़ा हुआ है। समय रहते यात्रा संबंधी छोटे-मोटे विवादों को सुलझाने की जरूरत थी, लेकिन शनिवार को होने वाली बैठक के टल जाने से भी आशंकाओं को बल मिला है। भारत और पाकिस्तान के बीच तनाव का असर बहुप्रतीक्षित श्री करतारपुर यात्रा पर जिस तरह से पड़ रहा है, उस पर समय रहते गौर करने की जरूरत है, यह मानवीयता का तकाजा है। तीर्थ यात्रा के बहाने कमाई की पाकिस्तानी सोच उसकी दुर्बलता, अमानवीयता संकीर्ण सोच का परिचायक है।
श्री करतारपुर कॉरिडोर एक पवित्र एवं पावन तीर्थस्थल है। यह असल में साम्प्रदायिक सद्भाव, प्रेम एवं मानवता का तीर्थ है, क्योंकि सिख धर्म के संस्थापक गुरु नानकजी ने अपना सम्पूर्ण जीवन इंसानियत एवं आपसी सौहार्द स्थापित करने में व्यतीत किया। वे करतारपुर के इसी गुरुद्वारा दरबार साहिब के स्थान पर एक आश्रम में रहा करते थे। उन्होंने यहां 16 सालों तक अपना जीवन व्यतीत किया। बाद में इसी गुरुद्वारे की जगह पर गुरु नानक देवजी ने अपना देह छोड़ा था, जिसके बाद गुरुद्वारा दरबार साहिब बनवाया गया। मान्यता है कि जब नानकजी ने अपनी आखिरी सांस ली तो उनका शरीर अपने आप गायब हो गया और उस जगह कुछ फूल रह गए। इन फूलों में से आधे फूल सिखों ने अपने पास रखे और उन्होंने हिंदू रीति रिवाजों से इन्हीं से गुरु नानकजी का अंतिम संस्कार किया और करतारपुर के गुरुद्वारा दरबार साहिब में नानकजी की समाधि बनाई। वहीं, आधे फूलों को पाकिस्तान के पंजाब प्रांत के मुस्लिम भक्तों ने ले लिया और उन्होंने गुरुद्वारा दरबार साहिब के बाहर आंगन में मुस्लिम रीति रिवाज के मुताबिक कब्र बनाई। सभी धर्म, सम्प्रदाय, जाति, वर्ग, वर्ण एवं समुदाय के लोग नानकजी के आध्यात्मिक परिवेश एवं उपदेशों से जीवन जीने की प्रेरणा पाते थे, आपस में जुड़ते थे, मिलकर रहते एवं इंसानियत का जीवंत बनाते थे। माना जाता है गुरु नानकजी ने इसी स्थान पर अपनी रचनाओं और उपदेशों को पन्नों पर लिख अगले गुरु यानी अपने शिष्य भाई लहना के हाथों सौंप दिया था। यही शिष्य बाद में गुरु अंगद देव नाम से जाने गए। इन्हीं पन्नों पर सभी गुरुओं की रचनाएं जुड़ती गई और दस गुरुओं के बाद इन्हीं पन्नों को गुरु ग्रन्थ साहिब नाम दिया गया, जिसे सिख धर्म का प्रमुख धर्मग्रंथ माना गया। इस ऐतिहासिक वर्ष में पाकिस्तान को सहृदयता का परिचय देना चाहिए, लेकिन वह कूटनीतिक और आर्थिक फायदे से ऊपर सोच नहीं पा रहा है। पाकिस्तान के लिये तो यह गर्व का विषय है कि एक महान् धर्मगुरु का तीर्थ उनकी सीमा में हैं। उसे इस ऐतिहासिक अवसर को उत्सव का रूप देते हुए अपनी ओर से तीर्थ यात्रियों के लिये उदार दृष्टिकोण से व्यापक व्यवस्थाएं करनी चाहिए। लेकिन ऐसा न करके पाकिस्तान हिंसक, आतंकवादी तो था ही अब संकीर्ण एवं हृदयहीन होने का परिचय दे रहा है। करतारपुर साहिब की भारत-पाकिस्तान सीमा पर डेरा बाबा नानक से दूरी महज चार किलोमीटर है, मात्र इतनी दूरी के लिए प्रति श्रद्धालु 1,400 रुपये की फीस वसूलने की हठधर्मिता अतार्किक है। पाकिस्तान द्वारा लगाए गया शुल्क न केवल नृशंस है बल्कि त्रासद भी है।
श्री करतारपुर स्थित गुरुद्वारा दरबार साहिब पाकिस्तान में रावी नदी के पार स्थित है जो भारत के डेरा बाबा नानक से करीब चार किलोमीटर दूर है। आज भी सिख भक्त अपने पहले गुरु के इस गुरुद्वारे को डेरा बाबा नानक से दूरबीन की सहायता से देखते हैं। दूरबीन से गुरुद्वारा दरबार साहिब को देखने का काम की कड़ी निगरानी में होता है। अगर यह गलियारा या कॉरिडोर बन जाता है तो भारतीय सिख गुरुद्वारा दरबार साहिब को बिना वीजा के देख सकते हैं। क्योंकि अभी तक करतारपुर स्थित इस गुरुद्वारे को देखने के लिए श्रद्धालुओं को वीजा की जरूरत पड़ती है। भारत सरकार अपने देश के सिख समुदाय की भावनाओं का सम्मान करते हुए अनेक उपक्रम कर रही है, उसने फोर लेन की सड़क तैयार की है। भारत और पंजाब सरकार ने अपनी सीमा के अंदर बड़े पैमाने पर तैयारियां कर रखी हैं, जिनका उद्घाटन 8 नवंबर को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी करेंगे। पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह भी सामान्य यात्री की तरह करतारपुर साहिब जाएंगे। भारत की ओर पूरा उत्साह है, भारत यह भी चाहता है कि विशेष दिन पर पाकिस्तान 10 हजार तीर्थयात्रियों को जाने की मंजूरी दे। पाकिस्तान इस पर खामोश है, लेकिन शुल्क लेने पर अड़ा हुआ है। वह अपने व्यापक फायदे को नहीं देख पा रहा है, उसे भारतीय सिखों के माध्यम से प्रतिदिन एक लाख डॉलर की कमाई दिख रही है। पाकिस्तान की तंगदिली एवं संकीर्ण सोच पर तरस आता है, वह आर्थिक तंगहाली में तो है ही, सद्भाव की गगरी भी उसकी खाली है। क्योंकि वह एक ऐसे गुरु की यात्रा में कूटनीतिक-आर्थिक सौदेबाजी कर रहा है, जिन्होंने जीवन भर ‘सच्चा सौदा’ किया और इसी का संदेश देते रहे। यह संदेश अब उन तमाम लोगों के व्यवहार में उतरना चाहिए, जो तीर्थयात्रा तक को नहीं बख्श रहे, उसे भी अपने स्वार्थ सिद्धि का माध्यम बना रहे हैं। यह तीर्थयात्रा एवं गुरुनानक देवजी का 550वां प्रकाश पर्व संभवतः पाकिस्तान के भाग्योदय कर दें, उसे सद्बुद्धि दे दें, एक ऐसी राह प्रशस्त कर दें कि भारत-पाकिस्तान के रिश्तों में मधुरता आने से पहले टूटती पाकिस्तानी जनता की सांसों को नया जीवन मिल जाये। यह यात्रा एक ऐसी राह है, जो बन गई, तो हमेशा काम आएगी, नफरत, द्वेष एवं हिंसा की बजाय प्रेम, करुणा एवं इंसानियत की ज्योति प्रज्ज्वलित करेगी। उम्मीद और दुआ कीजिए, पाकिस्तान को सद्बुद्धि मिले और इस यात्रा में कांटे बौने की बजाय फूल बिछाये। क्योंकि दोनों राष्ट्रों की जनता हिंसा, नफरत एवं आपसी द्वेष से लड़ते नहीं रह सकते, वे व्यक्तिगत एवं सामूहिक, निश्चित सकारात्मक लक्ष्य के साथ जीना चाहते हैं अन्यथा जीवन की सार्थकता नष्ट हो जायेगी।

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