आजादी के 80 साल: तब 25 पैसे का पेट्रोल, अब जेब में आग!

Atal Hind Team Online15 August 20264 min read30 viewsलेख
आजादी के 80 साल: तब 25 पैसे का पेट्रोल, अब जेब में आग!

आजादी के 80 साल: 1947 से अब तक कितनी बढ़ी महंगाई?

लेखक-सुभाष बुड़ावन वाला,रतलाम.मप्र

     आज देश आजादी के 80 साल पूरे होने का जश्न मना रहा है। लाल किले पर तिरंगा लहरा रहा है, राष्ट्रगान गूंज रहा है और हम गर्व से कह रहे हैं,देखिए, 1947 से कितना बदल गया भारत! बस कोई अगर महंगाई की रसीद हाथ में लेकर पूछ बैठे कि “बदला तो बहुत कुछ है, लेकिन मेरी जेब क्यों नहीं बदली?”, तो देशभक्ति के बीच थोड़ी असहज खामोशी छा जाती है।

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         आजादी के वक्त भारतीय ₹1 और अमेरिकी 1$ डॉलर बराबर थे।आज 96₹एक $का मूल्य है. 1947 में पेट्रोल करीब 25-27 पैसे लीटर था। यानी एक रुपये में इतना पेट्रोल आ जाता था कि आज का वाहन चालक शायद पेट्रोल पंप वाले से कहे—“भाई, बाकी पैसे वापस कर देना।” आज पेट्रोल 100 रुपये के आसपास या उससे ऊपर है। तब पेट्रोल सस्ता था, आज पेट्रोल देखकर लगता है कि गाड़ी नहीं, जेब चलाने के लिए पेट्रोल चाहिए।

      दूध की कहानी भी कम दिलचस्प नहीं। आजादी के दौर में एक लीटर दूध करीब 12 पैसे बताया जाता है। कुछ आंकड़ों में 20 पैसे भी मिलते हैं। यानी उस जमाने में दूध खरीदना ऐसा काम था, जिसके बाद आदमी घर लौटकर हिसाब-किताब नहीं बैठाता था कि बच्चों को दूध पिलाएं या बिजली का बिल भरें। आज दूध 65 रुपये के आसपास पहुंच चुका है। बच्चे दूध मांगते हैं तो माता-पिता पहले उसकी कीमत देखते हैं, फिर बच्चे की सेहत।

          और सोना! 1947 में 10 ग्राम सोना करीब 88.62 रुपये का बताया जाता है। आज वही सोना 1.5 लाख रुपये के पार जा चुका है। यानी जिस धातु को कभी गहना कहा जाता था, वह अब परिवार की आर्थिक नीति का हिस्सा बन चुकी है। शादी में सोना देना अब प्रेम का नहीं, बजट का सवाल है। वर-वधू की कुंडली बाद में मिलती है, पहले जेवर का अनुमान लगाया जाता है।

          1947 में चावल करीब 12 पैसे किलो और आलू करीब 10 पैसे किलो बताया जाता है। आज सब्जी मंडी में आलू खरीदते समय भी ग्राहक की नजर तराजू से ज्यादा दुकानदार के चेहरे पर रहती है,कहीं ऐसा तो नहीं कि दो किलो आलू के साथ महंगाई का कोई अदृश्य पैकेट भी थमा दिया गया हो!

            एक साधारण साइकिल की कीमत करीब 20 रुपये बताई जाती है। आज साइकिलें भी ऐसी-ऐसी आ गई हैं कि कई बार लगता है आदमी साइकिल खरीद रहा है या छोटी-मोटी कार की डाउन पेमेंट कर रहा है। हालांकि साइकिल अब भी पेट्रोल से सस्ती है, इसलिए समझदार आदमी साइकिल चलाता है और पेट्रोल के दाम देखकर अपने पुराने फैसलों पर गर्व करता है।

      लेकिन असली व्यंग्य यहां है कि 1947 की कीमतों को देखकर हम खुश हो लेते हैं कि तब सब कितना सस्ता था। सवाल यह है कि तब कमाई कितनी थी? आज के 100 रुपये और 1947 के 100 रुपये में सिर्फ नोट का रंग नहीं, पूरी अर्थव्यवस्था का अंतर है। तब आमदनी कम थी, सुविधाएं सीमित थीं, बाजार छोटा था और जीवन की जरूरतें भी आज जैसी नहीं थीं।

        तब मोबाइल नहीं था, इंटरनेट नहीं था, ओटीटी नहीं था, एयर कंडीशनर हर कमरे में नहीं था और ऑनलाइन शॉपिंग में रात दो बजे तक “कार्ट में डालें” का विकल्प भी नहीं था। आज आदमी की जरूरतें भी महंगाई के साथ आधुनिक हो गई हैं। पहले घर में रेडियो होता था, अब हर हाथ में स्मार्टफोन है। पहले साइकिल थी, अब ईएमआई पर कार है। पहले चिट्ठी आती थी, अब नोटिफिकेशन आते हैं,और दोनों ही कभी-कभी परेशान करने के लिए पर्याप्त हैं।

              महंगाई केवल कीमतों की कहानी नहीं है। यह मजदूरी, उत्पादन लागत, टैक्स, परिवहन, मांग, वैश्विक बाजार और बदलती जीवनशैली की भी कहानी है। इसलिए 1947 के 25 पैसे को आज के 100 रुपये से सीधे भिड़ाना अर्थशास्त्र नहीं, थोड़ा-सा भावुक इतिहास है।

       फिर भी इन आंकड़ों में एक बड़ा संदेश छिपा है। आजादी के 80 वर्षों में भारत ने बहुत तरक्की की है। सड़कें बढ़ीं, उद्योग बढ़े, तकनीक आई, आय बढ़ी, सुविधाएं बढ़ीं और जीवन की संभावनाएं भी बढ़ीं। लेकिन इसी विकास के साथ खर्च भी बढ़ा। अब सवाल यह नहीं है कि पेट्रोल 25 पैसे से 100 रुपये कैसे पहुंच गया। असली सवाल यह है कि आम आदमी की आय उसकी जरूरतों और कीमतों के मुकाबले कितनी तेजी से बढ़ी?

क्योंकि महंगाई की सबसे बड़ी विडंबना यही है,सरकार आंकड़ों में विकास दिखाती है, बाजार बिल में विकास दिखाता है और आम आदमी अपनी जेब में विकास टटोलता है।

1947 में एक रुपये में पेट्रोल आता था। आज सौ रुपये में भी पूरा संतोष नहीं मिलता। तब सोना 88 रुपये में 10 ग्राम था, आज डेढ़ लाख से ज्यादा है। तब दूध पैसे में मिलता था, आज रुपये में भी खरीदना पड़ता है। यानी आजादी के 80 साल में देश ने लंबी छलांग लगाई है।

       बस उम्मीद यही है कि अगली आजादी की सालगिरह तक महंगाई इतनी लंबी छलांग न लगा दे कि आम आदमी को तिरंगा फहराने से पहले अपनी जेब फहरानी पड़े—और उसमें से निकले सिर्फ पुराने बिलों की रसीदें!

          आखिर आजादी का असली आनंद तभी है, जब देश भी आगे बढ़े और आम आदमी की जेब भी उसके साथ कदमताल करे। वरना इतिहास की किताब में 25 पैसे का पेट्रोल देखकर मुस्कुराना आसान है, लेकिन आज पेट्रोल पंप पर 100 रुपये का नोट निकालते समय मुस्कुराना,वह देशभक्ति से थोड़ा ज्यादा कठिन काम है।-सुभाष बुड़ावन वाला,रतलाम.मप्र.

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