बनावटी प्यार

लाख मिन्नतें मांग कर जो तुझको पाया ,
थी भूल मेरी जो अब था पछताय़ा ।
हुई थी मुलाकात रहा में जो तुमसे ,
झुकी नजरों से प्यार था जताया ।
दिन बीत जाता था कठिन डगर में ,
रातों ने हमको जगना सिखाया ।
यादों में तेरी दिल में थी जो लपटें ,
जाने कैसे था ये शोला दबाया ।
घड़ी पल तब तो लगती थी साले ,
जानें वो वक़्त कैसे था हमने बिताया ।
न जानें कैसे थी जोड़ी वो दौलत ,
रात दिन था हमने लहू बहाया ।
बड़ी मूश्क्त से जगह झोंपड़ी की ,
तेरे लिए था एक आशियाँ बनाया ।
आज रहते हो तुम रजो महल में ,
दुनिया को था हमने आईना दिखाया।
रहती थी हमसे लिपट कर ए जालिम ,
आज लगता है दुश्मन मेरा साया ।
देह जर जर हुई जो मेरी अब ,
तूने मुझपर जो कहर था ढ़ाया ।
आज मेरी चौखट हुई मुझे पराई ,
भाग दुश्मन से दामन बचाया ।
न रहा अब आसरा उसको अपने घर,
आशिक उसके ने था घर से भगाया ।
पकड़े जो तूने आवारा आशिक ,
तेरी शैह पर था मुझको डराया ।
न रह सकोगी चैन से तुम उम्र भर ,
सरे राह से था जो मुझको भटकाय़ा ।

दिलाराम भारद्वाज ‘ दिल ,
करसोग , मण्डी हिमाचल प्रदेश♥

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सादगी से मनाया गया गुरू पूर्णिमा महोत्सव

गुरू चरणों से श्रेष्ठ कोई स्थान नहींः बिठ्ठल गिरि

सादगी से मनाया गया गुरू पूर्णिमा महोत्सव

फतहह सिंह उजाला
पटौदी। गुरू चरणों से श्रेष्ठ कोई स्थान नहीं हो सकता है। सांसारिक रिश्तों से नाता तोड़ने के बाद अध्यात्म की दुनिया में गुरू ही शिष्य के लिए सर्वोपरी होता है। यह बात मंहत लक्ष्मणदास गो सेवा सदन और महाकाल मंदिर बोहड़ाकला के महंत एव अज्ञातवास के लिए प्रस्थान कर चुके महामंडलेश्वर स्वामी ज्योति गिरि के शिष्य मंहत बिठ्ठल गिरि ने गुरू पूर्णिमा और चंद्र ग्रहण के मौके पर कही।

रविवार को बोहड़ाकला स्थित हनुमान मंदिर-महाकाल मंदिर में गुरू पूर्णिमा महोत्सव बेहद सादगी के साथ मनाया गया। इस मौके पर विद्या गिरि, कृष्ण गिरि, शंभू गिरि, कमल पुरी, पंडित राधे श्याम ने श्रद्धा पूवर्क महामंडलेश्वर ज्योति गिरि की चरण पादुका को साक्षत गुरू महामंडलेश्वर ज्योति गिरि मान कर पूजा अर्चना कर आशिर्वाद लिया। मंहत बिठ्ठल गिरि ने कहा कि, घर-परिवार, मां-पिता सहित रिश्तेनातेदारी को त्यागने के बाद संन्यास जीवन का कल्याण केवल गुरू के द्वारा ही संभव है। शिष्य के लिए गुरू चरणों से श्रेष्ठ अन्य कोई भी स्थान ब्रहमांड ने नहीं हो सकता है।

अध्यात्मिक और संन्यासी जीवन भी सांसारिक जीवन के मुकाबले कई गुणा कठिन और कोंटो भरा ही होता है। शिष्य की निष्ठा ही सबसे बड़ी और कठिन परीक्षा भी होती है। निष्ठा, विश्वास और आस्था ही वह माध्यम है तो कि किसी भी शिष्य को हमेशा गुरू और भगवान के साथ और पास होने का अहसास कराते है। गुुरू के चरण और चरणों की रज ही शिष्य के लिए सबसे बड़ी धरोहर होती है। गुरू के चरणों में झुकते ही जो आशिर्वाद गुरू के द्वारा दिया जाता है, उसको शब्दों में बयान नहीं किया जा सकता है।

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