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हरियाणा  की दुष्यंत -मनोहर सरकार अधर  में लटकी ,नहीं कर पा रही मंत्रियों का चयन ,पूरा  भी कर  पाएगी क्या कार्यकाल 

3 से 4 मंत्री पद जेजेपी के लिए छोड़ने और निर्दलीय विधायकों को साथ जोड़े रखने के लिए 1-2 मंत्री बनाने की सोच के कारण भाजपा के पास अपने कोटे के 6-7 मंत्री पद ही बचते हैं।

हरियाणा  की दुष्यंत -मनोहर(Dushyant  – Manohar HARIYANA government)सरकार अधर  में लटकी ,नहीं कर पा रही मंत्रियों का चयन
मंत्रियों का चयन भाजपा के लिए बना बड़ी “सिरदर्दी”

क्षेत्रीय संतुलन और जातीय भागीदारी को साधना हुआ मुश्किल

=राजकुमार अग्रवाल =
चंडीगढ़। भारतीय जनता पार्टी(BJP) के लिए मंत्रियों का चयन बड़ी सिरदर्दी बन गया है। पूरा बहुमत नहीं मिलने के कारण जेजेपी(JJP) के साथ सांझेदारी की सरकार बनाने के बाद भाजपा के लिए अपने 40 विधायकों को एडजेस्ट करना बड़ी चुनौती हो गया है।
खट्टर मंत्रिमंडल के 10 में से 8 मंत्रियों के चुनाव हार जाने के चलते इस बार अनिल विज के अलावा बाकी नए मंत्रियों का चयन करना पार्टी के लिए मजबूरी हो गया है।
3 से 4 मंत्री पद जेजेपी के लिए छोड़ने और निर्दलीय विधायकों (Independent MLAs)को साथ जोड़े रखने के लिए 1-2 मंत्री बनाने की सोच के कारण भाजपा के पास अपने कोटे के 6-7 मंत्री पद ही बचते हैं।
पिछली बार से आधी संख्या में पूरे प्रदेश के सभी हिस्सों और सभी बड़ी जातियों को एडजस्ट करना भाजपा के लिए हरगिज़ आसान नहीं है। इसी कारण मंत्रिमंडल के विस्तार में देरी हो रही है।

प्रादेशिक भागीदारी देना आसान नहीं

भाजपा के लिए यह दिक्कत है कि आधे मंत्रियों (Ministers)में पूरे प्रदेश के सभी हिस्सों के मंत्रिमंडल में हिस्सेदारी दे पाना संभव नहीं है। 5 जिलों में भाजपा का खाता भी नहीं खुला है। इसके अलावा जेजेपी के मंत्री वाले जिलों में भी भाजपा अपने मंत्री नहीं बना पाएगी।
एक तिहाई जिलों में भाजपा को अपने मंत्रियों के बगैर ही सरकार चलानी पड़ेगी। भाजपा के पास प्रदेश की सियासत को निर्धारित करने वाली जाट बेल्ट रोहतक, झज्जर, सोनीपत, जींद, हिसार और फतेहाबाद जिलों में सिर्फ गन्नौर से निर्मल चौधरी ही जाट विधायक बनी हैं।
इन 5 जिलों में अपने अस्तित्व को कायम रखना भाजपा के लिए बड़ी चुनौती है और ऐसे में इन जिलों में मंत्री पद देने के लिए भाजपा के रणनीतिकारों को बड़ी माथापच्ची करनी पड़ रही है। अपने हिस्से के सात मंत्री पदों में 23 जिलों को एडजेस्ट भाजपा किसी भी सूरत में नहीं कर पाएगी।

जातीय है समीकरणों ने बढ़ाई परेशानी

भाजपा की परेशानी जातीय समीकरणों ने बढ़ा दी है। 1-2 पद खाली रखना भाजपा के लिए मजबूरी है।
मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर के अलावा अनिल विज(ANIL VIJ) को पंजाबी कोटे से मंत्री बनाया जाना है। पिछली सरकार में इन दोनों के अलावा मनीष ग्रोवर भी मंत्री थे लेकिन इस बार तीसरा पंजाबी मंत्री बनाना आसान नहीं होगा।
पिछली सरकार में ओम प्रकाश धनखड़ और कैप्टन अभिमन्यु(Captain Abhimanyu) जाट मंत्री थे। इस बार मंत्रिमंडल में दुष्यंत चौटाला उप मुख्यमंत्री के रूप में पहले ही जाट कोटे की 1 सीट हासिल कर चुके हैं एक और जाट मंत्री बनाने के लिए भाजपा को अपने अलावा निर्दलीय विधायकों का भी ख्याल रखना पड़ रहा है।
भाजपा सरकार को समर्थन दे रहे सात निर्दलीय विधायकों में से पांच विधायक जाट समुदाय से हैं। अगर भाजपा निर्दलीय विधायकों को संतुष्ट रखना चाहेगी तो उसे कम से कम एक जाट मंत्री बनाना पड़ेगा। निर्दलीय जाट विधायक को मंत्री बनाने के बाद भाजपा के पास अपनी पार्टी का जाट मंत्री बनना संभव नहीं हो पाएगा। अपने कोटे से जाट मंत्री नहीं बनाए जाने के कारण भाजपा की नियत पर मीडिया सवाल खड़ा करने का काम करेगी।
यही हालात ब्राह्मण समुदाय को लेकर भी हैं। पिछली सरकार में रामबिलास शर्मा मंत्रिमंडल में मुख्यमंत्री के बाद दूसरे पायदान की हैसियत रखते थे। इस बार उनके हार जाने के कारण भाजपा के लिए उनकी जगह दूसरे मंत्री का चयन करना आसान नहीं है। अगर जेजेपी ने नारनौंद के विधायक राम कुमार गौतम(MLA Ram Kumar Gautam) को मंत्री बना दिया तो मंत्रिमंडल में दूसरे ब्राम्हण का मंत्री बन पाना आसान नहीं होगा। अगर भाजपा मूलचंद शर्मा को मंत्री नहीं बनाएगी तो ब्राह्मणों के नाराज होने का खतरा भी बना रहेगा।नाराजगी को दूर करने के लिए पंजाबी और ब्राह्मण कोटे की सांझी दावेदार सीमा त्रिखा को मंत्री बनाया जा सकता है।
यही कहानी बनिया मंत्री को लेकर भी नजर आएगी। पिछली सरकार में दो बनिया मंत्री थे। इस बार सिर्फ एक ही बनिया मंत्री और बन पाएगा क्योंकि पंचकूला के विधायक ज्ञानचंद गुप्ता(MLA Gyanchand Gupta) को पहले ही विधान सभा का स्पीकर बनाया जा चुका है।
अहीरवाल से एक मंत्री बनाए जाने के अलावा एक बैकवर्ड समुदाय के विधायक को भी मंत्री बनाना भाजपा के लिए मजबूरी है।
बात यह है कि भाजपा के लिए गठबंधन की सरकार ने क्षेत्रीय और जातीय समीकरणों को एक साथ साधना बेहद कठिन हो गया है।
पिछली बार मंत्रियों की नियुक्ति में भाजपा को कोई परेशानी नहीं आई थी लेकिन इस बार गठबंधन सहयोगी जेजेपी और निर्दलीय विधायकों को एक साथ साधने की रणनीति भाजपा के समीकरणों पर भारी पड़ रही है और इसलिए भाजपा के अपने विधायकों के कोटे पर कैंची चल गई है।
भाजपा को पिछली बार के मुकाबले आधे मंत्री पद ही मिल रहे हैं। आधी संख्या में पूरी हिस्सेदारी को समायोजित करना किसी भी तरह से मुमकिन नहीं है।
भाजपा के लिए मंत्रियों का चयन चक्रव्यूह बन गया है और मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर को बेहद सूझबूझ और सावधानी के साथ मंत्रियों का चयन करना होगा।
नए चेहरों के साथ आधी भागीदारी के बलबूते पर असरदार सरकार चलाना किसी भी तरह से आसान नहीं है उपमुख्यमंत्री दुष्यंत चौटाला के साथ मिलकर ही मुख्यमंत्री मनोहर लाल को इस गुत्थी को सुलझाते हुए शीघ्र से शीघ्र अपने मंत्रिमंडल का विस्तार करना होगा।
मंत्रिमंडल का विस्तार होने पर ही सरकार में गतिशीलता आएगी और तभी पूरा सिस्टम सक्रिय हो पाएगा। मंत्रिमंडल की पहेली को जल्द से जल्द सुलझा कर  मंत्रिमंडल का विस्तार करना बेहद जरूरी हो गया। इस मामले को ज्यादा लटकाना हितकारी नहीं होगा।

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